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Showing posts from October, 2008

एक प्रश्न भारत सरकार से

एक प्रश्न जो मैं चाहता हूँ कि हर व्यक्ति भारत सरकार से पूछे - "स्विट्ज़रलैंड सरकार ने यह फैसला किया है कि वहां के बैंकों में रखे हुए काले धन का विवरण उन सरकारों को दे दिया जायेगा जो सरकारें इसके लिए आवेदन करेंगीं. भारत सरकार इसके लिए कब आवेदन करेगी और किस दिन इन बैंकों में रखे गए धन और जमाकर्ता का विवरण भारत के प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध कराया जायेगा."

प्रत्येक भारतीय के लिए जानने लायक कुछ तथ्य

निम्न लिखित विचार आज की मेरी पोस्ट पर श्री विजय कुमार शर्मा जी ने अपनी टिप्पणी के रूप में दिए हैं, जो मुझे इतने अच्छे लगे कि उनकी पूरी टिप्पणी को ही मैंने यहाँ पेस्ट करदिया है - (मैं शर्मा जी का आभार व्यक्त करता हूँ) "इस चुनाव के पहले जान लेने लायक कुछ तथ्य- http://knol।google।com/k/suresh-kumar-sharma/strong-argument-and-follower-of-this/3mxnj9h0lwhon/11# please promote it। दुनिया की क्रांतियों का इतिहास कहता है कि परिवर्तन के लिए दो चीजों की आवश्यकता है । एक अकाट्य तर्क और दूसरा उस तर्क के पीछे खड़ी भीड़ । अकेले अकाट्य तर्क किसी काम का नही और अकेले भीड़ भी कुम्भ के मेले की शोभा हो सकती है परिवर्तन की सहयोगी नही । इस युग के कुछ अकाट्य तर्क इस प्रकार है - * मशीनों ने मानवीय श्रम का स्थान ले लिया है । * कम्प्यूटर ने मानवीय मस्तिष्क का काम सम्भाल लिया है । * जीवन यापन के लिए रोजगार अनिवार्य होने की जिद अमानवीय है । * 100% रोजगार सम्भव नही है । * अकेले भारत की 46 करोड़ जनसंख्या रोजगार के लिए तरस रही है । * संगठित क्षेत्र में भारत में रोजगार की संख्या मात्र 2 करोड़ है । * दुनिया के ...

फिर आया चुनाव का मौसम

चुनाव का मौसम सर पर है, फिर नेता बरसाती मेंढकों की तरह टर-टराने लगेंगे. फिर सावन-भादों की वर्षा की तरह चारों तरफ़ से घोषणाओं, वादों और मैनिफेस्टो की बारिश होने लगेगी. कुछ घोषणाएं अमर हो चुकी हैं जिनमें गरीबी हटाओ, बेरोजगारी का उन्मूलन, भ्रष्टाचार का समूल नाश, सांप्रदायिक ताकतों पर लगाम, आर्थिक सम्पन्नता, आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने जैसी अनादिकाल से चली आ रही घोषणाएं शामिल होंगी. नेताओं को इंसान अब इंसान नजर नहीं आयेंगे, बल्कि वोट नजर आयेंगे. किसी की शक्ल में पंजा तो कोई कमल का फूल, कोई साइकिल तो किसी नेता की आंखों के सामने इंसान हाथी की सूरत में भी नजर आएगा. कुछ दिनों तक अब बड़े से बड़ा दबंग आदमी भी कलुवा को चाचा कहकर पाँव छूता दिखाई देगा, हर घर में कोई न कोई रिश्तेदार बन जायेगा। चाचा, चाची, ताऊ, ताई, मामा, मामी, भइया, भाभी, बुआ, फूफा, भतीजा, भतीजी, जीजा, जीजी न जाने कितने नए रिश्तेदार पैदा हो जायेंगे (अब यह बात और है कि इस तरह की रिश्तेदारियों में कोई पत्नी जैसा रिश्ता निभाना पसंद नहीं करेगा, अन्यथा नेताजी न जाने कितने रिश्ते बना लें) । हर वह आदमी जिसे उनकी गाड़ी के सामने आ जाने पर...

