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Showing posts from January, 2010

श्री सुरेश चिपलूनकर जी से अभूतपूर्व मेल खाते एक ब्लागर के विचार.

श्री सुरेश चिपलूनकर जी की इस पोस्ट को देखें - http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/01/bharat-ratna-civil-awards-of-india.html "क्या? वीर सावरकर को “भारत-रत्न”?? तू साम्प्रदायिक संघी है…… Bharat Ratna, Civil Awards of India प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी पद्म पुरस्कारों की घोषणा की रस्म निभाई गई। जिस प्रकार पुराने जमाने में राजा-बादशाह खुश होकर अपनी रियासत के कलाकारों, राजा की तारीफ़ में कसीदे काढ़ने वाले भाण्डों और चारण-भाट को पुरस्कार, सोने के सिक्के, हार आदि बाँटा करते थे, वही परम्परा लोकतन्त्र के साठ साल (यानी परिपक्व ? लोकतन्त्र हो जाने) के बावजूद जारी है। जैसा कि सभी जानते हैं “भारत रत्न” भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, फ़िर आता है पद्म विभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री आदि। अब तक कुल 41 लोगों को भारत रत्न का सम्मान दिया जा चुका है (यह संख्या 42 भी हो सकती थी, यदि “तकनीकी आधार”(??) पर खारिज किया गया सुभाषचन्द्र बोस का सम्मान भी गिन लिया जाता)। भारत रत्न प्रदान करने के लिये बाकायदा एक विशेषज्ञ समिति होती है जो यह तय करती है कि किसे यह सम्मान दिया जाना चाहिये और यह अनुशंसा राष्ट्रप...

महाराष्ट्र में इन्टरनेट के जरिये दर्ज होगी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज

आज एक खबर पढ़ी कि महाराष्ट्र में ई-कम्प्लेंट दर्ज होगी. अब व्यक्ति के लिए थाने जाने की आवश्यकता नहीं होगी, इन्टरनेट के जरिये ही प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो जायेगी तथा उसकी एक प्रतिलिपि मोबाइल पर उपलब्ध होगी. डीसीपी स्तर का अधिकारी शिकायत की जांच करेगा और तदनुसार कार्रवाई होगी. निश्चित रूप से अच्छा फैसला है महाराष्ट्र सरकार का जिसकी प्रशंसा होना चाहिए. देखना यह होगा कि भारत की अंग्रेजी परम्पराओं में विश्वास रखने वाली पुलिस इस फैसले को किस हद तक फलीभूत कर सकती है. भावना निस्संदेह अच्छी है और सुविधाजनक भी, लेकिन इसके आफ्टर-इफेक्ट्स क्या होंगे यह देखने लायक होगा. दर-असल दिक्कत पुलिस की मानसिकता में है, पुलिस वाले अपने लिए क़ानून से ऊपर समझते हैं और कई दफा तो अपने निजी हितों हेतु क़ानून की धज्जियाँ उड़ाने से नहीं चूकते.  यदि कोई ऐसी व्यवस्था भी बनाई जा सके जिससे कि इन पुलिस वालों की मानसिकता बदल जाए तो निश्चित रूप से सोने पर सुहागा होगा. बहरहाल अभी तो चव्हाण जी बधाई के पात्र हैं ही इस आधुनिक व्यवस्था को लागू करने के लिए. 

राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलते वाहन और शहर के अन्दर दौड़ते आटो जो किसी को दिखाई नहीं देते

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इस जीप में तीन व्यक्ति पीछे लटके थे और एक व्यक्ति ड्राइवर के दाहिनी तरफ बैठा हुआ था. ड्राइवर की सीट के पास एक लोहे का टुकड़ा लगा दिया गया है जिस पर यह व्यक्ति पीछे की तरफ मुंह करके बैठा नजर आ रहा होगा. जीप काफी तेज गति से आ रही थी इसलिये फोटो धुंधला हो गया है. राष्ट्रीय राजमार्ग पर दौड़ रहे टैम्पो में पीछे लटके दो व्यक्ति और बांयी ओर लटका एक व्यक्ति देख सकते हैं. शहर के अन्दर भी इससे अधिक बेहतर हालात नहीं हैं. इस आटो के पीछे भी दो व्यक्ति खड़े होकर सफर पूरा कर रहे हैं. इस तांगे को देखिए. दर्जन भर से अधिक व्यक्ति बैठे हुये हैं इस पर. स्वयं तो जोखिम में हैं ही साथ में घोड़े की हालत भी खराब हो रही है.जान हथेली पर लेकर यात्रा करना इन लोगों की मजबूरी हो गयी है, लेकिन सरकार की क्या मजबूरियां हैं, समझ नहीं आता. एक अन्य फोटो में आपको रोशनी और शटर स्पीड का जादू दिखाई देगा. इस फोटो को रात में लिया था जिसके कारण एक्सपोजर समय बढ़ गया और इसी दौरान हाथ के हिलने से कैमरा घूम गया. परिणाम यह कि घूमती हुई रोशनी फोटो में आ गयीं.

