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बीस हजार का फिफ्टी परसेन्ट - बाढ़ तुम रोज आया करो....

जी हां, बिल्कुल ठीक पढ़ रहे हैं आप. यह घटना करीब बीस दिन पहले की है. मेरे एक मित्र प्रशासनिक अधिकारी हैं, जूनियर रैंक पर, दुर्भाग्य से ईमानदार जीव हैं और अभी भी सरवाइव कर रहे हैं.  एक जिले की तहसील में तैनात हैं, जहां बाढ़ आई हुई है. इस विभीषिका में कई लोग मारे जा चुके हैं, उनके घर-बार बाढ़ के पानी में बह चुके हैं. बेघरो-बार, बेसरो-सामान लोगों की मदद का इजहार भी किया जा रहा है आश्वासन देने के साथ. जहां वे तैनात हैं वहां भी बाढ़ ने प्रकोप दिखाना प्रारम्भ कर दिया. आज मुलाकात हुई तो मैंने उनसे इस बारे में पूछ लिया. एक बड़ी  सी गाली देकर फट पड़े.  " बीस हजार का चेक दिया गया कि राहत का काम प्रारम्भ कराइये, थोड़ी देर बाद ऊपर से एक  फोन आ गया कि चेक कैश कराने के बाद फिफ्टी परसेन्ट भिजवा दीजिये." 

मेरे ब्लाग में मैलवेयर नहीं है.

आप लोगों ने मेरे ब्लाग को देखा होगा. कुछ बन्धुओं ने मैलवेयर डिटेक्ट होने की जानकारी दी, तत्पश्चात मैंने भी इसे देखा. सफारी और फ्लाक में खोलते समय मैलवेयर होने की चेतावनी मिलती रहती है जबकि इन्टरनेट एक्सप्लोरर में यह ठीक खुलता है. मैंने एक-एक करके सारे विजेट्स भी हटा दिये लेकिन काम नहीं बना, उलटे मेरा ब्लागरोल गायब हो गया. मेरी आपसे विनम्र प्रार्थना है कि इस तथाकथित मैलवेयर से न डरें. दूसरा यह (मेरी असभ्यता और धृष्टता को क्षमा करें और मेरे सारे प्रियजन यदि टिप्पणी के साथ अपने ब्लाग का address दे दें तो मैं आसानी से उन्हें अपने ब्लागरोल में जोड़ लूंगा. धन्यवाद.

मैलवेयर हटाने के चक्कर में ब्लाग रोल भी गायब हुआ..

कई मित्रों ने बताया कि मेरा ब्लाग खोलने की कोशिश करने में मैलवेयर की वार्निंग आती है. मैंने एक-एक कर सारे विजेट्स हटाकर देखने की कोशिश की कि किस गैजेट में मैलवेयर है. मैलवेयर तो नहीं मिला अलबत्ता ब्लाग रोल गायब हो गया. मैंने सुरक्षित की हुई टेम्पलेट को अपलोड कर री-स्टोर करने का प्रयत्न किया लेकिन ब्लाग रोल फिर भी वापस नहीं आया. क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे मैं अपना ब्लागरोल वापस पा सकूं...

बापू और शास्त्री जी, आप दोनों को नमन...

एक ने आजादी दिलाई तो दूजे ने उस आजादी को आगे बढ़ाने का प्रयत्न किया. एक के लिये तो कुछ लोग याद कर रहे हैं, दूजे के हिस्से में वह भी थोड़ा मुश्किल है. मैं आज इन दोनों ही महान आत्माओं को नमन करता हूं...

ठुमक चलत रामचन्द्र, बाजत पैंजनियां....

इस भजन को सुनिये और तुलसी बाबा ने जिस रामराज्य की कल्पना की थी कि जहां देहिक, देविक, भौतिक क्लेश न हों, सभी लोग बराबर हों, सब को बराबरी का हक मिले, उस रामराज्य की तरफ बढ़ने की कामना में मेरा साथ दीजिये. जहां राष्ट्रप्रेम हो, सद्भाव हो, वास्तविक धर्मनिरपेक्षता हो, कानून का शासन हो, न्याय हो. सही मायनों में सर्वधर्म समभाव हो, सही अर्थों में बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय हो. यही मेरी कामना है ..