"आई० बी० के अफसरान ने दी हिन्दू दहशतगर्दो को ट्रेनिंग" तथा स्टार प्लस पर आज एक ख़बर "

" आई० बी० के अफसरान ने दी हिन्दू दहशतगर्दो को ट्रेनिंग मिलट्री के गिरफ़्तार कैप्टन का सनसनीखेज़ इंकशाफ़ , पूरा मुल्क सकते में ... एटीएस का दावा और ... साबिक़ फ़ौजी अफ़सरान और हिन्दू दहशतगर्दों का ख़तरनाक गठजोड़ " उक्त पंक्तियाँ सुश्री फिरदौस खान के ब्लॉग " मेरी डायरी " की पोस्ट में प्रकाशित हैं। हालाँकि मैं किसी और विषय पर लिखना चाहता था लेकिन विगत कुछ दिनों से हिन्दुओं पर हमले कुछ ज्यादा ही तेज हो गए हैं , इसलिये मैं मजबूर हो गया , इस पर लिखने के लिए । पहली चीज जो मैं लिखना चाहूँगा वह यह है कि मैंने अपने पिछले कई लेखों में यह लिखा था कि भेदभाव परक सरकारी नीतियों के चलते कहीं ऐसा न हो जाए कि आगे चलकर लोगों को यह लगने लगे कि आतंकवादी बनने में अधिक लाभ है और देश के लिए शीश कटाना घाटे का सौदा। एक अन्य लेख में मैंने यह लिखा था कि अगर आतंकवादियों के साथ नरमी बरती जाती है और उनके लिए सरकारी नौकरी का बंदोबस्त किया जाता ...

एक वो भी दिवाली थी एक ये भी दिवाली है.

मैं बात कर रहा हूँ अस्सी - इक्यासी के आस पास की दीपावली की , जब मेरी उम्र लगभग सात साल हुआ करती थी , उस समय की जो धुंधली सी यादें मुझे अभी भी स्मृत हैं , उनमें मुझे याद है कि जहाँ मैं रहता था उस गाँव के तीन - चार घरों में ही बिजली हुआ करती थी , दो - तीन मंदिरों में भी बिजली का कनेक्शन हुआ करता था । दीपावली के दो - तीन दिन पहले प्राथमिक स्कूल बंद हो जाता था । गाँव में तीन - चार परचूनी की दुकानें थीं , जिनमें रोजमर्रा का सामान मिल जाया करता था , इन्हीं दुकानों में पटाखे , फुलझडी इत्यादि मिल जाया करती थीं । सबसे प्रिय चीज थी टीन का बना तमंचा , जिसमें एक लम्बी रील लगायी जाती थी जिस रील के अन्दर कागज़ की दो परतों के बीच में थोड़े से बारूद की एक टिकली होती थी जो ट्रिगर दबाने पर धमाके के साथ फूट जाया करती थी । मुर्गा छाप पटाखे , फुलझडी और कभी कभी कभार रॉकेट भी मिल जाया करते थे । घर पर खूब रौशनी होती लेकिन आज की तरह बिजली के बल्बों की नही...

सूचना अधिकार को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार न्यायालय में. .

मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष के बारे में जानकारी को लेकर दायर सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को उक्त जानकारी उपलब्ध कराने के आदेश दिए , जिसके विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार उच्चतम न्यायालय में गई है । प्रदेश सरकार ने दलील दी है कि इस सूचना को उपलब्ध कराने से निजता का हनन होगा । यह बात समझ में आने वाली नहीं है कि इन सूचनाओं को प्रदान करने से कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा । उच्च पदों पर बैठे तमाम शीर्ष नेता एवं अधिकारी वैसे ही इस अधिनियम से प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं तथा लगातार यह कोशिश की जा रही है कि किस प्रकार से अधिनियम को मोथरा किया जा सके । सूचना का अधिकार अधिनियम लाकर यू० पी ० ए० सरकार ने एक अच्छा कदम उठाया था , लेकिन इस अधिनियम की धार को मोथरा करना इस अधिनियम का गला घोंटने जैसा होगा । मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि इस अधिनियम के अंतर्गत सूचना न दे...

