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Showing posts from July, 2009

श्रद्धेय श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु पर एक बार फ़िर सवाल

कुछ महान नेताओं की मृत्यु अभी तक रहस्य के घेरे में छुपी हुई है. जिनमें दो व्यक्ति बड़े अहम हैं एक सुभाष चन्द्र बोस तथा दूसरे हैं लाल बहादुर शास्त्री जी. पिछले दिनों एक सज्जन श्री अनुज धर ने सूचना के अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत स्वर्गीय प्रधानमन्त्री परम श्रद्धेय लाल बहादुर शास्त्री जी के ताशकन्द में हुये निधन के बारे में जानकारी मांगी. उल्लेखनीय है कि स्वर्गीय प्रधानमन्त्री का निधन ताशकन्द में भारत-पाकिस्तान समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद रात्रि में हो गया जिसके बारे में बताया गया कि शास्त्री जी को दिल का दौरा पड़ा और वे स्वर्गलोक सिधार गये. १९६५ के भारत-पाक युद्ध में भारत ने कई स्थानों पर निर्णायक बढ़त ले ली थी तथा भारतीय फौजें पाकिस्तान में अन्दर तक घुस गयी थीं. चीन से मिली हार के बाद भारत की फौजों का यह प्रदर्शन निश्चित ही सराहनीय था तथा ऐसे में यह अपेक्षित था कि भारत वार्ता की मेज पर सुदृढ़ स्थिति में था. युद्ध की समाप्ति के बाद भारत और पाकिस्तान के मध्य समझौते हेतु तत्कालीन सोवियत संघ के प्रमुख श्री कोजिगिन ने भारतीय प्रधानमन्त्री और पाकिस्तान के प्रमुख जनरल अयूब खान को ताशकन्द में स...

रियलिटी शो में खाने को दी जाने वाली चीजों पर आपत्ति

सच का सामना और इस जंगल से मुझे बचाओ दोनों ही सीरियल इस समय विवादों के घेरे में हैं. कारण है सच.... में ऐसे प्रश्नों का पूछा जाना जो बहुत ही आपत्तिजनक हैं और इस ..... में बिकिनी पहन कर नहाती हुई बालाएं. लेकिन इस सबसे बढ़कर मुझे जो आपत्तिजनक चीज महसूस हुई वह इस ..... में प्रतिभागियों के लिये दिया गया खाद्य पदार्थ है. एक दिन शराब में जीवित मछली परोसी जाती है तो दूसरे दिन आइसक्रीम में जमे हुये कीडे़, जन्तुओं के भंग किये हुये अंग. जीवित कीड़े, शायद घोर आपत्तिजनक और नितान्त अमानवीय. किसी व्यक्ति को कीड़े-मकोड़े निगलने को दिये जाना, जीवित जन्तुओं को खाने को दिये जाना कितना नारकीय हो सकता है, देखकर सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है. यूं तो आपद काल में हर चीज ग्राह्य है, हर कृत्य उचित है, लेकिन महज धन प्राप्ति के लिये, महज एक शो को जीतने के लिये मनुष्य का इस तरह का व्यवहार समझ से परे है. मनुष्य की शारीरिक बनावट यथा दांतों तथा पाचन तन्त्र मांसाहारी जानवरों से पूरी तरह से अलग है. फिर भी मांसाहारी व्यक्ति अपने मांसाहार को उचित ठहराने हेतु विभिन्न तर्क देते रहते हैं जो एक अलग चर्चा का विषय हो सकता है. एक...

एड्स के बारे में कुछ थोड़ा सा

एच0आइ0वी0 या साधारण भाषा में कहा जाये तो एड्स भारत में एक महामारी का रूप लेता चला जा रहा है। एच0आइ0वी0 अर्थात ह्रूमन इम्यूनोडिफिसियेंसी वाइरस अपने आप में कोई बीमारी नहीं है लेकिन यह वाइरस जिस मनुष्य के अन्दर प्रवेश कर जाता है उस मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट कर देता है, जिससे कि अन्य किसी भी साधारण बीमारी के कीटाणुओं के प्रवेश करने पर उस मनुष्य के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है, परिणामत: वह शरीर उस साधारण बीमारी को नष्ट नहीं कर पाता और एक साधारण बीमारी लाइलाज बन जाती है तथा अन्तत: मनुष्य को मृत्यु के घाट उतार देती है। और एक कटु मगर भयावह सत्य यह भी है कि इस भयानक वाइरस का अभी तक कोई निदान नहीं खोजा जा सका है। भारत में एड्स से पीड़ित मनुष्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, मूलत: इस भयावह वृद्धि के मूल में इस रोग के प्रति अज्ञानता, गरीबी, लालच, स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में कमी, नैतिकता में गिरावट इत्यादि शामिल हैं। यह रोग एच0आइ0वी0 से प्रदूषित रक्त का प्रयोग करने पर, संक्रमित व्यक्ति से यौन संबंध बनाने पर, संक्रमित औजारों जैसे इंजेक्शन हेतु सुई, दाढ़ी बनाने के ल...