चित्र पहेली का उत्तर कुछ अन्य चित्रों के साथ

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पिछले फोटो में आप लोगों ने सही पहचाना. वसूली ही हो रही थी. राष्ट्रीय राजमार्गों पर हर जगह यही आलम है. अब वसूली के लिये कुछ लोग पाल लिये जाते हैं ताकि पकड़े जाने पर सारा दोष उन किराये के टट्टुओं पर मढ़ दिया जाये. रोजाना हजारों ट्रक-टैम्पो निकलते हैं चौथ देते हुये. कहीं पुलिस वाले, कहीं सचल दल-परिवहन विभाग वाले खड़े रहते हैं. कई बार लम्बे जाम लग जाते हैं. बड़े-बड़े नेताओं, अधिकारियों और प्रेस का बिल्ला लगी न जाने कितनी गाड़ियां निकलती गयीं आंख मूंदकर. शायद अब यही हमारी संस्कृति और शिष्टाचार बन गयी है. हजारों ओवरलोडेड ट्रक काल बनकर सड़कों पर रोज दौड़ते हैं. जब कोई बड़ी दुर्घटना हो जाती है तो राज्य के सचिव, मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और परिवहन विभाग वालों के बयान आने लगते हैं और दो-चार दिन थोड़ा बहुत दिखावा कर लिया जाता है और फिर एक बड़ी दुर्घटना की प्रतीक्षा होने लगती है. फिर मरने वालों को इतना और घायलों को इतना मुआवजा दे दिया जाता है और लोकतन्त्र इन्हीं ओवरलोडेड ट्रकों पर फर्राटा भरने लगता है. कल कुछ चित्र और प्रस्तुत करूंगा.

एक चित्र पहेली मेरी तरफ से भी.

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आप लोगों के लिये एक बड़ी आसान चित्र पहेली दे रहा हूं, देखिये और बताइये. आपको अपने शब्दों में इस चित्र को देखकर बताना है कि इस पहेली का  क्या अर्थ है. एक मिनट में उत्तर लिखने वाला  जीनियस. दो मिनट में उत्तर लिखने वाला जीनियस और पांच मिनट में लिखने वाला भी जीनियस तथा उत्तर जानकर  भी न लिखने वाला  सुपर जीनियस :)

एक ही काम के लिये किसी को सम्मानित किया जाता है तो किसी के विरुद्ध एफआईआर

एक ही काम के लिये किसी को सम्मानित किया जाता है तो किसी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई जाती है. रुखसाना और विनय कटियार कुछ समानता या असमानता का अहसास हुआ या नहीं. मैं आपकी याद ताजा कराता हूं. जम्मू-कश्मीर की रुखसाना को एक आतंकवादी को मारने पर नकद इनाम दिया जा रहा है, सरकारी नौकरी देने की घोषणा भी की गयी है. विभिन्न सरकारी-गैर सरकारी संगठन अपने पास बुलाकर सम्मानित कर रहे हैं और अन्य लोगों से भी इसी प्रकार के वीरता पूर्ण कार्य करने का आवाहन कर रहे हैं, जो कि होना भी चाहिये. अब याद दिलाता हूं कि अब से कुछ वर्ष पहले विनय कटियार ने आतंकवादियों को मारने पर कुछ इनाम देने की घोषणा की थी और उस पर जम्मू-कश्मीर में बवाल हो गया. तत्कालीन मुख्यमन्त्री गुलाम नबी आजाद ने यह कहते हुये कि इससे पूरे जम्मू कश्मीर की कानून व्यवस्था पर खतरनाक प्रभाव पड़ेगा, विनय कटियार के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने के आदेश दे दिये. क्या फर्क है उस समय और आज में. मात्र इतना कि आज गुलाम नबी आजाद मुख्यमन्त्री नहीं हैं, लेकिन केन्द्र में तो मन्त्री हैं, फिर आज ऐसा कहने वालों के विरुद्ध किसी प्रकार का न तो बयान दे रहे हैं और न ही कि...

