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Showing posts from September, 2008

अपनी ऐयाशी की कहानी.

अपनी ऐयाशी की कहानी बयान कर रहा हूँ । जी हाँ , एक ऐयाशी मैंने भी की , पिछले साल अगस्त में । मेरे पिताजी एक अध्यापक हैं , इस वर्ष वह सेवानिवृत्त हो गए हैं । पिछले दो - तीन वर्षों से मैं एक कार लेने की सोच रहा था , कई दफा भीड़ - भाड़ से तंग आकर मैंने बाहर जाने के कई प्रोग्राम रद्द कर दिए । इनमें से दो - तीन मेरी ससुराल जाने के भी थे , हालाँकि मेरी ससुराल मेरे शहर से लगभग तीन घंटे की दूरी पर है , लेकिन कई बार जब मैंने ससुराल जाने के लिए मना कर दिया तो मेरी धर्मपत्नी काफी कुंठित हो गयीं । एक - दो बार झगड़े की भी नौबत आ गई, अत : पिताजी ने कार लेने के लिए कुछ पैसा अपने पास से दे दिया और बाकी का बैंक से फाइनेंस करा दिया । अंततोगत्वा घर पर कार आ गई , नई कार थी , शौकिया खूब चलाई गई । कुछ दिनों बड़ा उत्साह रहा , कार पर बैठ कर कुछ और दिखाई ही नहीं देता था । थोड़े दिनों बाद जब कार का नशा उतरा और आंखों ने इधर - उधर भी देखना शुरू किया तब जो दृश्य...

एक था मोहन लाल शर्मा और एक था विक्रम बत्रा

दोनों की याद मुझे इसलिए आ गई क्योंकि जब मोहन लाल जी शहीद हुए थे तो एक-दो दिन मीडिया ने थोड़ा-बहुत दिखाया फिर भूल गई, यही हाल विक्रम बत्रा का किया था, कारगिल वार के दौरान आपने इस युवा सेनानी को देखा होगा, कभी क्लीन शेव तो कुछ दिन बाद दाढ़ी में, संभवत: आपने तोप के साथ खड़े हुए भी देखा होगा इस जांबाज सेनानी को, जिसे मालूम था कि पता नहीं सामने से आती कौन सी गोली उसके सीने में धंस जाए, कौन सा मोर्टार आकर उसके जिस्म के चीथड़े कर दे। उसके घर पर उसके माता-पिता भी इंतजार कर रहे होंगे कि कब युद्ध ख़त्म हो और कब उनके जिगर का टुकड़ा घर आए, उसकी पत्नी अपने सुहाग की वापसी का इंतजार कर रही होगी, कितना बड़ा कलेजा था उन लोगों का, जिन्होंने अपने प्रियजन को मौत के आगे भेज दिया। यही बात मोहन लाल जी के बारे में भी कही जा सकती है जो यह जानते हुए भी कि अन्दर आतंकवादी हैं जो गोली चलाने से पहले सांप्रदायिक सद्भाव और धर्म-निरपेक्षता नहीं निभाएंगे, उनका सामना करने पहुंचे और सीने पर तीन गोलियां खाकर गिर गए। यही बात कही जा सकती है उन जवानों के बारे में जिन्होंने संसद पर हमले के समय अपने जिस्म को नेताओं की ढ़ाल बनाकर पेश...

नई बोतल में पुरानी शराब, एक पुरानी पोस्ट .

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एक पुरानी पोस्ट है जो दोबारा अपलोड कर रहा हूँ, मुझे तो यह प्रासंगिक लगती है, पता नहीं आपको कैसी लगेगी! यह लीप में लिखी गई थी जिसे वर्ड में पेस्ट किया था लेकिन यूनीकोड में नहीं बदल सका इसलिए इसे print screen से capture कर पेंट के माध्यम से JPG में बदल कर यहाँ प्रस्तुत किया है, कृपया इसे पढ़ें तथा ऊपर लिखी समस्या का समाधान यदि कोई हो तो बताने की कृपा करें।

अब की बार बम रखने के टाइम और स्थान के बारे में गृह मंत्री को जरूर बता देना. .

