श्रद्धेय श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु पर एक बार फ़िर सवाल

कुछ महान नेताओं की मृत्यु अभी तक रहस्य के घेरे में छुपी हुई है. जिनमें दो व्यक्ति बड़े अहम हैं एक सुभाष चन्द्र बोस तथा दूसरे हैं लाल बहादुर शास्त्री जी. पिछले दिनों एक सज्जन श्री अनुज धर ने सूचना के अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत स्वर्गीय प्रधानमन्त्री परम श्रद्धेय लाल बहादुर शास्त्री जी के ताशकन्द में हुये निधन के बारे में जानकारी मांगी. उल्लेखनीय है कि स्वर्गीय प्रधानमन्त्री का निधन ताशकन्द में भारत-पाकिस्तान समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद रात्रि में हो गया जिसके बारे में बताया गया कि शास्त्री जी को दिल का दौरा पड़ा और वे स्वर्गलोक सिधार गये. १९६५ के भारत-पाक युद्ध में भारत ने कई स्थानों पर निर्णायक बढ़त ले ली थी तथा भारतीय फौजें पाकिस्तान में अन्दर तक घुस गयी थीं. चीन से मिली हार के बाद भारत की फौजों का यह प्रदर्शन निश्चित ही सराहनीय था तथा ऐसे में यह अपेक्षित था कि भारत वार्ता की मेज पर सुदृढ़ स्थिति में था. युद्ध की समाप्ति के बाद भारत और पाकिस्तान के मध्य समझौते हेतु तत्कालीन सोवियत संघ के प्रमुख श्री कोजिगिन ने भारतीय प्रधानमन्त्री और पाकिस्तान के प्रमुख जनरल अयूब खान को ताशकन्द में समझौते हेतु बुलाया. इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु था कि भारत और पाकिस्तान की फौजें युद्ध आरम्भ होने से पूर्व के स्थान पर वापस लौट जायेंगी. किसी हारे हुए देश के लिये तो यह जीवन-दायक था लेकिन जीते हुये राष्ट्र के लिये सम्भवत: नैराश्यपूर्ण था उस समय युद्ध में हिस्सा लेने वाले जांबाज फौजियों ने. कहा जाता है कि इस समझौते को लेकन उनपर काफी दबाव था और इस समझौते के फलस्वरूप शास्त्री जी को दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गयी. उनके परिजनों का कहना था कि शास्त्री जी का चेहरा नीला पड़ चुका था और चेहरे व शरीर पर कुछ निशान भी थे जिससे यह आशंका होती थी कि कहीं वे किसी तरह के विष के शिकार तो नहीं हुए. यह भी कहा जाता है कि सोवियत संघ में एक बावर्ची को गिरफ्तार भी किया गया तथा बाद में उसे छोड़ दिया गया. शास्त्री जी के पोस्टमार्टम की भी मांग की गयी लेकिन बड़े आश्चर्य का विषय है कि शास्त्री जी के शरीर का पोस्ट मार्टम नहीं किया गया. आजतक शास्त्री जी की मृत्यु रहस्यों के घेरे में है. सरकार ने सूचना का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत पूछे गये सवालों का उत्तर यह कह कर देने से मना कर दिया कि इससे विदेश नीति और रूस के साथ मैत्री संबंधों पर असर पड़ेगा और देश में भी उथल पुथल मच जायेगी. सरकार का यह उत्तर ही वस्तुत: संदेहों का निराकरण करने की जगह उनमें वृद्धि करता है. पहले तर्क से क्या ऐसा नहीं लगता कि सम्भवत: शास्त्री जी की मृत्यु किसी पूर्व नियोजित षड़यन्त्र के अन्तर्गत हुई जिसमें कुछ ऐसे लोग शामिल थे जिनकी पहुंच विदेशों में सत्ता शीर्ष तक थी और वे नहीं चाहते थे कि शास्त्री जी सही-सलामत वापस लौटें तथा इस समझौते के पीछे उनके कुछ स्वार्थ निहित थे. दूसरा तर्क भारत में उथल-पुथल मचने का है जो यह संकेत देता है कि इस प्रकार के कुछ लोग भारत में भी थे. मैं यह कहना चाहता हूं कि लोगों से राष्ट्र बनता है न कि राष्ट्र से लोग. क्या इस देश के लोग इतने विमूढ़ हैं, इतने मतिमन्द हैं कि उन्हें यह जानने का भी अधिकार नहीं कि उनके प्रधानमन्त्री की मृत्यु विदेश में किन हालातों में हुई. उनके पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट में क्या दर्ज था, आखिर एक रसोइये सत्तारोव को शास्त्री जी को जहर देने के संदेह में क्यों गिरफ्तार किया गया तथा फिर किन हालातों में उसे रिहा कर दिया गया?? उल्लेखनीय है कि रात्रि का खाना भारतीय उच्चायुक्त श्री टी०एन०कौल के साथ खाया था जिसे कि उनके रसोइये अहमद जान ने तैयार किया था. रात्रि में दूध ग्रहण करने के बाद लगभग १.२५ पर कमरे से बाहर डाक्टर-डाक्टर आवाज देते हुये निकले तथा फिर स्वर्ग सिधार गये, जिसके बाद ही अकमद सत्तारोव को गिरफ्तार किया गया. एक जांच आयोग भी भारत में बिठाया गया लेकिन वह शास्त्री जी के निजी चिकित्सक तथा निजी नौकर से बात नहीं कर सका क्योंकि श्री शास्त्री के व्यक्तिगत चिकित्सक श्री आर०एन०चुघ की मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में हो गयी तथा उनका व्यक्तिगत नौकर भी एक सड़क दुर्घटना का शिकार हुआ. शास्त्री जी की रहस्यमय मृत्यु के बारे में क्या इस देश को जानने का अधिकार नहीं है?? यही विद्वान नेता यह विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र होने की दुहाई देते नहीं थकते और सच्चाई बताने के समय इस प्रकार का व्यवहार करते हैं जैसे कि उन्हें वोट देने वाला मतदाता बिल्कुल ही बुद्धिहीन है. विदेशों से सम्बन्ध क्या हमारे देश के प्रधानमन्त्री से अधिक महत्वपूर्ण है?? और फिर इस रहस्य के उजागर होने से देश में उथल-पुथल मचने से और क्या अन्दाजा लगाया जा सकता है इस के सिवा कि नेता अभी तक मतदाता को समझदार मानने का दिखावा तो करते थे लेकिन इस प्रकरण ने तो सिद्ध कर दिया कि मतदाता वोट डालने तक ही समझदार माना जाता है. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारतीय जनता को रिश्तों के नाम पर बेवकूफ बनाया जाता रहेगा और सीक्रेसी के चलते भारत में राष्ट्रविरोधी तत्वों के नाम कभी भी सार्वजनिक नहीं हो पायेंगे.

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