एलर्जी से उत्पन्न खांसी के लिये एक स्व-अनुभूत प्रयोग

मुझे एलर्जी है प्रोटीन से. अब प्रोटीन से बच पाना तो बहुत मुश्किल है. कोशिश करता हूं कि इससे बचा रह सकूं. कभी-कभी पन्द्रह-बीस दिन में सेट्रीजीन लेता हूं. इसके साथ ही मुझे सुबह को काफी देर तक लगातार छींकें आती हैं और खांसी भी परेशान करती है. शाम को यह दिक्कत बहुत बढ़ जाती थी विशेषत: सोने से पहले ऐसा लगता था कि गले में कोई चीज अटक सी रही हो और खंखारने लगता था. एक दिन मेरी पत्नी ने किसी पुरानी पत्रिका में पढ़ा कि खांसी के लिये तेजपात की दो-तीन पत्तियां दूध में खौलाकर उस दूध को पीने से लाभ मिलता है. चूंकि मैं कई नामचीन चिकित्सकों से सलाह ले चुका था और दवाई भी, तथा कई इसी प्रकार के नुस्खे भी आजमा चुका था लेकिन मुझे कोई लाभ नहीं हुआ अत: मैंने इस बात को भी टाल दिया. खैर, मेरी पत्नी ने उस दिन जिद कर मुझे वह नुस्खा आजमाने को कहा. मैंने उसमें थोड़ा संशोधन किया वह यह कि तेजपात को चाय में डलवा दिया. इसलिये क्योंकि दूध मुझे अब अच्छा नहीं लगता, मुझे बचपन के वे दिन याद आ जाते हैं जब नानी के यहां हंडिया में खौलता हुआ दूध जिसका रंग हल्का गुलाबी हो जाता था, उसे जब गुड़ के साथ पीता था, तो बड़ा ही आनन्द आता था ...

लखनऊ में इन्साफ हो भी गया

लीजिये साहब, लखनऊ में इन्साफ हो भी गया. थप्प्पड़ खाने वाला कर्मचारी जेल भेजा गया और उसके बाद उसे निलम्बित कर दिया गया. भारत में यही इन्साफ है. शोक और दुख है मुझे कानून के इस मखौल पर. इससे भले तो अंग्रेज ही थे, कम से कम बाहर से तो आये थे. धिक्कार है कानून का मजाक उडाने वाले लोकतन्त्र के इन पहरुओं पर. कम से कम इस घटना पर तो मानवाधिकार आयोग को स्वत: संज्ञान लेना चाहिये और उच्च न्यायालय को भी. वरना वह दिन दूर नहीं कि गृह युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी इस देश में यदि इसी प्रकार से संविधान की खिल्ली उड़ाई जाती रही.

सुभाष चन्द्र बोस महोदय के जन्मदिन पर उन्हें शत-शत नमन

महामानव सुभाष चन्द्र बोस महोदय का जन्मदिन है आज. काश कि वह भारत के ही कुछ धूर्त व्यक्तियों की चालबाजियों का शिकार न हुये होते. नमन

थप्पड पर कुछ और

डीएम साहब कर्मचारी से डाक दिखाने को कहते हैं. जबाव में थोड़ी देर-पहला तमाचा. डीएम साहब कहते हैं "जबाव देने में मुंह नहीं खुलता" - दूसरा तमाचा. "मेरे जैसे आदमी को क्रोध दिलाता है" - तीसरा तमाचा. "इसका नाम नोट करो और जेल भिजवाओ". मुख्य सचिव महोदय के संज्ञान में इस मामले की कोई जानकारी है ही नहीं. पत्रकारों से कह रहे हैं जांच के लिये. एडीजी कहते हैं कि शिकायत होगी तो कार्रवाई के बारे में सोचा जायेगा. टेलीविजन पर स्क्रोलर में आ रहा है कि मंडलायुक्त मामले की जांच करेंगे. सवाल फिर वही कि थप्पड़ कर्मचारी ने मारा होता तो क्या ऐसी ही प्रतिक्रियायें होतीं? क्या कैबिनेट सेक्रेटरी और एडीजी साहब यही बयान दे रहे होते? क्या डीएम साहब के साथ चल रहा सुरक्षा कर्मी इसी तरह का रवैया अपनाता रहता. क्या किसी को पीटना अपराध की श्रेणी में नहीं आता? यदि शिकायत आने पर ही कार्रवाई की प्रथा हो तो फिर पुलिस की आवश्यकता क्या है? क्यों मुख्यमन्त्री को जादू की झप्पी देने की बात कहने पर दरोगा की तरफ से एफआईआर दर्ज की जाती है? स्वतन्त्रता तो मिल गयी लेकिन सफेद चमड़ी वाले अंग्रेजों से, काली चमड़...