हाय रे आतंकवादियों , कितनी धृष्टता का काम किया तुमने , बम रख तो दिए लेकिन हमारे गृह मंत्री महोदय को यह नहीं बताया कि कब और कहाँ रखोगे , अगर सब के बारे में नहीं बताते तो एक - दो के ही बारे में बता देते , कम से कम बेचारों को इतना बेइज्जत तो न होना पड़ता , कुछ तो इज्जत बच जाती। मोदी ने वैसे भी कोई कसर नहीं छोड़ी भद पीटने में यह कहकर कि उन्होंने दिल्ली बम धमाकों के बारे में पहले ही आगाह कर दिया था। लालू भाई भी न जाने किस जनम की दुश्मनी निकाल रहे हैं यह कहकर कि यह एक इंटेलिजेंस failure है। जब इंटेलिजेंस वाले किसी को दोष नहीं देते कि फलाँ - फलाँ के होते हुए सीमा से ड्रग्स और हथियार आ रहे हैं , यह उनकी चूक है तो इंटेलिजेंस वालों पर ऊँगली क्यों उठाई जा रही है। हमारे गृह राज्य मंत्री कह ही चुके हैं कि ११० करोड़ लोगों में हर एक के पीछे तो पुलिस प्रोटेक्शन दिया नहीं जा सकता , जब बेचारे सब बड़े अफसरों और नेताओं को प्रोटेक्शन नहीं मिल ...

इस सब के लिए कोई भी मुस्लिम दोषी नहीं है, दोषी हैं तो स्वयं हिन्दू समाज के पथभ्रष्ट लोग.

भारत में फिर बम धमाके हुए, लगभग पच्चीस लोग मारे गए और सौ के आसपास घायल हुए, एक बार फिर वही नौटंकी हुई, पूरे देश में सारे रंगों के एलर्ट कर दिए गए, पुलिस को मुस्तैद कर दिया गया, खुफिया को और चौकन्ना कर दिया गया, कुछ जगहों की सुरक्षा और बढ़ा दी गई. मरने वालों और घायलों की कीमत अदा कर दी गई. मीडिया ने फिर हौसला अफजाई करने का राग अलापना शुरू कर दिया कि दिल्ली वालों की हिम्मत नहीं टूटी है आज फिर काम पर निकले हैं, दिन भर मेहनत करने पेट पालने वाला आदमी अगर काम पर नहीं आएगा तो खायेगा क्या, क्या यह टेलिविज़न वाले उनके घर खाना पहुंचाएंगे, आज तक जितने लोग बम धमाकों में मारे गए हैं, उस विस्फोट वाले दिन के बाद कितने नेता और कितने मीडिया वाले दोबारा उनके घर गए? उससे पूछो जिनके घर के चिराग बुझ गए, किसी का बाप, किसी का बेटा, किसी की माँ, किसी की बहन, किसी का पति मारा गया, उनसे पूछो, टेलीविजन पर बोलने में कुछ नहीं जाता. उनसे पूछो जिनके घर तबाह हो गए हैं, क्या ये नेता, ये मीडिया वाले उनके प्रियजनों को वापस ला सकते हैं? एक बार फिर वही दोहराया प्रधानमंत्री महोदय ने कि संयम बनाये रखें, दोषियों को सजा दी जाय...

एक पुरानी रचना आज फिर दोहरा रहा हूँ.

आओ वीर आतंकियो आओ तुम्हारा स्वागत है इस धर्मनिरपेक्ष मुल्क में हम तैयार हैं तुम्हारे स्वागत को हमारे बच्चे भी, आओ तुम बम लगाओ हमारी जडें बहुत मजबूत हैं हिलेंगी नहीं तब भी, जब हमारा अस्तित्व खत्म हो जायेगा, तब भी कौमी तराने गूंजते रहेंगे चाहे उन्हें सुनने वाला कोई न हो तुम हमारी पीढियों को तबाह कर सकते हो क्योंकि तुम अल्प हो हम अपने बच्चों को आगे करते रहेंगे तुम उनके सीने चाक करते रहना क्योंकि तुम अल्प हो और जो चीज बढ जाती है उसे खत्म होना ही होता है इसलिये तुम बम लगाओ हम तुम्हें सजा नहीं देंगे, खीर देंगे खीर खाओ और इन्तजार करो कि कब एक आई सी ८१४ उडे और कब तुम्हें शाही मेहमान की तरह छोडा जाये तुम हमारे उन बच्चों के सीने गोलियों से छलनी कर दो जिन्हें हमने प्यार से पाला था बडे अरमानों से पोसा था तुम बम लगा सकते हो हम कोई कार्रवाई नहीं करेंगे क्योंकि हम वास्तविक धर्म निरपेक्ष हैं हम इतिहास से भी सबक नहीं लेंगे क्योंकि हम बहुल हैं, हम निरपेक्ष हैं आओ तुम स्वतन्त्र हो कहीं भी बम लगाओ ट्रेन में, पार्क में, पूजा स्थलों में, अदालतों में लेकिन हम फिर भी चुप रहेंगे तुम हमें सिरे से खत्म कर सकते...