दीपावली पर बधाई

दीपावली का त्यौहार आने वाला है , सभी देशवासियों को बधाई । सभी से मेरी विनती है कि दीपों के इस पर्व पर दीयों के साथ साथ दिलों को भी रौशन करें । द्वेष और ईर्ष्या को अन्धकार की तरह ही दूर भगाएं और यदि हो सके तो पटाखे और फुलझडी इत्यादि का प्रयोग न्यूनतम करें , न करें तो और अच्छा होगा , प्रदूषण वैसे ही बहुत है हमारे देश में , जिससे बहुत अधिक नुकसान हो रहा है । एक बार फिर सबको हार्दिक बधाई ।

कुछ खबरें मेरी नजर से

राहुल भैया ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीमी है , उन्हें भी इन्साफ पाने में कई वर्ष लग गए थे , अपने पिताजी और दादीजी के मामलों में। अफजल को फाँसी न दिए जाने को लेकर यह उदगार व्यक्त किए गए। अच्छी बात है कि कम से कम भैया को यहाँ की धीमी कानूनी प्रक्रिया की जानकारी तो हुई तथा वह भी स्व - अनुभव से। दूसरा पहलू यह है कि अफजल का मामला अब अदालती प्रक्रिया के कारण नहीं फंसा हुआ है , मेरा यह कहना है कि यदि अफजल को फाँसी देना सरकार आवश्यक समझती है तो दे , नहीं समझती है तो वैसा करे , लेकिन एक दया की अपील को कितने लंबे समय तक लटकाया जा सकता है , इस पर क्यों विचार नहीं किया जाता। राजनीतिक गोटें बिछाने के लिए अब इंसान तो इंसान रहे , लग रहा है संस्थान भी ओछी राजनीति की बलि - वेदी पर चढ़ाये जाने की ओर अग्रसर किए जा रहे हैं। पता नहीं यह प्रक्रिया कहाँ जा कर रुकेगी और कौन कौन सी संस्था तथा संस्थान इस की बलि चढेंगे। बिहार में राज ठाकरे की...

केवल राज ठाकरे के ही दुष्कर्मों को लेकर इतना हो-हल्ला क्यों, बाकियों को क्यों बख्शा जा रहा है?

जो राज ठाकरे आज महाराष्ट्र में कर रहे हैं, वह कभी पहाड़ पर भी हो चुका है, उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में मैदानी इलाकों से जाने वाले लोगों को वहां के लोग खूब सताया करते थे। कई लोग अपनी नौकरियां छोड़कर वापस मैदानी इलाकों में अपने घर पर आ गए। दक्षिण भारत में भी हिन्दी विरोध पर खूब हल्ला-गुल्ला किया गया, सत्तर के दशक के अंत में हिन्दी विरोधी आन्दोलन जब चरम पर था, वहां भी हिन्दी भाषियों को खूब परेशान किया गया। बहुत से राज्यों में उस राज्य के बाहर के लोग न तो राज्य की सेवाओं के लिए चयनित किए जा सकते हैं न ही संपत्तियां खरीद सकते हैं। जम्मू-कश्मीर का उदाहरण प्रत्यक्ष है। केंद्रीय सेवाओं के लिए यह नियम लागू नहीं होता। वैसे यहाँ पर एक सुझाव देना चाहूँगा कि सभी नियुक्तियां चाहे वह केन्द्र की हों या राज्य सरकारों की, केवल संघ लोक सेवा आयोग तथा कर्मचारी चयन आयोग के ही माध्यम से होना चाहिए, इससे लाभ यह है कि अच्छे अभ्यर्थी मिलेंगे, साफ़ - सुथरी भर्ती प्रक्रिया होगी, तथा कई ऐसे योग्य अभ्यर्थी जो अन्य राज्यों की सेवाओं में नहीं बैठ पाते हैं उन्हें अन्य राज्यों की सेवाओं में भर्ती होने का मौका मिलेगा...