वाराणसी में अधिकारी की पिटाई

वाराणसी में एडीएम साहब को एक विधायक ने पीट दिया तो हाय-तौबा मच गई, जैसे उत्तर प्रदेश में एटम बम गिर गया हो. इससे पहले एटम बम गिरा था जब एक पुलिस के साहब के साथ एक नेता जी ने वैसा ही व्यवहार कर दिया जैसे कि आम तौर पर पुलिस वाले आम आदमी के साथ किया करते हैं. एडीएम साहब बिलखते हुए दिखाई दिये, मेरी पूरी हमदर्दी उनके साथ है. लेकिन मेरी बात घूम फिर कर फिर वहीं आ जाती है, कि अपना दर्द दर्द है, दूसरे का दर्द मजा. कभी आप को किसी काम के सिलसिले में तहसील, रजिस्ट्री दफ्तर, सहकारी समितियों के कार्यालय या थाने जाना पड़ा हो तो आपको पता चल जायेगा कि पुलिस-प्रशासन के अधिकारी किस तरह से काम करते हैं. यह मैं कई दफा लिख चुका हूं कि अंग्रेजों द्वारा दिया गया ढांचा उनके अपने सिस्टम को बनाये रखने और भारत की जनता को गुलाम बनाये रखने के लिये बनाया गया था. शायद इस ढांचे को जड़ से न उखाड़ना सबसे बड़ी गलती थी विभाजन के बाद. चूंकि यह ढांचा वही था, इसमें शामिल लोग भी वही थे, अंग्रेजी कल्चर की पैदावार, महारानी के प्रति वफादार और चाटुकार, लिहाजा स्वतन्त्रता के बाद सिर्फ इनकी लायल्टी बदल गयी. जो कार्य अंग्रेजों के लिये म...

सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष कौन है??

सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष कौन है?? कोई नेता नहीं बल्कि खबरिया चैनल, यह छोटी सी पोस्ट इसलिये क्योंकि एक चैनल पर शहीदों के बारे में उनके माता - पिता से बात चीत चल रही थी. कार्यक्रम अच्छा चल रहा था और इस पर एतराज भी जताया कि नेताओं की करनी और होती है कथनी कुछ और. इसी दौरान जब स्वर्गीय कैप्टन हनीफुद्दीन की मां से बात की गयी तो एक दो बातों के बाद ही एन्कर ने कहना प्रारम्भ कर दिया कि लोगों को इससे सबक लेना चाहिये और धर्म की राजनीति में नहीं फंसना चाहिये. मुझे समझ में नहीं आया कि हिन्दू मुसलमान का मुद्दा बीच में कहां से आ गया? किस व्यक्ति ने अभी तक हिन्दू शहीद-मुसलमान शहीद का मुद्दा उठाया? फिर इस एन्कर को क्या आवश्यकता आन पड़ी कि लोगों को यह अहसास दिलाने की कि केवल हिन्दू ही शहीद नहीं होते. अगर इनका बस चले तो यह आंकड़े भी प्रस्तुत करने लगें कि इतने हिन्दू शहीद हुये और इतने मुसलमान, इतने सिक्ख और इतने दूसरे मजहब के. एक दुर्भाग्य न्य़ूज चैनलों का यह कि सम्भवत: अल्पसंख्यकों की और बहुसंख्यकों की शहादत की गिनती अलग अलग नहीं होती और संभवत: संख्या में भी बहुसंख्यकों की अपेक्षा कुछ कमी होगी अन्यथा यह इसे...

सरकारी कर्मचारी घूस क्यों न ले.

सरकारी कर्मचारी घूस क्यों न लें- शीर्षक बुरा लग सकता है और है. लेकिन क्या सरकारी कर्मचारी द्वारा पद का दुरुपयोग कर पैसा लेना ही भ्रष्टाचार है? जब चीनी मिलों ने चीनी का दाम अठारह रुपये से अठ्ठाइस रुपये पहुंचा दिया तो दस रुपये की यह मूल्य वृद्धि कैसे जायज थी और किस प्रकार सरकारों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की. डीजल में दो रुपये प्रति लीटर की वृद्धि होने पर जब निजी बस/आटो वाले प्रति सवारी दो रुपये प्रति किलोमीटर की वृद्धि कर दी जाती है. ट्रकों और बसों के किराये में दस प्रतिशत की वृद्धि कर दी जाती है. सब्जियों, दालों के भाव आसमान छूने लगते हैं. वह दाल जिसका दाम किसान को पच्चीस से तीस रुपये किलो दिया जाता है, सौ रुपये तक कैसे पहुंच जाती है. किसान ने तो जमाखोरी नहीं की, क्योंकि उसके पास जमा करने के लिये कोई व्यवस्था है ही नहीं. न ही वह आर्थिक रूप से इतना मजबूत होता है कि अपनी फसल का स्टाक कर सके. छोटे और मझोले किसान को तो अपनी फसल (यदि वह बाढ़-सूखे और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से बच गयी तो) को तुरन्त निकालना ही होता है जिससे वह अपने परिवार का पेट पाल सके और अपने कर्जों को निपटा सके. फिर यह जमाखोर...

एक पुलिस वाला जो रोज चेकिंग करता था.

