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Showing posts from December, 2009

सुविधाशुल्क लेने का एक नायाब तरीका

मेरे एक मित्र ने मुझे बताया कि उनके एक अधिकारी ने उन्हें दो टिकिट कैंसिल कराने को दिये. चार लोगों की रिटर्न जर्नी के टिकट थे, दिल्ली से चेन्नई तक के एसी - द्वितीय के. उन्होंने टिकिट कैंसिल कराये और पैसे वापस कर दिये जो कई हजारों में बनते थे. एक साधारण सी प्रक्रिया थी यह. अगले वर्ष   अपनी एल०टी०सी० हेतु उन्हें रेलवे टिकिट के नम्बरों की आवश्यकता थी, जो उनसे खो गये थे. इस हेतु वे मित्र अपनी रिजर्वेशन स्लिप तलाशने रिजर्वेशन कार्यालय में पहुंचे, जहां पहुंचकर उनके होश उड़ गये. उन्हें वहां अपने कार्यालय के लगभग सभी कर्मचारियों के द्वारा इसी प्रकार कैंसिल कराये गये टिकिटों की स्लिप्स मिलीं जो कि सैकड़ों की संख्या में थीं और उनकी राशि कई लाख बैठती थी. बाद में यह पता चला कि यह तरीका उन अधिकारी द्वारा घूस लेने के लिये बनाया गया था. जिससे वह पैसा लेते उसके लिये वह स्लिप भरकर दे देते और टिकिट मंगा लेते, बाद में उन टिकिटों को कैंसिल कराकर पैसा अपने हवाले कर लेते. है न नायाब तरीका.

क्या करेंगे हेडली को भारत लाकर?

अभी अभी जी के पिल्लई साहब का बयान पढ़ रहा था हेडली के बारे में. और इसके सम्बन्ध में छपी खबर भी कि अमेरिका हेडली का प्रत्यर्पण करना नहीं चाहता. कान पक चुके हैं और आंखे थक गई हैं हेडली के बारे में सुनते और देखते. पता नहीं अखबार वालों की कलम क्यों रुक जाती है और टीवी पर चिल्ला चिल्लाकर अपनी आवाज को बुलन्द करने वाले धर्मनिरपेक्ष स्वनामधन्य निर्भीक पत्रकारों की जुबान पर अंगारे क्यों आ जाते हैं दाऊद गिलानी (जोकि हेडली का सही नाम है) का नाम लेते हुए. खैर, भारत लाकर क्या करेंगे हेडली का? मुझे तो एक ही बात समझ में आती है कि शायद ये लोग उसे बाइज्जत बरी कराना चाहते होंगे . या फिर ये बयान दिलाना चाहते होंगे कि हेडली के विरुद्ध भगवा आतंकवादियों ने साजिश कर उसे फंसाया है. या फिर ये कि वो तो समाजसेवा के लिये भारत आया था और भारत में विभिन्न जगहों पर समाजसेवा के थोक आउटलेट खोलना चाहता था. अमेरिका में ट्रायल होगा तो साल-डेढ़ साल के अन्दर उसे सजा हो जायेगी और इतनी कि वह मरने के बाद ही जेल से बाहर निकल सकेगा. और भारत में? कितने समर्थ लोगों को सजा हुई है आजतक. और फिर कितनी बेशर्मी से बयानबाजी करते घूमते हैं...

अगर आदमी बीमार न पड़ता तो क्या होता ??

उत्तर बहुत सारे हो सकते हैं और हैं जिनके बारे में फिर कभी। लेकिन एक चीज है जो नहीं होती..... क्या??? ... ........ ........... ................. ................... ..................... ........................ ............................. ................................... ....................................... ........................................... ................................................ .................................................... ................................................................ ..................................................................... ............................................................................ स्वास्थ्यगत कारणों के आधार पर एन० डी० तिवारी का इस्तीफा

क्या चिट्ठाजगत हैक हो गया है या कोई तकनीकी खराबी आ गयी है ?

कई दिनों से चिट्ठाजगत नहीं खुल रहा है जिस के कारण अपने अकाउंट को नहीं देख पा रहा हूँ। कृपया बताने की कृपा करें कि चिट्ठाजगत क्यों नहीं खुल रहा है। क्या यह बंद कर दिया गया है या किसी तकनीकी खराबी के चलते बंद हो गया है अथवा हैक कर लिया गया है?