आम आदमी के मुहं पर पड़ा थप्पड़

इस पोस्ट को लिखने से मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. अभी अभी एक खबर देखी कि लखनऊ के डीएम अमित घोष ने हड़ताल पर बैठे कर्मचारी को थप्पड़ मारा. आखिर किस तरह के समाज में जी रहे हैं हम. क्या आईएए़स और आईपीएस बनने से कोई किसी को भी पीटने का हकदार हो जाता है? हो सकता है कि वह हड़ताली कर्मचारी बिल्कुल निकम्मा और कामचोर हो तथा सरकारी काम में बाधा डाल रहा हो तो ऐसे कर्मचारी को नौकरी से निकालने के लिये व्यवस्था मौजूद है. मैं किसी निकम्मे कर्मचारी का बचाव भी नहीं कर रहा, लेकिन यह कहां लिखा है कि डीएम कर्मचारी को पीट सकता है. कहां चला गया संविधान और कहां चली गयी उसमें दी हर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा की गारंटी. ऐसा ही नजारा आप को हर रोज हर शहर में मिल सकता है, कहीं कोई डीएम के रूप में, तो कहीं कोई पुलिस की वर्दी पहने या फिर कहीं कोई दबंग अपने बल का प्रयोग करता दिखाई देता है. यदि कोई कर्मचारी यदि किसी अधिकारी के साथ यह सुलूक करे तो उसका हश्र क्या होगा. यह कानून की किस किताब में लिखा है कि हड़ताल तुड़वाने के लिये मारपीट करो. अन्तर दोनों के बीच में इतना है कि मार खाने वाला आईएए़स नहीं बन पाया और मारने वाला ...

क्या माइक्रोसाफ्ट की बेवसाइट काम नहीं कर रही है.

मैं अपने आपरेटिंग सिस्टम को अद्यतन करने के लिये माइक्रोसाफ्ट की साइट पर नहीं जा पा रहा हूं, कृपया बताने की कृपा करें कि क्या यह साइट काम नहीं कर रही है तथा एक्स पी को कहां से अपडेट किया जा सकता है-धन्यवाद.

यूं ही होते रहेंगे रेल हादसे.

पिछली रेल दुर्घटनाओं को अभी भुला भी नहीं पाये थे कि आज एक और हादसा हो गया. हर बार हादसे के बाद एक कमेटी बनाई जाती है और उसके बाद फिर क्या होता है, कुछ पता नहीं चल पाता. एक बार फिर वही मृतकों और घायलों को मुआवजे का ऐलान, दोषियों को सजा का. होता क्या है, जांच कमेटी की रिपोर्ट आती है, लीपा-पोती हो जाती है और लोग फिर तैयार होने लगते हैं दुर्घटनाओं में मरने के लिये. कर्मचारी भी दोषी हैं और सरकारें भी. जड़ कोई काटना नहीं चाहता सिर्फ पत्तियों को नोचने का दिखावा करते रहते हैं सब. जब कर्मचारी कम हैं तो बढाये क्यों नहीं जाते. जो नाकाबिल हैं उन्हें नौकरी से निकाला क्यों नहीं जाता. जो जितना बड़ा उसकी तनख्वाह उतनी ही ज्यादा, काम उतना ही कम. मैंने न जाने कितने अफसरों कर्मचारियों को देखा है जो काम नहीं करते और उनपर कोई कार्रवाई नहीं होती जिसका खामियाजा काम करने वालों को इन निकम्मों का भी काम करके भुगतना पड़ता है. बात हो रही थी इस दुर्घटना की. इस देश में नियम कानून से कौन काम करना चाहता है और करे भी क्यों. लखनऊ-दिल्ली के मध्य रेलवे क्रासिंग का नजारा देख लीजिये, पढ़े लिखे लोग लाइन से गाड़ी खड़ा करना पस...

