हर चैनल पर इस तरह से दिखाया जा रहा है जैसे कि राम का नाम लेना गुनाह हो गया हो. बड़ी शर्मिन्दगी का अहसास कराया जाता है हर राम भक्त को. रामभक्तों की आस्था पर जैसे प्रश्न उठाये जा रहे हैं, क्या किसी अन्य धर्मावलम्बियों के साथ यह व्यवहार किया जा सकता है? कभी नहीं. राम का नाम लेना अपशब्द का पर्याय बनाया जा रहा है. कोई चैनल यह बताने को तैयार नहीं कि राम अयोध्या में पैदा नहीं हुये तो कहां हुये. क्या ऐसे ही प्रमाण मक्का-मदीना-जेरुसलम के बारे में मांगे जायेंगे. मन में क्षोभ है. एक पुरानी रचना प्रस्तुत कर रहा हूं. हे राम,तुम कौन हो, एक कवि की कल्पना, या इस देश के दुर्भाग्य की अल्पना, कौन हो तुम प्रमाण चाहिये, तुम्हारे होने का सूक्ष्म ही सही, इतिहास में कुछ परिमाण चाहिये, ऐतिहासिक प्रमाणों के बिना हम कुछ भी नहीं मानेंगे, यदि इतिहास में दर्ज नहीं होगा तो अपने बाप को भी बाप नहीं मानेंगे, क्यों नहीं कराया अपने पैदा होने का रजिस्ट्रेशन, बिना मतलब में करा दिया इतना फ्रस्ट्रेशन, पता नहीं बाल्मीकि ने तुमको कहां से खोज लिया और तुलसी ने क्यों रच दिया एक ग्रन्थ, संभवत: साम्प्रदायिकता की भट्टी में झोंकना चाह...