रुचिका के मामले में चौटाला की बेशर्म सफाई

कुछ देर पहले बेशर्म सफाई देते हुये चौटाला को देखा जो रुचिका कांड के अपराधी और हरियाणा पुलिस के पूर्व महानिदेशक राठौर के विरुद्ध क्या क्या कदम उठाये, बता रहे थे। जब एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि आपने इसके विरुद्ध क्या कार्रवाई की तो चौटाला का जबाव था कि चार्जशीट होने पर निलम्बित कर दिया गया तथा चूंकि मामला अदालत में था और अदालत से उसे बेल मिल गयी थी लिहाजा उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई करना अदालत की अवमानना होती। चौटाला कह रहे थे कि विभागीय इन्क्वायरी के आदेश दिये और उसके बाद उसे निलम्बित कर दिया गया। उन्हें क्या यह नहीं पता कि निलम्बन कोई सजा नहीं होती और फिर उन्होंने यह भी नहीं बताया कि क्या विभागीय कार्रवाई की गयी. पुलिस पदक देने के लिये अनुशंसा के सवाल को यह कहकर टाल गये कि यह आईएएस आईपीएस अफसरों के प्रमोशन का मामला अलग से चलता है. पता नहीं किसे बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे थे चौटाला. किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिये आपराधिक कृत्य हेतु जो न्यायिक कार्रवाई होती है वह तो होती ही है, लेकिन इसके अतिरिक्त दोषी कर्मचारी को दंडित करने हेतु सरकार के पास विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के विकल्प खुले...

मोदी द्वारा उठाया गया एक अच्छा कदम जिसकी आलोचना होने लगी

पिछले दिनों गुजरात में चुनाव सुधार सम्बन्धी एक अच्छा निर्णय लिया गया। यह निर्णय गुजरात में होने वाले स्थानीय चुनावों के मद्दे-नजर एक बेहतरीन कदम है। इसके अनुसार स्थानीय चुनावों में मतदान को अनिवार्य कर दिया गया है। गुजरात में होने वाले स्थानीय चुनावों में अब प्रत्येक मतदाता को मतदान करना ही पड़ेगा तथा जो व्यक्ति मतदान से अनुपस्थित रहेंगे उनके लिए अपनी अनुपस्थिति का कोई ठोस कारण प्रमाणों के साथी प्रस्तुत करना पड़ेगा अन्यथा जानबूझ कर मतदान से अनुपस्थित रहने वाले मतदाताओं के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई भी की जा सकती है। इसके साथ ही "किसी को भी मत नहीं " का विकल्प भी गुजरात के स्थानीय चुनावों में मतदाताओं को दिया गया है। जैसा कि अपेक्षित था गुजरात कांग्रेस ने इस बिल का विरोध यह कहते हुए किया कि यह मोदी की तानाशाही है और लोकतंत्र में मतदान करना या न करना मतदाता का विशेषाधिकार है और संविधान में वर्णित कर्तव्यों में कहीं भी अनिवार्य मतदान के बारे में कोई प्रावधान नहीं किया गया है, लिहाजा यह संविधान से इतर है। पता नहीं किस संविधान की बात कर रहे थे गुजरात कांग्रेस के प्रवक्ता, उस संविधा...

मुस्लिम ब्लॉगर का कसाब प्रेम

अभी अभी अजीज बरनी नाम के सज्जन के ब्लॉग की दो प्रविष्टियाँ पढ़ीं । एक का नाम है " कसाब की जबान प र हेडली का नाम , सवाल बहुत बड़ा है " और दूसरी है " २६ / ११ को मुंबई पुलिस का किरदार एक और सवाल "। दोनों ही पोस्टों में किस कदर एक तरफा रवैया अपना कर यह सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है जैसे कि कसाब एक संत पुरुष था और उसके लिए फंसाया गया है । दूसरी तरफ यह भी सिद्ध किया जा रहा है कि करकरे और काम्टे की हत्या किसी षड्यंत्र के चलते पुलिस वालों ने ही करा दी । उनकी दोनों प्रविष्टियों का निचोड़ यही है । अधिकाँश मुस्लिम ब्लॉगर किस हद तक सांप्रदायिक सोच रखते हैं , उसका एक नमूना भर आप इन प्रविष्टियों में देख सकते हैं ( और हाँ , श्री महफूज अली जैसे अच्छी सोच वाले व्यक्ति इस श्रेणी में शामिल नहीं हैं ) । बात फिर वही आती है कि हिन्दू अपने जेन्युइन हितों की बात करे तो सांप्रदायिक लेकिन मुस्लिम घोर साम्प्रदायिकता फैलाये तो भी धर्म - निरपेक्...