एक पुलिस वाले को मैं रोज देखता था, दो सितारा धारी दरोगा. बहुत मेहनती. सुबह आठ बजे से ही राष्ट्रीय राजमार्ग पर खड़ा नजर आता था. हाथ में चालान की किताब लिये हुये और बड़ी मेहनत से चेकिंग करता था. लगभग रोज ही पन्द्रह-बीस चालान तो करता ही होगा. मुझे यह देखकर बड़ा अच्छा लगता था कि कम से कम यह एक व्यक्ति तो इतनी शिद्दत के साथ अपनी ड्यूटी निभा रहा है. एकाग्र होकर अपने काम पर लगे रहना कोई कम बड़ी बात नहीं जब आज के युग में हर व्यक्ति कहीं न कहीं से चार पैसे उगाहने के चक्कर में लगा रहता है, ऐसे उदाहरण तो बिरले ही होंगे. मैंने सोचा कि चलो एक बार इससे मिलकर अपनी भावनाओं को प्रकट कर दूं. लेकिन मैं ऐसा कर नहीं पाया, जोकि अच्छा ही हुआ. कुछ दिनों बाद मेरी यह भ्रान्ति दूर हो गयी. अभी कुछ दिनों पहले उसी राजमार्ग पर रात में नौ बजे मैं उस जगह से गुजर रहा था. ट्रकों की लम्बी लाइन लगी हुई थी, उन दरोगा जी की मोटर-साइकिल किनारे खड़ी हुई थी और एक सिपाही जी डंडा खड़का रहे थे, दरोगा जी किनारे से खड़े होकर हाथ में कुछ पकड़ रहे थे और हाथ को सीधे जेब में ले जा रहे थे. मुझे बड़ी शान्ति महसूस हुई.

अब आप भी पुलिस की कुर्सी पर बैठ सकते हैं.

अब आप भी पुलिस अधीक्षक की कुर्सी पर बैठ सकते हैं. यह मजाक नहीं है, बिल्कुल सत्य है. मेरी बात न मानें तो औरेया के पुलिस अधीक्षक से पूछ लीजिये. घटना एक दिन पुरानी है. इन्जीनियर मनोज गुप्ता की याद है आपको जिनके कत्ल का मुख्य आरोपी है विधायक शेखर तिवारी. इसी हत्याकांड में दिबियापुर के थानाध्यक्ष होशियार सिंह की भूमिका संदेहास्पद थी और बाद में इसे भी आरोपी बनाया गया. बाद में इसे बर्खास्त भी किया और इसकी गिरफ्तारी पर तीस हजार इनाम भी घोषित किया गया. पुलिस की नौटंकी देखिये कि एक वांछित अपराधी शान से आता है, थाने में आत्मसमर्पण करता है और फिर बैठने के लिये उसे थानाध्यक्ष की कुर्सी मुहैया कराई जाती है. एक हत्यारोपी के साथ इतना अच्छा व्यवहार, मानवाधिकारों का हर रोज उल्लंघन करने वाली पुलिस इतनी उदार हो गयी कि सलाखों के पीछे धकेलने की जगह थानाध्यक्ष की कुर्सी उपलब्ध कराई गयी. बाद में पुजारी महोदय थाने के अन्दर ही उसे प्रसाद देते नजर आते हैं, यह आरोपी आरती करता है. वाह, पुलिस का यह रूप कितना सुन्दर है. पुलिस अधीक्षक से पूछने पर जवाब मिलता है कि कुर्सी कुर्सी सब एक सी, यह भी सरकारी, वह भी सरकारी. कि...

नेताओं की सुरक्षा का सवाल

नेता बड़े चिन्तित हैं कि गृह मन्त्री चिदम्बरम कुछ नेताओं की सुरक्षा में कमी करने के निकट हैं. लालू और मुलायम विशेषत: बहुत चिन्तित हैं कि उनकी सुरक्षा में कमी न हो जाये, दोनों नेता संसद में कह रहे थे कि यदि उनकी सुरक्षा हटाई जाती है और उन पर कोई खतरा होता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी. पांच सौ चालीस सांसदों पर लगभग छ: सौ करोड़ रुपये खर्चा उनकी सुरक्षा पर होता है. एक गरीब देश जहां एक आम आदमी को बीस रुपये रोज से भी कम पर गुजारा करना पड़ता है वहां इन पांच सौ चालीस लोगों पर इतना खर्च करना विलासिता ही है. कांग्रेस के एक नेता का यह भी कहना था कि नेता आतंकवाद, नक्सलवाद के खिलाफ बोलते हैं, काम करते हैं तो उनके लिये सुरक्षा दिया जाना बहुत आवश्यक है. लेकिन उन पुलिसवालों को कौन सी सुरक्षा दी जाये जो बेचारे यह जानते हुये भी कि नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में जाने पर न जाने क्या पता किस बारूदी सुरंग पर या किस गोली पर उनका नाम लिखा हो, इन क्षेत्रों में नक्सलियों का मुकाबला करने हेतु जाते हैं. उनकी सुरक्षा के लिये क्या किया जाता है, उन्हें तो एक ढ़ंग की बुलेटप्रूफ जैकेट भी उपलब्ध नहीं होती. उन्हें...

भारत के पूर्व राष्ट्रपति महोदय का अपमान.

भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्रीमान एपीजे अब्दुल कलाम साहब के साथ कान्टीनेन्टल एअरलाइन्स ने सुरक्षा जांच के लिये उनके जूते खुलवाये , उनके पर्स और मोबाइल की जांच भी की। इस घटना को लेकर भारत की मीडिया में भी काफी हो हल्ला हुआ और संसद में भी इस घटना को लेकर हंगामा हुआ . इस घटना को लेकर एक राय में अमेरिकन एअरलाइन्स की निन्दा की गयी और अन्ततोगत्वा एअरलाइन्स ने इस घटना पर माफी मांग ली . लेकिन वह भी महामहिम तक नहीं पहुँची। इस घटना में तीन मुख्य बिन्दु सामने दिखाई देते हैं . पहला कि यह घटना अप्रैल में हुई थी तो पूर्व राष्ट्रपति के साथ मौजूद अधिकारियों ने इसे अब तक क्यों दबाये रखा ? इसे अब तक छुपाये रखने के पीछे क्या मकसद था ? क्या भारतीय अधिकारी भारत की जमीन पर ही एक विदेशी को भारत के प्रोटोकाल का पालन कराने में सक्षम नहीं हैं या भारतीय अधिकारियों को ही प्रोटोकाल का ज्ञान नहीं है ? या फिर यह एक विदेशी गोरी चमड़ी के आगे आत्म - समर्पण करने का ...

किशोर कुमार के दो गाने जो बहुत प्रेरणा दायक हैं.

http://www.youtube.com/watch?v=72hYfRoNqb8 http://www.youtube.com/watch?v=Vquw0Cj_NP8 ऊपर दिए लिंक में किशोर कुमार के गाये हुए गाने हैं । पहला इम्तिहान का गाना है - " रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, काँटों पर चल के मिलेंगे साए बहार के । " मजरूह सुल्तानपुरी साहब द्वारा लिखा गया और लक्ष्मी कान्त प्यारेलाल द्वारा संगीत बद्ध किया हुआ । दूसरा गाना मशाल का है -" लिए सपने निगाहों में, चला हूँ तेरी राहों में , जिंदगी आ रहा हूँ मैं । " जावेद अख्तर का लिखा हुआ और ह्रदय नाथ मंगेशकर का संगीतबद्ध किया हुआ । दोनों गाने बड़े ही प्रेरणा दायक हैं, सुमधुर हैं और कर्ण- प्रिय हैं । किशोर कुमार की आवाज का जो जादू है उसका मजा लीजिये । दर - असल आज कहीं बाहर हूँ और नेट पर कुछ गानों को तलाश रहा था। इन गीतों को सुनने की इच्छा हुई और तब सोचा कि अकेले क्यों सुनूं ? आपको भी क्यों न सुनाऊं ?? आप भी सुनें। ये इसलिए नहीं कि पोस्ट लिखना था , बस आपको भी साथ में लेने का मन हो गया।

धार्मिक स्थल और बिजली की व्यवस्था

अल्पसंख्यकों का एक धार्मिक स्थल है. आजकल उसमें एक कार्यक्रम चल रहा है. लगभग आधा किलोमीटर तक सड़क के दोनों ओर बल्ब और ट्यूब लाइटें लगी हुई हैं. तकरीबन सौ ट्यूब लाइटें और पांच सौ बल्ब लगे होंगे अर्थात पैंतीस-छत्तीस यूनिट प्रतिघंटा. यदि दस घंटा प्रति दिन के हिसाब से जोड़ा जाये तो तीन सौ पचास यूनिट प्रतिदिन तथा पांच दिनों में एक हजार सात सौ यूनिट. मजे की बात यह कि बिजलीघर, थाना तथा तहसील और मन्त्री निवास पास में. इन बल्ब और ट्यूब लाइटों के लिये सीधे ही बिजली के खम्भे से सप्लाई मिलती है, किसी को दिखाई नहीं देता. यह किस दायरे में आता है?? ऐसा भी नहीं है कि अन्य धर्मों वाले ऐसा नहीं करते जिसे जब भी मौका मिलता है बिजली विभाग पर यह मेहरबानी कर देता है और उन्हें भी पुण्य का भागीदार बना देता है। एक तो वैसे ही व्यापारी सडकों को घेर लेते हैं, कुछ वर्ष पहले तक जो नालियाँ दिखाई देती थीं, आज वह ईमानदारी की तरह गायब हो चुकी हैं, अब जो भी सड़क का हिस्सा बाकी रह जाता है, ये पुण्य बांटने वाले उन पर खम्भे गाड़ने के लिए गड्ढे कर देते हैं। इसके बाद खम्भों पर झालरें टांग दी जाती हैं। यदि कोई राहगीर धोखे से इनसे...

रीता बहुगुणा, मायावती और राहुल गांधी

श्रीमती रीता बहुगुणा ने जो कुछ कहा उसके लिये उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की गयी, लेकिन उसके बाद जो कुछ भी उनके विरुद्ध किया गया, जिस प्रकार से उनके घर को आग लगाई गई, वह अत्यन्त ही निन्दनीय है। लेकिन पुलिस द्वारा उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी, जिन तत्वों द्वारा आग लगाई गयी. सुश्री मायावती ने आज अपने बयान में कहा है कि अगर उन्होंने अपने समर्थकों को न रोका होता तो पूरे देश में हंगामा मच गया होता और कांग्रेस कार्यकर्ता चूहे की तरह कोने में छुपे नजर आते. तकरीबन ऐसी ही आगजनी की घटना उनके साथ कुछ वर्ष पहले हुई थी जिसे गेस्टहाउस कांड का नाम दिया। लगभग इसी प्रकार का बयान कुछ वर्ष पूर्व मायावती जी भी दे चुकी हैं. अच्छा होता यदि रीता बहुगुणा जोशी के घर को आग के हवाले करने वाले उपद्रवियों के विरुद्ध भी उसी तेजी से उतनी ही कड़ी कार्रवाई की जाती जिस तेजी से रीता बहुगुणा के विरुद्ध की गयी. रही बात कांग्रेस तथा बसपा के बीच हो रही नूराकुश्ती की तो यह इससे स्पष्ट है कि न तो कांग्रेस ही उत्तर प्रदेश सरकार के विरुद्ध कुछ करने जा रही है और न ही बसपा कांग्रेस से समर्थन वापस ले रही है यद्यपि इससे ...