वह मृत्यु के बाद दोबारा जीवित हुआ

उन्नीस सौ अस्सी के आस-पास की बात है. उत्तरप्रदेश के पीलीभीत जिले में एक तहसील है बीसलपुर. इस नगर से दक्षिण में करीब सात-आठ किलोमीटर दूरी पर एक गांव है वसारा. जिसके निवासी थे श्री बाबूराम शर्मा जिनकी मृत्यु सन 2008 में हो गयी है. इनके चार पुत्र थे. दूसरे नम्बर पर एक पुत्र था जिसका जन्म रास्ते में ही हो गया था, इसलिये उसके घर का पुकारने का नाम रख दिया गया था जंगली. श्री बाबूराम शर्मा के तीन पुत्रियां भी हैं. सन 1981 की बात है, जब श्री शर्मा की सबसे बड़ी विवाहिता पुत्री पीलीभीत से अपने पिता के घर आई. बीसलपुर में लगने वाला मेला बड़ा प्रसिद्ध है. दूर-दूर से लोग यहां मेला देखने आते हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिये जादूगर, दस्तकार, नौटंकी के कलाकार इत्यादि भी यहां आकर नाम और पैसा दोनों ही चीजें पाते हैं. इन्हीं दिनों मेला देखने के बाद बीसलपुर से वापस आकर सब लोग जैसे कि गांव में होता है, सोने के लिये बरामदे में लेट गये. नीचे पुआल की तह, ऊपर से बिस्तर बिछाकर गांव के शान्त माहौल में सब लोग सो गये. अर्धरात्रि के बाद काल का साक्षात स्वरुप एक सांप भुसौरी (भूसा रखने की जगह) से निकला और उसने जं...

हाशमी साहब के हवाले से इंकलाब का एक सम्पादकीय

हाशमी साहब "इंकलाब" के हवाले से लिखते हैं कि आरक्षण पर पहला हक मुसलमानों का है. आजादी के बाद हवालातों और जेल में तो मुसलमानों की संख्या तो बढ़ी है लेकिन नौकरियों में नहीं. गृह मंत्रालय के चालीस बड़े अफसरों में से एक भी मुसलमान नहीं. रेलवे में 5%, बैंक में 3.5%. फौज में मात्र 2.5% मुसलमान हैं, लेकिन कारगिल में 8% शहीद हुये. जहां तक मेरा ज्ञान है फौज ने इस प्रकार की कोई गिनती जारी नहीं की. ऊपर से यह लिखकर सिद्ध क्या करना चाहते हैं ये लोग. मुसलमानों को चुन-चुनकर कारगिल में लड़ने के लिये (बल्कि मरने के लिये) भेजा गया. जैसा कि मैंने ऊपर स्थिति का वर्णन किया है, इस तरह की पृष्ठभूमि के चलते जहां एक घर में पच्चीस-तीस लोग रहते हों, जो लोग धार्मिक कट्टरता को ओढ़े और आधुनिक शिक्षा से दूर रहते हुये (चाहे वह मानसिकता के कारण हो अथवा गरीबी के कारण जिसके लिये थोक में बच्चे पैदा करना एक बडी वजह है), क्या वे लोग सरकारी-गैरसरकारी नौकरी पाने के योग्य हैं? और वे मुसलमान जिन्हें नौकरियां मिली हैं क्या इसी तरह की पृष्ठभूमि से आये हुये हैं, कदापि नहीं. लेकिन उनके द्वारा यह सब लिखने का मंतव्य क्या ह...

जम्बू द्वीप के अखंड देश के प्रखंड में विकराली दल का राज्य, चीतों का आक्रमण तथा अमात्य पर कार्रवाई के आदेश

