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Showing posts from August, 2008

ब्लॉग को टॉप पर रखने का नायाब तरीका.

प्रिय ब्लॉगर बंधुओं, मेरे ब्लॉग को बहुत कम लोग देखते थे और मैं अन्दर ही अन्दर कुंठित रहने लगा था कि जब अन्य ब्लागरों के ब्लॉग प्रतिदिन बीस के हिसाब से पढ़े जा रहे हैं और पन्द्रह - सोलह टिप्पणियां आ रहीं हैं तो फिर मेरा ब्लॉग क्यों नहीं टिप्पन्याया जा रहा है। मुझे बड़ी दिक्कत होने लगी अब यहाँ ऐसा भी नहीं हो पता है कि मैं दूसरे ब्लॉगर की वाहवाही करूँ और वह मेरी, अगर आमने सामने होते तो बात और होती, अब क्या पता वह ब्लॉगर कहाँ बैठा है जिसके ब्लॉग पर मैंने बढ़िया टिप्पणी लिखी है, उसका हाथ पकड़कर अपने ब्लॉग पर टिप्पणी तो लिखवाई नहीं जा सकती। इसलिए मैंने एक नया तरीका निकाला अपने ब्लॉग को टॉप में रखने का, आशा करता हूँ कि आप भी इससे लाभान्वित होंगे। १-सबसे पहले बीस पच्चीस ईमेल एड्रेस बनायें (क्योंकि बहुत सारे ब्लोग्स में ओपन यूज़र या गुमनाम द्वारा टिप्पणी देने की अनुमति नहीं होती) और गूगल अकाउंट में रजिस्टर कराएँ। २-इसके उपरांत ब्लॉग एग्रीग्रेटर, जैसे ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत में अपने ब्लॉग (यदि आपने अपना ब्लॉग यहाँ रजिस्टर नहीं करा रखा है तो तुंरत कराएँ) पर जाकर पच्चीस तीस बार क्लिक करें। अब आपका ब्ल...

रात भर

याद तेरी महकाती रही रात भर, लोरियां दे सुलाती रही रात भर, उसको मालूम था मैं बहल जाऊंगा, झूठे सपने दिखाती रही रात भर।

क्या हो गया है इन मीडिया वालों को ?? क्यों पड़ गए हैं सुब्बा जी के पीछे???

हे ईश्वर क्या हो गया है इन मीडिया वालों को? अब बेचारे सुब्बा जी के पीछे पड़ गए कि सुब्बा जी यहाँ पैदा नहीं हुए, ऊपर से सीबीआई ने कोर्ट में कह दिया कि उनके द्वारा लगाये गए तमाम कागजात नकली हैं. इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन कहाँ पैदा हुआ, यहाँ हुआ या नेपाल हुआ, कहीं न कहीं तो पैदा होना ही था. कल को लोग कहने लगेंगे कि भाई तू अस्पताल में पैदा क्यों न हुआ या फिर अस्पताल में हुआ तो फलां अस्पताल में क्यों न हुआ और अगर फलां में हुआ तो फलां टाइम पर क्यों न हुआ. तो बात हो रही थी पैदा होने की, यहाँ के लोगों की फितरत ही कुछ ऐसी है कि पैदा होने को लेकर खाम-खां शोर मचाने लगते हैं, बेचारी सोनिया जी को भी इन्हीं लोगों के कारण त्याग करना पड़ा नहीं तो आज सोनिया जी प्रधानमंत्री की गद्दी को सुशोभित कर रही होतीं. सुब्बा जी के विरोधियों की यह साजिश है. बेचारे दो बार विधायक और तीन बार ही सांसद बन पाये थे कि यार लोगों ने बवाल मचा दिया. अब मजदूरी करना, लाटरी से पैसा कमाना, ठेकेदारी करना कोई गुनाह है क्या. इतने बांग्लादेशी आ गए, पाकिस्तान से लोग मैच देखने आए, यहीं रह गए, उनके लिए कोई कुछ नहीं कहता, बेचारे सुब्बा...

मोदी सरकार ने यह क्या कर दिया!