लखीमपुर में दरोगा की हत्या करने वाले का एन-काउंटर

लखीमपुर में दारोगा की हत्या करने वाले अपराधी का एन्काउन्टर लखनऊ में कर दिया गया. अपराधियों के साथ शठे शाठ्यं समाचरेत का ही व्यवहार होना चाहिये. लेकिन जब कभी पुलिस कर्मी की हत्या होती है तभी क्यों अपराधी का एन्काउन्टर होता है, यह स्थिति आम आदमी के हत्यारे के साथ क्यों नहीं होती. इसका सीधा साधा सा अर्थ यह है कि या तो पुलिस आम आदमी की जान को जान नहीं समझती या फिर उसे भी यह लगता है कि कानून का पालन करते हुये मुजरिम को सजा दिलवाने में वह असमर्थ है इसलिये लगे हाथों हिसाब चुकता कर लेती है. स्वतन्त्रता के बाद से हुई हत्याओं का खाता खोलकर देख लिया जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि पुलिस वालों की हत्या करने वाले अपराधियों में से अधिकांश पुलिस मुठभेड़ में मारे गये लेकिन आम आदमी के हत्यारे पुलिस मुठभेड़ में नहीं मारे जाते. क्या आम आदमी की जान जान नहीं होती? प्रश्न यही है कि आम आदमी के हत्यारे मुठभेड़ में क्यों नहीं मार गिराये जाते. न जाने कितने ही अपराधी ऐसे हैं जो राजनीति की गंगा में डुबकी लगाकर माननीय बन गये हैं, पुलिस उनके विरुद्ध क्यों कार्रवाई नहीं करती.

वकीलों की हड़ताल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हड़ताली डाक्टरों का एक माह का वेतन काटने के निर्देश दिये हैं, जो काफी हद तक ठीक भी हैं, लेकिन वकीलों के बारे में क्या किया जाये? वकीलों को सर्विस टैक्स के दायरे में क्या लाया गया, वकील हड़ताल पर चले गये. सर्विस टैक्स वे कौन सा अपनी जेब से भरेंगे?? इस टैक्स का बोझ भी अन्तिम उपभोक्ता अर्थात मुवक्किल पर पड़ेगा. फिर आखिर क्यों वकील हड़ताल करने पर उतारू हो गये और इस हड़ताल से किसका नुकसान है, कम से कम वकीलों का तो नहीं और अगर होगा भी तो उस मात्रा में नहीं जिस मात्रा में सरकारी कर्मचारियों का हो जाता है. उनकी सर्विस में ब्रेक नहीं होता, उनके विरुद्ध कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं होती. छोटी से छोटी बात पर हड़ताल पर जाने वकील यह क्यों नहीं सोचते कि उनके हड़ताल पर जाने से उनके मुवक्किलों का कितना नुकसान होता होगा. लेकिन इस देश में किसी को किसी की परवाह नहीं, हर किसी को अपनी परवाह है. हर कोई चाहता है कि भगत सिंह, सुभाष फिर जन्म लें, लेकिन मेरे घर में नहीं, पड़ोसी के यहां. इस मानसिकता को बढ़ाने का काम यहां के नौकरशाहों और राजनीतिबाजों ने बखूबी निभाया है और उसी का नतीजा है कि एक सौ बीस क...

एक रुका हुआ फैसला

कभी मौका लगे तो यह फिल्म देखिएगा , काफी अच्छी है , मुझे तो लगी, हो सकता है आप को भी अच्छी लगे। एक और बहुत महत्वपूर्ण फैसला /मुकदमा है जो शायद पचास या अधिक वर्षों से लंबित है। आपलोग समझ ही गए होंगे कि मैं किस मुक़दमे की बात कर रहा हूँ, राम-जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद मुक़दमे की। न्याय-पालिका में आस्था रखते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि इतना महत्वपूर्ण मुकदमा इतने लंबे समय से क्यों लंबित है? यह मुकदमा तो सभी पक्षकारों को, सरकारों को तथा वकीलों को जल्द से जल्द निपटवाना चाहिए था, जिस मुक़दमे या जिस वस्तु के कारण पूरे देश में असर पड़ता हो, तो क्या सभी सम्बंधित पक्षों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे इस मुक़दमे को विशेष दर्जा देते हुये जल्दी से जल्दी निपटवायें। यह कितना दुर्भाग्य-पूर्ण है कि इस मुकदमे से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण ओरिजिनल दस्तावेज ही गायब हो गये। आखिर क्या कारण है कि इतने महत्वपूर्ण मुद्दे को निपटवाने में सम्बन्धित पक्ष और राजनीतिक दल भी बहुत उत्साहित दिखाई नहीं देते. जिस मसले को प्राथमिकता देकर निपटवाना चाहिये था उसके निर्णीत होने की सम्भावना अभी बहुत दूर है। आखिर कब इस म...

