लखीमपुर में दरोगा की हत्या करने वाले का एन-काउंटर

लखीमपुर में दारोगा की हत्या करने वाले अपराधी का एन्काउन्टर लखनऊ में कर दिया गया. अपराधियों के साथ शठे शाठ्यं समाचरेत का ही व्यवहार होना चाहिये. लेकिन जब कभी पुलिस कर्मी की हत्या होती है तभी क्यों अपराधी का एन्काउन्टर होता है, यह स्थिति आम आदमी के हत्यारे के साथ क्यों नहीं होती. इसका सीधा साधा सा अर्थ यह है कि या तो पुलिस आम आदमी की जान को जान नहीं समझती या फिर उसे भी यह लगता है कि कानून का पालन करते हुये मुजरिम को सजा दिलवाने में वह असमर्थ है इसलिये लगे हाथों हिसाब चुकता कर लेती है. स्वतन्त्रता के बाद से हुई हत्याओं का खाता खोलकर देख लिया जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि पुलिस वालों की हत्या करने वाले अपराधियों में से अधिकांश पुलिस मुठभेड़ में मारे गये लेकिन आम आदमी के हत्यारे पुलिस मुठभेड़ में नहीं मारे जाते. क्या आम आदमी की जान जान नहीं होती? प्रश्न यही है कि आम आदमी के हत्यारे मुठभेड़ में क्यों नहीं मार गिराये जाते. न जाने कितने ही अपराधी ऐसे हैं जो राजनीति की गंगा में डुबकी लगाकर माननीय बन गये हैं, पुलिस उनके विरुद्ध क्यों कार्रवाई नहीं करती.

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