बड़ी दिक्कत हो गई धर्म-निरपेक्षी राजनीतिकों, बुद्धिजीवियों और मीडिया वालों को कि आख़िर गुजरात पुलिस ने कैसे अहमदाबाद बम विस्फोट के मास्टर माइंड को गिरफ्तार कर लिया. एक चैनल ने तो इस पर शीर्षक लगा दिया कि क्या आतंकवाद से निपटने के लिए मोदी फार्मूला उपयुक्त है. बात बिल्कुल ठीक है जब बाकी सरकारें आज तक बम विस्फोटों के मास्टर माइंड व्यक्तियों को नहीं पकड़ पायीं तो कैसे हिम्मत हो गई मोदी सरकार और उनके पुलिस अफसरों की कि बम धमाकों के जिम्मेदार आतंकियों को इतनी जल्दी पकड़ लिया.. अरे कोई अमर हुआ है आज तक, मरना हर एक को है ही एक दिन, तो फिर क्या हो गया, अरे बीमारी से मरते तो घर वालों का पैसा ख़राब होता, एक्सीडेंट में मरते तब भी भरती कराना पड़ता. कितनी दिक्कत होती है घरवालों को जब उनके रिश्तेदार बीमार हो जाते हैं. उनकी तीमारदारी, इलाज का खर्च, दवाईओं का खर्च जो एक आम आदमी तो उठा ही नहीं सकता. कम से कम हजार रुपये रोज का खर्च आता है अस्पताल में. बेड चार्जेस, नर्सिंग चार्जेस, विसिट चार्जेस और न जाने क्या क्या. आदमी तो डॉक्टर का बिल देखकर वैसे ही मर जाता है. और लोग कहते भी हैं कि इससे बेहतर होता अगर मर ...

हमें फिर भी शर्म नहीं आती.

एक स्वर्ण, दो कांस्य मिल गए, मीडिया ने ऐसा गुणगान किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे भारत ने पदक तालिका में टॉप किया हो. उन तीनों खिलाड़ियों का गुणगान अवश्य करना चाहिए जिन्होनें अपने बल-बूते पर यह पदक हासिल किए लेकिन यह उनके अपने प्रयास थे, बाकी ५३ खिलाड़ी और ४६ अधिकारियों का बड़ा दल जो बीजिंग गया था, उनके बारे में भी बताया जाना चाहिए, ४६ अधिकारियों के दल का क्या औचित्य था, सानिया मिर्जा की माँ उनके कोच के रूप में कैसे चली गयीं. हमारी महिला खिलाड़ी अपनी पारंपरिक पोशाक तक नहीं पहन सकीं. हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को न्यौता तक नहीं मिला. पिछले ओलम्पिक के, उससे पिछले ओलम्पिक के और इसी प्रकार पिछले कई ओलंपिकों के समय के अखबारों की कतरनें उठाकर देखिये, सब में अधिकारियों के वही बयान छपे होंगे कि अगले ओलम्पिक में अच्छा करेंगे, खिलाड़ियों का वही दुखड़ा और वही बहाने. शर्म यह देखकर आना चाहिए कि जमैका जैसा छोटा देश भी छ; स्वर्ण पदक जीतता है. हमारे देश में सबसे पहले पॉलिटिक्स उसके बाद नौकरशाही फिर भाई-भतीजा वाद और तदुपरांत कैरियर की चिंता, यह सब ऐसे नासूर हैं जो खिलाड़ियों को आगे बढ़ने नहीं ...

"डॉक्टर साहब की व्यावहारिकता(या व्यावसायिकता) की एक सत्य घटना"

मेरे शहर के एक प्रसिद्ध नर्सिंग होम का एक दृश्य - "सुनो भई, वह जो सात नंबर वाला मरीज है, उसका आपरेशन तो कर रहा हूँ तुम्हारे कहने पर, लेकिन वह बचेगा तो है नहीं, इसलिए आपरेशन से पहले उसके घरवालों से दस हजार जमा करा लो, समझ गए." नर्सिंग होम के प्रमुख और सर्जन महोदय ने अपने सामने खड़े एजेंट (जो कि संभवत: कोई छोटा मोटा नीम चिकित्सक था) से कहा. उन महोदय ने सर हिलाया और अन्दर चले गए. क्या कहना चाहेंगे आप इस पर?

आख़िर इसमें मुस्लिमों का क्या दोष है?