डॉक्टर राही मासूम रजा साहब का एक बेहतरीन उपन्यास

एक दिन इन्टरनेट पर मुझे डॉक्टर राही मासूम रजा साहब का एक उपन्यास टोपी शुक्ला के कुछ हिस्से पढने को मिले । बाद में उपन्यास का लिंक भी मिल गया । यह एक बहुत अच्छा उपन्यास है , आप लोग भी इसे पढ़कर देखें । लिंक नीचे दे रखा है । http://rapidshare.com/files/247347996/topi_shukla.pdf

घुमड़-घुमड़ कर आए बादल

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कल का ले बादल खूब घु मड़ - घुमड़ कर आए , लेकिन कुछ देर ही बरसे। प्रार्थना है कि एक - दो दिन में और वर्षा हो और उत्तर प्रदेश में सूखा न पड़े। मेरे कंप्यूटर में वायरस आने से चार दिनों से गूगल , जीमेल और ब्लॉगर नहीं खुल रहा था। आज वायरस को हटा दिया है और अब आपके सामने हाजिर हूँ .

क्या यह प्रायोजित भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय शर्म नहीं है???

अभी पेट्रोल के दाम चार रुपये लीटर और डीजल के दो रुपये प्रति लीटर बढे़. आटो एल०पी०जी० और सी०एन०जी० के दामों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई. इस बढ़ोत्तरी का मतलब हुआ कि पेट्रोल के दाम लगभग दस प्रतिशत तथा डीजल के दाम छ: प्रतिशत बढ़े. अब इस देश में मुनाफाखोरी का अंदाजा इस बात से लगाइये कि वैध-अवैध एल०पी०जी० से चलने वाले आटो के मालिकों ने उस दूरी दो किमी० का किराया आठ रुपये कर दिया जिसका किराया पहले पांच रुपये था. प्रति सवारी तीन रुपये की वृद्धि! अर्थात साठ प्रतिशत की वृद्धि, यदि एक आटो दस सवारी ढोता है तो तीस रुपये का सीधा फायदा, जबकि उसकी रनिंग कास्ट पर कोई अन्तर नहीं पड़ा, यदि आटो पेट्रोल से चलता है तो दो किमी० पर यह वृद्धि मात्र एक रुपये हुई और इसे अगर दस से भाग दें तो यह दस पैसे प्रति सवारी बैठी. यानि दस पैसे कीमत बढ़ी और अधिक वसूले गये तीन सौ पैसे, तीस गुना अधिक. क्या यह चोरी-डकैती-भ्रष्टाचार नहीं है? आखिर इस चोर-डकैती-भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई कानून क्यों नहीं है? सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था का यही आलम है, जिसकी गाज सीधे-सीधे अंतिम उपभोक्ता अर्थात आम आदमी पर गिरती है. मंहगाई का सूचकांक निग...

मुजफ्फरनगर में पुलिस हिरासत में मौत

भारत की पुलिस कभी नहीं सुधरेगी. देहरादून में रणवीर के एन्काउंटर के मामले को अभी दस दिन भी नहीं हुये थे कि उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक अन्य व्यक्ति की पुलिस हिरासत में मौत हो गई. पता नहीं क्या खासियत है भारतीय पुलिस में कि जब कोई नेता हिरासत में लिया जाता है तो उसकी तबियत तुरन्त गड़बड़ हो जाती है और फिर उसे यही पुलिस वाले अस्पताल में भर्ती करा देते हैं. लेकिन जब किसी गरीब को हिरासत में लिया जाता है तो कई मामलों में वह थाने-हवालात में आत्महत्या कर लेता है या फिर उसकी तबियत खराब हो जाती है और अस्पताल ले जाने तक उसकी मौत हो जाती है. आपको ध्यान होगा कि उत्तर प्रदेश में इन्डियन जस्टिस पार्टी के उम्मीदवार ने अपनी हत्या की आशंका जताई थी जो सच भी हुई और पुलिस उसे अन्त तक आत्महत्या का मामला बताती रही. आगे इसमें क्या हुआ, पता नहीं. भारतीय पुलिस अपने लिये सबसे ऊपर समझती है तथा न्यायाधीश की भूमिका अपनाती है. जब पुलिस ही गलत काम करेगी तो उसे कौन पकड़ेगा. कुछ लोग कह सकते हैं कि यहां भी अपवाद हो सकते हैं, कुछ लोगों के गलत होने के कारण सब को गलत नहीं कहा जा सकता, किन्तु पुलिस-प्रशासन, चिकित्सक और न्...