कुछ ख़ास खबरें

चंद्रयान- १ सफलता पूर्वक अन्तरिक्ष में सफलतापूर्वक छोड़ दिया गया, सभी देश वासियों को बधाई, आशा है कि निर्धारित समय पर चंद्रमा पर उतरेगा और जो लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, उन्हें पूर्ण करेगा। लेकिन इसे देखकर दुःख हुआ कि किसी भी वैज्ञानिक ने राजभाषा हिन्दी में बोलना पसंद नहीं किया। एक बात यह भी लोगों को बताना चाहिए कि इस यान में कितने कल पुर्जे स्वदेशी हैं और कितने विदेशी। नितीश कटारा हत्याकांड में अभियोजन के गवाह अजय कटारा पर एक और मुकदमा लूट का दर्ज कराया गया है। स्मरण हो कि अजय कटारा के ऊपर कुछ दिनों पूर्व ही अपहरण का एक मामला दर्ज हुआ था। मामले को दर्ज कराने वाली महिला डी पी यादव की रिश्तेदार बताई जाती है। अजय कटारा ने प हले भी कहा था कि उसके लिए नितीश कटारा हत्याकांड में गवाही देने के कारण धमकाया जाता रहा है और उसके विरुद्ध अपहरण का आरोप बदला लेने की नीयत से लगाया जा रहा है। सरकार तथा न्याय- पालिका को इस तरफ़ अविलम्ब ध्यान देना चाहिए तथा इस की न्यायिक जांच कराई जानी चाहिए, यदि वास्तव में अजय कटारा के आरोप सही हैं तो भविष्य में कोई भी व्यक्ति अभियोजन के लिए गवाही नहीं देगा और तब यह पू...

कुछ ख़ास खबरें

देश के इस्लामीकरण में ज्यादा देर नहीं.

कल संसद में असम के कोकराझार के सांसद श्री ए० एस० बिस मुति यार ने असम में हिन्दुओं , बोडो तथा असमिया लोगों के ऊपर बंगलादेशी घुसपैठियों द्वारा आई एस आई की मदद से किए जा रहे अत्याचारों को उठाने की कोशिश की , उन्होंने बताना चाहा कि किस प्रकार कितने लोगों की हत्याएं की गई हैं तथा कितने लोगों को अपना घरबार छोड़ना पड़ा । लेकिन उनके इस प्रयास को श्री अकबर अहमद डम्पी , श्री इलियास आजमी जैसे लोगों ने विफल कर दिया । माकपा के मोहम्मद सलीम ने भी उनके कथन पर आपत्ति की । श्री डम्पी व आजमी बाठला हॉउस मुठभेड़ की न्यायिक जांच को लेकर तथा मुसलमानों के प्रति हो रहे तथाकथित अन्याय को लेकर शोर - शराबा करते रहे । दो आतंकवादियों के मारे जाने को लेकर इतना हो हल्ला , लेकिन असम में सैकडों लोगों के मारे जाने को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं , क्योंकि वे मुसलमान नहीं हैं । धर्म - निरपेक्षता की दुहाई देने वाले लोगों को यह क्यों नहीं दिखाई देता कि बाठला हाउस मुठभेड़ को लेकर सिर...