भारत की आत्मा ने हरियाणा के थाने में आत्महत्या कर ली.

पिछले दिनों हरियाणा के पुलिस मुख्यालय में सरिता नाम की महिला ने सल्फास खाकर इसलिए आत्म हत्या कर ली क्योंकि उसके साथ पुलिस वालों ने बलात्कार किया था और शिकायत करने पर पुलिस अफसरों ने अपना पूरा कर्तव्य निभाते हुए उसकी शिकायत तक दर्ज नहीं होने दी, जिनसे उसने शिकायत की उसमें सर्किल अफसर से आई०जी० तक शामिल थे. इससे पहले मुंबई में जीआरपी के एक अधिकारी ने एक लड़के को निर्वस्त्र कर उसके गुप्तांगों में डंडे की सहायता से मिर्च लगायी. एक स्टिंग आपरेशन में यह दिखाया जा चुका है कि अगर आप के पास पैसे हों तो किसी की झूठी मुठभेड़ भी करायी जा सकती है, किसी बेक़सूर को किसी भी इल्जाम में फंसाया जा सकता है, ख़ुद राजधानी दिल्ली गवाह है ऐसे कई मामलों की जिसमें पुलिस ने लोगों को कई मामलों में झूठा फंसाया. टीवी पर देखा ही होगा कि पुलिस वाले किस तरह नेत्रहीन प्रदर्शनकारियों तक पर लाठियां भांजते हैं. इलाहाबाद में एक झूठी मुठभेड़ टीवी पर दिखाई गई थी जिसमें सरेंडर के लिए चिल्लाने वाले अपराधी को सरेंडर कराने के स्थान पर भगाया गया और पीछे से गोली मार दी गई, क्या यह कृत्य हत्या के दायरे में नहीं आता. यदि पुलिस वाले इ...

अ०भा०ब०स०क०का० पार्टी का घोषणा पत्र - पहला भाग

प्रिय (?) ब्लोगरो, आगामी चुनाव हेतु एक अखिल भारतीय बहुजन समाजवादी कम्युनिस्ट कांग्रेस पार्टी का गठन मेरे एक मित्र द्वारा किया जा रहा है, अब आगे उन्हीं के शब्दों में उनकी पार्टी का मैनिफेस्टो निम्नलिखित है, आशा करता हूँ कि आप अपने सदविचारों (??-मेरे अतिरिक्त और किसी के विचार सदविचार कैसे हो सकते हैं?) को रखेंगे. (यदि नहीं रखेंगे तो मेरा क्या ले जायेंगे?) ""सर्वप्रथम मैं राष्ट्र हित में धर्म-निरपेक्ष रहते हुए सभी धर्मों के अनुयायियों के साथ भेद-भाव न करने का वचन देता हूँ. तथा यह भी घोषणा करता हूँ कि सत्ता में आने पर प्रत्येक धर्म को उसकी मर्जी के अनुसार निजी क़ानून बनाने व लागू करने की छूट प्रदान करूंगा. क़ानून मानने न मानने के लिए सभी लोगों के विकल्प खुले होंगे कि क़ानून माने या न माने, माने तो फिर कौन सा माने. नव-धनाड्यों को गाड़ियों को असीमित रफ़्तार से दौड़ाने की खुली छूट होगी. वे जितने चाहे उतने एक्सीडेंट कर सकते हैं. वकीलों को भी छूट होगी कि वे एक दूसरे से मिलकर गवाहों को बरगला सकते हैं. पुलिस वालों को किसी की भी पिटाई करने और मारने की छूट होगी. सरकारी अफसरों को भ्रष्टाचार क...

समझौते को लेकर क्यों रोना???