भारतीय जनता पार्टी पिछले कई वर्षों से यह आरोप लगाती चली आ रही है कि मुस्लिमों के लिए तुष्टिकरण की नीतियाँ अपनाई जा रही हैं। उसके अतिरिक्त सभी पार्टियाँ मुसलमानों को खुश करने के लिए तुष्टिकरण का सहारा ले रही हैं। यह सवाल मेरे मन में भी कई बार उठा कि इस आरोप को गहराई में जाकर देखा जाए और इस बात की पुष्टि की जाए कि क्या वास्तव में ही तुष्टिकरण की नीतियाँ अपनाई जा रही हैं और यदि सभी दल तुष्टिकरण की बात कर रहे हैं तो इसके पीछे क्या कारण हैं? मैंने अभी पिछले दिनों जारी सच्चर आयोग की रिपोर्ट में दिए गए आंकडे देखे, जम्मू कश्मीर पर सभी पार्टियों का रवैया देखा। इसके साथ आन्ध्र प्रदेश में आरक्षण के बारे में भी पढ़ा। पिछले कई निर्णयों जिनमें एक शाहबानो से सम्बंधित फैसला भी था, उसे भी देखा। इस बारे में तो कोई दो-राय हो ही नहीं सकती कि मुस्लिमों के लिए तुष्टिकरण की नीतियाँ लागू की जा रही हैं। इसे बार-बार कहने सुनने की आवश्यकता नहीं है, यह तो प्रत्यक्ष है और प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन आख़िर क्या कारण है जो सभी पार्टियाँ मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए भाग रही हैं, क्यों उन्हें ही ...

नैतिकता की दुहाई देते लोग-1

हमारे देश के नेता बहुत महान हैं, इतने कि एक बार ही में इतना त्याग कर जाते हैं, नैतिकता की इतनी ऊंचाई छू जाते हैं, इतने मानदंड स्थापित कर जाते हैं कि आने वाली कई पुश्तों का काम उसी त्याग और नैतिकता से चल जाता है। अभी नैतिकता के कुछ नए पैमाने स्थापित हुए जिनमें नोट के बदले वोट, गुरु जी को गद्दी, खान साहब और आनंद साहब द्वारा मिलकर न्याय को उसके सही मुकाम तक पहुँचाने के लिए किए गए कार्य शामिल हैं। बार कौंसिल को बड़ी तकलीफ हुई कि बेचारे दोनों वकीलों के ऊपर इतना जुल्म, चार महीने तक प्रैक्टिस पर पाबंदी। दो हजार रुपये जुर्माना, बहुत नाइंसाफी है। कितने वकीलों के विरुद्ध शिकायतों पर बार कौंसिल ने क्या कार्यवाई की है, भारत की समस्त बार कौंसिल इसके लिए सार्वजनिक करेंगी क्या? क्या वकील बन्धु यह भी बताएँगे कि अभियुक्त द्वारा गवाह को डराने-धमकाने पर क्या सजा हो सकती है? जब जेठमलानी एक बिल ला रहे थे कि मुकदमों को एक निश्चित समय-सीमा में निपटाना पड़ेगा उस समय किसने और क्यों विरोध किया, इसे भी बताना चाहिए। यह भी बताना चाहिए कि एक मुकदमे का फैसला आने तक कुल कितनी तारीखें पड़ती हैं और कितनी वकीलों द्वारा ली ...

धर्मनिरपेक्षता के एक और अवतार - मौलाना बुखारी

आज के अखबार में मौलाना बुखारी का बयान पढ़ा कि अबुल बशर को गुजरात पुलिस फंसा रही है, एक और लोकल मुस्लिम नेता का बयान भी था कि पुलिस मुसलमानों को आतंकवादी बना रही है। बड़ा आश्चर्य हुआ और ज्ञान में वृद्धि भी हुई। वैसे भी अब यह महसूस होने लगा है कि हम किसी उदारवादी इस्लामिक देश में रह रहे हैं। मैं कभी भी कट्टरपंथी नहीं रहा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी धर्म विशेष में जन्म लेने के कारण मेरी आस्थाओं पर हमला किया जाए। पिछले दिनों श्रीमान लालू यादव, मुलायम सिंह यादव तथा रामविलास पासवान जी ने एक बयान दिया कि सिमी पर बैन लगाया जाए तो आर०एस०एस० / विहिप / बजरंग दल पर भी बैन लगाया जाना चाहिए, कितने बम आर०एस०एस० / विहिप / बजरंग दल ने लगाये हैं? यह इन महानुभावों ने नहीं बताया। दाऊद की बहन ने भी कहा कि उसको मुंबई पुलिस फंसा रही है । हिन्दुओं को काटकर फ़ेंक दीजिये और वे शिकायत भी न करें , यही इन लोगों की चाहत है। बुखारी साहब तब कहाँ थे जब अहमदाबाद, बंगलोर, जयपुर, हैदराबाद में बम-विस्फोट हुए, इन्होनें तब कोई बयान जारी क्यों नहीं किया, ये उन मृतकों के परिवार वालों से क्यों नहीं मिले? उमर अब्दुल्ला स...