उन्नीस सालों में भी पूरा इन्साफ नहीं मिल सका रुचिका को

रुचिका गिरोत्रा ने सन 1993 में एस पी एस राठौड़, तत्कालीन आई जी, हरियाणा के द्वारा प्रताड़ित होने के बाद आत्महत्या कर ली. इससे पहले 12 अगस्त, 1990 में रुचिका के शोषण का प्रयास एस पी एस राठौड़ द्वारा किया गया जिसके विरोध पर रुचिका के पूरे परिवार को प्रताड़ित किया गया, भाई के साथ मार-पीट की गयी, झूठे मामले बनाये गये. जानते हैं उस समय रुचिका की उम्र क्या थी? मात्र चौदह वर्ष. रुचिका एक टेनिस खिलाड़ी थी और आई जी साहब लान टेनिस असोसियेशन के अध्यक्ष. आई जी के रसूखों के चलते रुचिका के पिता को नौकरी से निकाल दिया गया. उसकी शिक्षा दीक्षा बन्द हो गयी. लब्बो-लुआब यह कि पूरे परिवार को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया इस पुलिस अफसर ने. जब पूरे परिवार को हर जगह, हर स्तर पर, हर मुमकिन नामुमकिन तरीके से प्रताडित किया जाने लगा तो अपने परिवार को इस प्रताड़ना से बचाने के लिये रुचिका ने आत्महत्या कर ली. सन 1997 में उच्च न्यायालय के दखल के बाद राठौड़ की नामजदगी हो सकी और फिर 1998 में मामला सीबीआई के हवाले कर दिया गया और फिर उसके बाद राठौड़ ने अपने रसूख का प्रयोग करते हुये मामले से बच निकलने की पुरजोर कोशिश की. और वह ...

पांचवां पास, आठवीं फेल, हिस्ट्रीशीटर एम एल सी चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियों से उतरे.

उत्तर प्रदेश में एम०एल०सी० अर्थात विधान परिषद सदस्यों के चुनाव हेतु नामांकन प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी है. कुछ सदस्यों के बारे में समाचार पत्रों से पता चला. कांग्रेसी प्रत्याशी आठवां पास है तो सपा का पांचवां. बसपा का इन्टर पास, भाजपा प्रत्याशी के बारे में मुझे पता नहीं है, लेकिन उसकी स्थिति भी कुछ भिन्न होगी इसकी संभावना कम है. कुछ निर्दलीय प्रत्याशी स्नातक भी हैं. मजे की बात देखिये कि स्नातक, परास्नातक, एम०फिल०, डी०लिट० और डाक्टरेट किये हुये लोग इन जाहिलों को चुनकर विधान परिषद में भेजेंगे. इस तरह के लोगों में कुछ गुण्डे-बदमाश-डकैत-हत्यारे भी हैं जिन्हें मीडिया दबंग का नाम देता है. अपने नाम पर इन लोगों के पास लिखा-पढ़त में कुछ नहीं है लेकिन एक भी आदमी करोड़पति से कम नहीं है. जमीनों पर कब्जे करना इन लोगों का प्रिय शगल है. जितनी एजेन्सियां विकास के लिये बनाई गयी हैं, जितने क्रियाकर्म साँरी कार्यक्रम चलाये गये हैं और जितना अधिक विकेन्द्रीयकरण किया गया है भ्रष्टाचार उतना ही अधिक बढा़ है. निचले सिरों पर जिन्हें अभी तक इस दरिया में डुबकी लगाने का मौका नहीं मिला था इस विकेन्द्रीयकरण के बाद मिल ...

कसाब को छोड़ दिया जाना ही उचित है.