दिल्ली से गोरखपुर गरीबरथ से..

गोरखपुर जाना था. गोया तलाश की गयी कि कौन सी ट्रेन ठीक रहेगी. चंद ट्रेनों की खोज-खबर ली गयी. अन्तिम रूप से चयन किया गया अमृतसर-सहरसा गरीबरथ का. पूरी ट्रेन एअर-कण्डीशण्ड है. इसमें चेयरकार तथा एसी-थ्री टिअर कोच हैं. थ्री-टिअर में एक सीट रिजर्व कराई गयी. नियत दिन व समय पर यात्रा प्रारम्भ हुई. ट्रेन सही समय पर थी, इसलिये थोड़ी राहत महसूस हुई. अन्दर पहुंचने के बाद अपनी सीट पर विराजमान हुये. बाकी सब ठीक-ठाक ही था, लेकिन जो असल परेशानी थी, वह ट्रेन के अन्दर हुई. ट्रेन में कई परेशानियों से वास्ता पड़ता है. यदि आप सामान्य (अनारक्षित) बोगी में यात्रा कर रहे हैं, तो उसमें चढ़ना ही अपने आप में एवरेस्ट विजय के समान है. यहां तक कि सामान्य स्लीपर कोच में भी भीड़ घुसी रहती है. इस भीड़ में कुछ पुलिसवाले भी आपको मिलेंगे, जो अपनी वर्दी का फुल सदुपयोग कर आपको अपनी आरक्षित सीट पर बैठने का मौका देकर अहसान करते हैं. इन बोगियों में किन्नर भी मिल जायेंगे जो आपकी जेब को हल्का करने का नैतिक दायित्व पूरा करते हैं. रही बात टायलेट की, तो उसे आप खोल ही नहीं सकते. मैं भी कुछ अधिक जल्दी ही कर गया. खोलेंगे तो जब, जब वहां तक ...

हे राम, हा राम - चैनलों पर रामभक्तों का प्रस्तुतिकरण

हर चैनल पर इस तरह से दिखाया जा रहा है जैसे कि राम का नाम लेना गुनाह हो गया हो. बड़ी शर्मिन्दगी का अहसास कराया जाता है हर राम भक्त को. रामभक्तों की आस्था पर जैसे प्रश्न उठाये जा रहे हैं, क्या किसी अन्य धर्मावलम्बियों के साथ यह व्यवहार किया जा सकता है? कभी नहीं. राम का नाम लेना अपशब्द का पर्याय बनाया जा रहा है. कोई चैनल यह बताने को तैयार नहीं कि राम अयोध्या में पैदा नहीं हुये तो कहां हुये. क्या ऐसे ही प्रमाण मक्का-मदीना-जेरुसलम के बारे में मांगे जायेंगे. मन में क्षोभ है. एक पुरानी रचना प्रस्तुत कर रहा हूं. हे राम,तुम कौन हो, एक कवि की कल्पना, या इस देश के दुर्भाग्य की अल्पना, कौन हो तुम प्रमाण चाहिये, तुम्हारे होने का सूक्ष्म ही सही, इतिहास में कुछ परिमाण चाहिये, ऐतिहासिक प्रमाणों के बिना हम कुछ भी नहीं मानेंगे, यदि इतिहास में दर्ज नहीं होगा तो अपने बाप को भी बाप नहीं मानेंगे, क्यों नहीं कराया अपने पैदा होने का रजिस्ट्रेशन, बिना मतलब में करा दिया इतना फ्रस्ट्रेशन, पता नहीं बाल्मीकि ने तुमको कहां से खोज लिया और तुलसी ने क्यों रच दिया एक ग्रन्थ, संभवत: साम्प्रदायिकता की भट्टी में झोंकना चाह...