श्रीमान ओम व्यास का जाना

जैसे ही स्क्रॉल होते हुए ख़बर पढ़ी कि अपोलो , दिल्ली में पिछले एक माह से भर्ती श्रीमान ओ म व्यास का निधन हो गया , बहुत धक्का लगा । पिछले माह हुई सड़क दुर्घटना में तीन अन्य कवि तो उसी समय काल - कवलित हो गए थे , तथा ओ म व्यास जी घायल हो गए थे । जिन्होंने भी उन्हें सुन रखा था , वे सब प्रार्थना कर रहे थे कि व्यास जी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ हो , लेकिन ईश्वर की इच्छा के आगे कोई कर भी क्या सकता है . पिता और माता को समर्पित उनके गीत या कविता जो भी कह लीजिये , मुझे भूले नहीं भूलते । श्रीमान ओ म व्यास को श्रद्धांजलि ।

दिल्ली में वकीलों ने जज को पीटा

आज एक ख़बर थी कि दिल्ली की तीसहजारी कोर्ट में वकीलों ने जज की किसी टिप्पणी से क्षुब्ध होकर जज से हाथापाई कर दी । मुझे नहीं पता कि जज ने क्या टिप्पणी की वकीलों पर । लेकिन बात यह है कि जो वकील इन्साफ के मार्ग पर चलने का दावा करते हैं , दुनिया के लिए क़ानून सिखाते , पढाते और दिखाते हैं वह स्वयम ही क़ानून का पालन करना उचित नहीं समझते । आख़िर ये किस प्रकार के वकील हैं , यदि जज ने कोई अशोभनीय टिप्पणी की थी तो उसके लिए भी क़ानून के दायरे में कार्रवाई की जा सकती है , लेकिन जज से हाथापाई करना कहाँ तक उचित है । यहाँ तो law-maker ही law-breaker बनते जा रहे हैं , जो अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है ।

माइकल जैकसन को अन्तिम विदाई

माइकल जैक्सन के बारे में मुझे कोई बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी. कारण था कि मुझे कभी अंग्रेजी गाने समझ में आये ही नहीं या फिर यूं कह लीजिये कि मैंने कभी समझने की इच्छा नहीं की. कई वर्ष पहले मेरे एक मित्र महोदय के पास थ्रिलर और शायद "ब्लड आन द फ्लोर" के कैसेट हुआ करते थे. मित्र बड़े शौकीन थे, अंग्रेजी गानों के. मुझे भी कई बार उन्होंने गानों के बारे में बताया, समझाया और सुनवाया. इन्टरनेट के माध्यम से जाना कि विगत पच्चीस जून को माइकल जैक्सन का निधन दिल का दौरा पड़ने से हो गया. झटका लगा क्योंकि pop संगीत की दुनिया में बड़ा नाम थे जैक्सन और ऊपर से उमर भी कोई बहुत अधिक नहीं थी, सिर्फ पचास साल. माइकल की जिन्दगी विवादों में भी आयी, बच्चों के यौन शोषण को लेकर. सच-झूठ का तो पता नहीं, लेकिन एक अद्वितीय व्यक्तित्व के स्वामी तो थे ही. कल रात दस बजे के आस-पास समाचार सुनने के लिये टेलीविजन खोला तो पता लगा कि लास एंजिल्स से माइकल जैक्सन का अंतिम संस्कार का सीधा प्रसारण किया जायेगा. पहले लगा कि कहीं ऐसा न हो कि चैनल अपनी नीति के अनुसार हर पांच मिनट के बाद विज्ञापन दिखाने लगें और कहें कि माइकल जैक...

ई० वी० एम० को अस्वीकार करने की वकालत की नेताओं ने.

ईवीएम पर आडवाणी समेत कई नेताओं ने प्रश्न चिन्ह लगाये हैं तथा महाराष्ट्र चुनावों में मतपत्रों के प्रयोग की मांग की है. यह एक स्थापित तथ्य है कि कई देशों में इन मशीनों का प्रयोग प्रतिबन्धित है. कई बुद्धिजीवियों ने भी ब्लाग/अखबार के माध्यम से इन मशीनों में हो सकने वाली गड़बड़ियों के बारे में व्यापक रूप से बताया भी है. इसके अतिरिक्त प्रो०साईंनाथ ने भी इन मशीनों के प्रयोग के विरुद्ध मुकदमा भी किया था. परम्परा के अनुरूप कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने उपरोक्त मांग की खिल्ली उड़ाते हुये कहा कि ऐसी बात करना देश को पीछे ले जाना है. मैं एक बार फिर अपनी बात दोहराना चाहता हूं कि इन मशीनों को सिर्फ एक छोटे से बदलाव से अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है. इसमें एक डिस्प्ले यूनिट लगाई जा सकती है जिसमें तमाम प्रत्याशियों के चुनाव चिन्ह, नाम, प्राप्त वोट तथा कुल वोट दिखाई देते रहें. जैसे ही मतदाता अपनी पसन्द के प्रत्याशी के नाम के आगे का बटन दबाये, वैसे ही उस प्रत्याशी के वोटों की संख्या एक वोट से और कुल वोटों की संख्या भी एक वोट से बढ़ जाये तथा यह बराबर डिस्प्ले होता रहे. इससे यह लाभ भी है कि मशीनों को ...