बड़ा शोर मच रहा है न्यूक्लियर डील के ऊपर, कोई कह रहा है होना चाहिए तो कोई इसकी मुखालफत कर रहा है. अब एक पत्र वाशिंगटन पोस्ट ने लीक कर दिया तो उस पर फिर बवाल शुरू. मेरा यह कहना है कि हम परमाणु परीक्षण करें या न करें क्या फर्क पड़ता है. जब हमारे शीर्ष नेतृत्व के अन्दर कड़े निर्णय लेने की सामर्थ्य ही नहीं है तो फिर इस सब पर बहस करने की आवश्यकता है ही नहीं. कश्मीर पर कोई निर्णय नहीं, वही ढुलमुल रवैया, पाकिस्तान से चार बार युद्ध में विजय प्राप्त की, लेकिन नतीजा, वार्ता की मेज पर हार गए. पाकिस्तानी गोलाबारी और आतंकवाद में कितने लोग मारे गए, कितने सैनिक शहीद हो गए, लेकिन हमारे नेता बसें दौड़ाते रहे. बांगला देश आतंकियों को प्रश्रय देता रहा, हमारे सैनिकों को मारकर जानवरों की तरह लटका देता है, हमारा नेतृत्व निरीह और बेबस लोगों की तरह देखता रहता है. नेहरू जी ने संसद में घोषणा की थी कि चीन से अपनी एक-एक इंच जमीन वापस लेंगे, और उससे पहले कोई बात नहीं होगी, लेकिन क्या हुआ. जिस देश के नेता सिमी और बजरंग दल को एक पलड़े में तौलते हों और आतंकवादी संगठनों के प्रति घोषित/अघोषित सहानुभूति दिखाते हों और घुसपैठ...

समस्या पूर्ति

समस्या पूर्ति हिन्दी साहित्य की पुरानी विधा है, इसका प्रयोग मैं इसलिए करना चाहता हूँ क्योंकि मैंने कई बार लोगों को यह कहते सुना है और कई बार ख़ुद भी कह देता हूँ कि-"क्यों खून पी रहे हो या लोग तो आजकल खून पीने लगे हैं", इस पर एक वाक्य मेरे दिमाग में आया ----" आदमी का खून देखो पी रहा है आदमी" , कुछ और लाइनें भी लिखीं, लेकिन मुझे संतुष्टि नहीं हुई। अत: यह लाइनें मैं समस्या पूर्ति के रूप में विज्ञ ब्लोगरों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। आशा करता हूँ कि आप लोग इस पंक्ति को अपनी सुंदर रचना में स्थान देंगे।

बिहार में बाढ़ और राष्ट्रीय शर्म

पिछले दिनों प्रधान मंत्री महोदय ने उड़ीसा की हिंसा को राष्ट्रीय शर्म घोषित किया। इस पर श्रीमान सुरेश चिपलूनकर जी ने काफी विस्तार में एक सुंदर लेख लिखा था। उसी कड़ी में कुछ और पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं, हो सकता है कि इनमें से कुछ चिपलूनकर जी के ब्लॉग में आ चुकी हों। सबसे पहले तो बिहार की बाढ़ भी एक राष्ट्रीय शर्म है। आजादी के साठ साल बाद तक भी देश की नदियों को जोड़ा नहीं जा सका जिससे कि अनावृष्टि या अतिवृष्टि के समय दुर्भिक्ष या बाढ़ जैसी समस्याओं से निपटा जा सके। यह बड़ी राष्ट्रीय शर्म है कि नेपाल जैसा देश इस समय भी हमारे ऊपर आँखें तरेर रहा है और हम मूकदर्शक बने बैठे हैं। एक कड़ा जबाव देने की स्थिति में भी नहीं है हमारा देश। सरकार बचाने के लिए वोट फॉर नोट, वोट फॉर गद्दी। क्या यह राष्ट्रीय शर्म नही है। १९८४ के दंगे राष्ट्रीय शर्म हैं, उसके बाद दोषियों को जिस तरह बचाया गया वह भी राष्ट्रीय शर्म है, दंगों के चौबीस वर्ष बाद भी दोषियों को सजा न दिला पाना क्या राष्ट्रीय शर्म में नहीं आता। आज भी सर पर मैला ढोया जा रहा है, यह शर्म से डूब मरने की बात है, यह भी राष्ट्रीय शर्म है या नहीं। आतंकवादियों को...

फिर रात भर - phir raat bhar

साँस उसकी महकाती रही रात भर, बिजलियाँ वो गिराती रही रात भर, उसको मालूम था मैं बहक जाऊंगा, जाम नजरों से पिलाती रही रात भर।

अफसर बना तस्कर

अफसर करने लगे जब नशे का कारोबार, क्यों न हो फिर देश का अब फुल बंटाधार, अब फुल बंटाधार दाग वर्दी पर डाला, देखो तस्कर बना पुलिस का अफसर आला, कह दानव कविराय सजा दीजिये निराली , खाने में दो कोकीन इन्हें भर-भर कर थाली।