एक समय की बात है जम्बू द्वीप में अखंड नामक देश में एक महामंदिर नाम के शासक का राज्य था. उस अखंड नामक देश में प्रखंड व्यवस्था के अन्तर्गत कई प्रखंड हुआ करते थे. ऐसे ही एक प्रखंड में विकराली दल नामक एक दल का राज था. वह विकराली दल कई वर्ष से राज्य करता चला आ रहा था. येन केन प्रकरेण उस दल को सत्ता से हटाना ही महामंदिर का उद्देश्य बन गया था. विकराली दल को चुनौती देने के लिये महामंदिर ने अपने युवराज को यह कार्य सौंपा. युवराज ने विकराली दल को हटाने के लिये एक असंतुष्ट युवा को खड़ा कर दिया. इस असंतुष्ट युवा ने चीता सेना बना ली. धीरे-धीरे चीतों ने पूरे प्रखंड को अपने हमलों से दहला दिया  महामंदिर की इच्छा पूरी हो गई. प्रखंड में विकराली दल की सरकार को शासन-व्यवस्था में नाकाम पाकर अखंड देश महाराज्यीय शासन लागू कर दिया. लेकिन इधर चीता सेना के हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. चीता सेना का संस्थापक वह असंतुष्ट युवा अब इस प्रखंड को चीतों के देश में बदलना चाहता था जिसके लिये अब वह महामंदिर और युवराज का भी हुक्म मानने को तैयार नहीं था. वह अब महामंदिर द्वारा दिये गये साधनों का प्रयोग महामंदिर के विर...

जम्बू द्वीप के अखंड देश के प्रखंड में विकराली दल का राज्य, चीतों का आक्रमण तथा अमात्य पर कार्रवाई के आदेश

एक समय की बात है जम्बू द्वीप में अखंड नामक देश में एक महामंदिर नाम के शासक का राज्य था. उस अखंड नामक देश में प्रखंड व्यवस्था के अन्तर्गत कई प्रखंड हुआ करते थे. ऐसे ही एक प्रखंड में विकराली दल नामक एक दल का राज था. वह विकराली दल कई वर्ष से राज्य करता चला आ रहा था. येन केन प्रकरेण उस दल को सत्ता से हटाना ही महामंदिर का उद्देश्य बन गया था. विकराली दल को चुनौती देने के लिये महामंदिर ने अपने युवराज को यह कार्य सौंपा. युवराज ने विकराली दल को हटाने के लिये एक असंतुष्ट युवा को खड़ा कर दिया. इस असंतुष्ट युवा ने चीता सेना बना ली. धीरे-धीरे चीतों ने पूरे प्रखंड को अपने हमलों से दहला दिया  महामंदिर की इच्छा पूरी हो गई. प्रखंड में विकराली दल की सरकार को शासन-व्यवस्था में नाकाम पाकर अखंड देश महाराज्यीय शासन लागू कर दिया. लेकिन इधर चीता सेना के हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. चीता सेना का संस्थापक वह असंतुष्ट युवा अब इस प्रखंड को चीतों के देश में बदलना चाहता था जिसके लिये अब वह महामंदिर और युवराज का भी हुक्म मानने को तैयार नहीं था. वह अब महामंदिर द्वारा दिये गये साधनों का प्रयोग महामंदिर के विरु...

समझ में नहीं आ रहा कि मैं नये साल की खुशी में झूमूं या फिर जाने वाले साल का अफसोस करूं

नया साल आने वाला है. अभी ग्यारह बजे मैं यह लिख रहा हूं, मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं नये साल की खुशी में झूमूं या फिर जाने वाले साल का अफसोस करूं. हम में से अधिकांश व्यक्ति क्या समय का वास्तव में सदुपयोग करते है? और जब मैं स्वयं अपने पिछले एक वर्ष का लेखा-जोखा करने बैठता हूं तो पाता हूं कि मेरे जीवन का साल बेकार गया. कारण स्पष्ट है. जितना कुछ समाज ने मुझे दिया मैंने उसका हजारवां हिस्सा भी वापस नहीं किया. वह हर चीज जो प्रकृति ने मुझे बख्शी है, उसका मैं शुक्रगुजार हूं, लेकिन यहां पर भी मैंने प्रकृति का कर्ज उतारने के लिये कुछ नहीं किया. शायद यही ढर्रा चलता रहता है, हम लोग अपने में मशगूल रहते हैं.कर्ज लेते रहते हैं लेकिन उतारने के लिये कुछ नहीं करते. समाज और प्रकृति के प्रति जो हमारी जिम्मेदारी है, उसे हम नहीं निभा पाते. अधिकारों के लिये सजग रहते हैं लेकिन कर्तव्यों के नाम पर उदासीन हो जाते हैं. यहां पर भी वही चीज सामने आती है कि जब नियम-कानून का मखौल उड़ाने वाले मौज में रहते हैं और उन्हें इसकी सजा न मिलकर मजा मिलता है तो कानून का पालन करने वाले हताश हो जाते हैं. दोनों तरह के ही लोग हमार...