देहरादून में रणवीर की हत्या

कल मैंने देहरादून की बहादुर पुलिस के बारे में लिखा था कि उसने कितनी बहादुरी से एक युवक को मौत के घाट उतारा. उत्तराखंड के मुख्यमन्त्री ने एस०एस०पी० को हटा दिया और बाकी पुलिस वालों को लाइनहाजिर कर दिया. अब जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों से लगभग साफ हो चुका है कि उक्त युवक की निर्ममता पूर्वक हत्या की गयी, यह कार्रवाई काफी नहीं है. इन पुलिस वालों को अविलम्ब सेवा निवृत्ति दे इन्हें सलाखों के पीछे डालकर हत्या का मुकदमा चलाना चाहिये. जिसे प्रदेश सरकार सेवानिवृत्त नहीं कर सकती उसके विरुद्ध कार्रवाई करने के लिये राष्ट्रपति को अनुरोध पत्र लिखना चाहिये. अन्यथा पुलिस की वर्दी में ऐसे अपराधियों के हौसले यूंही बुलन्द होते रहेंगे. लाइन-हाजिर करना कोई सजा नहीं है, न ही ट्रांसफर कोई सजा है, इनके साथ वही व्यवहार किया जाना चाहिये जो आम अपराधी के साथ पुलिस किया करती है. चूंकि इन अपराधियों के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाती और यह अपराधी अपने रसूख और पैसे तथा संबंधों के बल पर तथा पुलिस और प्रशासन के अपने लोगों को बचाने की हठधर्मिता के चलते बच जाते हैं और एक अन्य अपराध करने के...

समलैंगिकता और गिरगिट

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समलैंगिकता के चर्चे चारों तरफ छाये हुये हैं, ऐसे में कल मुझे अकस्मात ही गिरगिट की प्रणय लीला देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. जिसमें कुछ दृश्य कैमरे पर कैद करने में सफलता मिल पायी. आप भी देखिये. पहले पहल एक गिरगिट आता है फिर वह इधर- उधर देखता है. कुछ देर तक वह झाडियों में घूमता है. फिर दूसरा गिरगिट आ जाता है. अब एक गिरगिट अपने गले के नीचे थैली फुलाता है, इस थैली का रंग भी बदलने लगता है. लगता है कि यह अपने साथी को आकर्षित करने के लिये ऐसा कर रहा है. अब दूसरा गिरगिट भी अपनी थैली को फुलाता है और दोनों गिरगिट एक दूसरे के नजदीक आ जाते हैं. इसके बाद कुछ सेकेन्डों के लिये उनकी प्रणय लीला चलती है और फिर दोनों गिरगिट अलग हो जाते हैं. प्रकृति में हर चीज अपने स्थान पर फिट है और हर एक जीव को कोई न कोई खासियत अता की है. गिरगिट की तरह रंग बदल लेना मुहावरे को हम लोग निन्दात्मक रूप में प्रयोग करते हैं लेकिन यह रंग बदलने की विशेषता ही गिरगिट के लिये वरदान है. कभी रंग बदलते गिरगिट को देखिये कितना अद्भुत लगता है. ( नेताओं को मत देखियेगा).

भारतीय पुलिस का एक और बहादुरी का कारनामा

भारत की पुलिस वैसे ही बहादुरी के लिए विख्यात है । अभी चित्रकूट में उत्तर प्रदेश की पुलिस ने बहुत बहादुरी से काम लिया और तीन दिन के बाद कई मकानों को जलाने के बाद डकैत को मार गिराने में कामयाब हुई । फिर दस दिन पहले लखीमपुर में पूरी बहादुरी के साथ एक महिला को ट्रेन से धक्का देकर मार गिरा सकी । उसके बाद दो दिन पहले लखनऊ में एक महिला को बामुश्किल मार - पीटकर उसके पैर तोड़ने में कामयाब हो पाई । अब देहरादून पुलिस एक एम ०बी० ए० युवक को बड़ी मशक्कत के बाद पाँच गोलियां मारकर मारने में कामयाब हुई । यह युवक गाजियाबाद से नौकरी करने देहरादून आया था । युवक क्या था पूरा आतंकवादी था, एक मोटर-साइकिल, तीन लड़के, एक तमंचा, एक पिस्टल। दरोगा और सिपाहियों पर दिन में हमला। किस्मत अच्छी, दरोगा बचा, पुलिस वाले बचे। बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होए। इसलिए बाल बांका न हुआ, न दरोगा का, न सिपाहियों का, वरना कौन कसर छोड़ रखी थी एम०बी०ए० पास नौकरी करने आए युवक ने। क्या पता नौ एम०एम० पिस्टल चल जाती तो? यहाँ तो शहादत हो जा...

पेट्रोल डीजल महंगा होने जा रहा है

आज रात से पेट्रोल डीजल महंगा हो जाएगा। निजी ऑटो, बस, टेंपो, ट्रक वाले फिर किराये में बढोतरी कर देंगे। एक बार फिर आम इस्तेमाल की चीजें महंगी हो जायेंगी। और जो किराया एक बार बढ़ गया वो कभी कम नहीं होता। महंगाई का सूचकांक ऋणात्मक चिन्ह दिखायेगा। जो किसान अन्न पैदा करता है वो वैसे ही आत्महत्या करता रहेगा। माई दिलासा देती रहेंगीं। मुखिया जी भी कुछ न कुछ सांत्वना के शब्द कहेंगे। देश वैसे ही आगे बढ़ता रहेगा। जब बड़ों की तरक्की होगी तो बाकियों की भी होगी। इसलिए बड़ों की तरक्की पहले। देश आगे बढेगा तो हम बढ़ेंगे। लोग बीस रुपये प्रतिदिन के औसत से कम पर भी जिन्दा रहेंगे। प्लास्टिक पीटर प्लास्टिक पीटते रहेंगे। देश का उत्थान जारी रहेगा। जय हो।