कारण नम्बर एक - शुक्ला जी के नजरिये से भी एकदम उचित है, वही क्रिकेट वाले शुक्ला जी जिन्होंने कुछ दिन पहले ही कहा था कि कुछ करोड़ रुपये की घूसखोरी के आरोपों के चलते एक विदेशी मेहमान को कितनी दिक्कत उठानी पड़ी और इस छोटी सी हकीर रकम के आरोपों की जांच के लिये सैकड़ों करोड़ बर्बाद करना कहां तक ठीक है. इसलिये कसाब के ऊपर करोड़ों खर्चना कहां तक उचित है जबकि एक गोली की कीमत मात्र चालीस या पचास रुपये, राइफल की कीमत साठ-सत्तर हजार रुपये और ग्रेनेड की कीमत दो-चार हजार रुपये, कुल मिलाकर आठ-दस लाख रुपये के खर्च के ऊपर इकतीस करोड़ रुपये का व्यय कहां तक उचित है? कारण नम्बर दो - कैसे पता चलता कि हम लोग इतने बहादुर हैं कि बम-धमाकों के बाद भी देश चलता रहता है, ये कायरतापूर्ण घटनायें हमें रोक नहीं पातीं हमारी एकता और अखण्डता में रत्ती भर कमी नहीं आती है चाहे लाखों लोग ही अभी तक क्यों न मारे जा चुके हों. कैसे पता चलता कि हम लोग धर्मनिरपेक्ष हैं, कैसे पता चलता कि हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति की जड़ें मुम्बई से घुसकर दिल्ली में यमुना तक फैली हुई हैं. कैसे पता चलता कि इन छोटे-मोटे काण्डों से मुम्बई रुकती नहीं, चलती र...

कविता किताबों की जगह स्वर-बद्ध होकर सीडी में!

मेरे एक कवि मित्र हैं, काफी दिनों बाद उनसे मिलना हुआ. बात चलने लगी पत्र पत्रिकाओं की तरफ घटते हुये रुझान की और इंटरनेट तथा टेलिविजन द्वारा खत्म किये जा रहे समय की. जो समय लोग पढ़ने में बिताते थे, पत्र पत्रिकाओं और मां-बाप या बाबा-दादी के साथ बिताते थे वह समय अब टेलिविजन और इंटरनेट ने हड़प लिया है. इसी मुद्दे पर बात होने लगी, फिर मैंने बात उठाई किताबों के मंहगे होने की जिसमें अभी जिन्ना महोदय के ऊपर लिखी गई जसवंत सिंह साहब की किताब भी शामिल थी और मेजर जनरल वी के सिंह की भी किताब शामिल थी जिसके चलते उन्हें जेल तक जाना पड़ा. मेरा कहना था कि किताबों के दाम इतने अधिक रखे जाते हैं कि वह पुस्तक प्रेमी जो इन्हें पढ़ना चाहते हैं, मन मसोस कर रह जाते हैं क्योंकि एक किताब के पांच सौ से लेकर हजार रुपये चुकाना हर एक के बस की बात नहीं. उनका तर्क था कि किताबें के दाम कम रखे जाने से भी किताबों की बिक्री में बहुत अधिक वृद्धि नहीं होगी. अत: अधिक दाम होने से कुछ ही प्रिन्ट बिकने से लागत और लाभ निकल आते हैं. इसके बाद एक सन्न करने वाली बात उन्होंने मुझे बताई. उन्होंने बताया कि अब कविताओं की किताबें नहीं छापी ज...

छत्तीस लाख का एक प्रश्न

प्रश्न छोटा है , रकम बड़ी है । तृण मूल अर्थात ग्रास - रूट कांग्रेस के बेचारे अल्प संख्यक मंत्री मात्र छ महीने से अपने होटल में ठहरे थे । अब बात खुलने पर ममता जी ने कह दिया है कि अपने आप होटल का बिल भरें । सवाल वहीं का वहीं है कि यह छत्तीस लाख मंत्री जी कहाँ से लायेंगे , इस छत्तीस लाख का स्रोत क्या है , क्या यह भी कभी बताया जाएगा । लौट फिर कर वही बात, यह धन भी या तो गरीब जनता का होगा या फिर कोई काला धन . इतने दिनों से विदेश मंत्री होटल में टिके हुए थे, उसका भुगतान कहाँ से हुआ, किस ने किया, वह धन कहाँ से आया, कुछ पता चला? नहीं। वही इस मामले में भी होगा। भारतीय लोकतंत्र ऐसे ही चलता है।