कुछ पुरानी यादें

पिछले कई दिनों से मैं कुछ अच्छी चीजें, अच्छे क्षण याद कर रहा था। जब अच्छी चीजों की या फिर कहें अच्छे क्षणों की बात करें तो निश्चित है कि बचपन की यादें उसमें अवश्य होंगी कुछ अपवादों को छोड़ कर, क्योंकि दुनिया के प्रत्येक माँ-बाप यही चाहते हैं कि उनके बच्चों का बचपन अच्छा गुजरे। जब मैं अपने जीवन को दोहराने बैठा तो जो कुछ स्मृतियों ने लौटाया उसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। अब से करीब अट्ठाइस बरस पहले, जब मेरी उम्र करीब सात वर्ष थी, की स्मृतियों में सबसे पहले जिस चीज का ध्यान आता है वह है भाप के इंजन वाली रेलगाड़ी। छुक-छुक की आवाज करती हुई, धुआं निकलती हुई, कम भीड़ वाले प्लेटफार्म, कम भीड़ वाले डिब्बे। कस्बे में लगा हुआ मेला, मेले में सजी दुकानें, सर्कस, भोंपू बजाते हुए लड़के। धूल उड़ाते हुए घोड़े, बैलगाडियां, ताँगों, साइकिलों से, पैदल आते हुए लोग। प्लास्टिक के क्रूड खिलोने, प्लास्टिक का चश्मा और कांच के हरे-पीले-नीले कंचे। बाइस्कोप, बड़ा सा रेडियो, लिटाने वाला टेप-रिकॉर्डर, चाबी भरकर चलाने वाला लाउड़-स्पीकर, बड़ा सा डॉज ट्रक, मेटाडोर मिनी-बस। जावा, यज्दी और राजदूत, लैम्बी और लेम्ब्रेटा। बीच से ...

शबाना जी की धर्मनिरपेक्षता

प्रख्यात अभिनेत्री, समाज सेविका व सेक्युलर इंसान सुश्री शबाना आजमी तथा सैफ अली खान मीडिया द्वारा बनाये गए छोटे नवाब ने पिछले दिनों एक सेक्युलर बयान दिया कि भारत में मुस्लिमों के साथ सरकारें भेदभाव करती हैं. शबाना जी ने कहा कि इसी वजह से वे आज तक मुंबई में एक फ्लैट तक नहीं खरीद पायीं. शबाना जी यह देश और इस देश की सरकारें वाकई बहुत भेदभाव करती हैं, इतना कि पाकिस्तान, बांगला देश में हिन्दू कम होते चले गए लेकिन इसी भेदभाव के कारण भारत में मुस्लिमों की संख्या बढती चली गई. शाहबानो को गुजारा भत्ता न देने के लिए संविधान को बदल दिया गया. कश्मीर को विशेष पैकेज दिया गया, जहाँ पाकिस्तानी झंडों को लहराते हुए देखा जा सकता है. आप मुंबई में फ्लैट न खरीद पाने पर भेदभाव का नाम दे रही हैं, कश्मीर में भी आपको एक इंच जगह नहीं मिलेगी, उसके विषय में क्या कहना चाहेंगी आप. तसलीमा नसरीन को जिन लोगों ने खुले- आम मारने की धमकी दी, उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है. एम० एफ० हुसैन देवी सरस्वती, भारत माता के जैसे चित्र बनाते हैं, उनके लिए क्या कहना चाहेंगी. जम्मू-कश्मीर में दो विश्वविद्यालय खोले गए जिसमे एक का नाम ही इ...