चुनाव आसन्न हैं, कुछ ऐसे कार्य हैं जो अत्यावश्यक हैं

१- सेना, अर्द्धसैनिक बल तथा पुलिस इत्यादि अन्य सुरक्षा सेवाओं के जवानों को वोटिंग का अधिकार दिया जाए, चाहे वह प्रॉक्सी वोटिंग के रूप में ही क्यों न हो। २- प्रत्येक नागरिक के लिए मतदान अनिवार्य कर दिया जाए, और न करने पर कम से कम पाँच सौ रुपये या एक सप्ताह की आय का जुरमाना लगाया जाना चाहिए। ३-जन प्रतिनिधियों की वापसी हेतु व्यवस्था बनाया जाना चाहिए। ४-वोटिंग के लिए एक मल्टी-परपज आई-कार्ड का प्रयोग किया जाना चाहिए और घर-घर जाकर वोटिंग कराना चाहिए, इसके लिए बेरोजगार युवाओं को चुनाव मित्र के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। ५-वोटिंग के लिए ऑनलाइन व्यवस्था की जा सकती है, जिसमें कोई भी व्यक्ति कहीं से भी अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट कर सकता है, इसके लिए इंटर-एक्टिव बायो-मैट्रिक प्रणाली का प्रयोग किया जा सकता है। इस प्रणाली में अठारह वर्ष से अधिक के प्रत्येक नागरिक को एक आई-कार्ड मुहैया कराना पड़ेगा, इस आई-कार्ड की चिप में व्यक्ति का यूनिक आई डी नंबर तथा आंखों की पुतली तथा अंगूठे का प्रिंट सुरक्षित रहेगा तथा बाकी सारी सूचनाएँ जैसे नाम, पता, जन्म तिथि, शैक्षिक योग्यता, वर्ग, मासिक आय, पैन कार्ड,...

सरकार,मीडिया और राजनेताओं से कुछ प्रश्न

१- अपह्रत जापानी जहाज के भारतीय मूल के कर्मचारियों को लेकर अभी तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई है ? २- फ्रांस में पगड़ी के मुद्दे तथा बुरखे के मुद्दे को लेकर भारतीय प्रतिनिधिओं ने फ्रांसीसी सरकार से बात की थी, लेकिन मलेशिया में हिन्दुओं के साथ लगातार हो रहे दुर्व्यवहार को लेकर सरकार, मीडिया और राजनेता सभी उदासीन हैं, क्यों? ३- अधिकतर दरोगा अपनी बुलेट मोटर साईकिल रखते हैं, जिसकी कीमत लगभग पचहत्तर - अस्सी हजार होती है तथा जिसका माइलेज २५-३० किमी का होता है और जिसके लिए सरकार पेट्रोल नहीं देती। वे कैसे इस गाड़ी का रख-रखाव कर पाते हैं, जबकि उनकी तनख्वाह अठारह-बीस हजार से अधिक नहीं होती। ये केवल एक छोटा सा नमूना भर है। ४- रेलवे पार्किंग में चौबीस घंटे के लिए दरें निर्धारित होती हैं, लेकिन ठेकेदार (जो अधिकतर दबंग व बाहुबली होते हैं), कैलेंडर दिवस के अनुसार रुपये लेते हैं तथा निर्धारित दरों से अधिक लेते हैं, इन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती? ५- यही हाल नगर निगम की पर्किंगों का है, इसके अतिरिक्त कुछ स्थानों पर नगर निगम की जमीन पर अस्पतालों, सिनेमाघरों तथा अन्य संस्थानों के मालिक अपनी ...

आई सी एल के मैचों का बायकाट क्यों ?

आई सी एल के मैचों के बारे में जी न्यूज़ के अलावा किसी भी चैनल पर जानकारी नहीं दी जा रही है, स्क्रोलर में हो सकता है एक लाइन की क्लिप दिखाई जा रही हो, मीडिया के लोग इतना पक्षपाती हो सकते हैं, मुझे अंदाजा न था। इसका एक कारण यह हो सकता है कि जी टेलिविज़न समूह के द्वारा आयोजित किए जाने के कारण अन्य चैनल इन मैचों की ख़बर न दिखा रहे हों, उन्हें यह डर होगा कि आई सी एल के मैचों की ख़बर देने पर जी टेलिविज़न समूह का प्रचार हो जायेगा। लेकिन इन्हें यह ध्यान भी रखना चाहिए कि आई सी एल प्रतियोगिता में अनेक अन्तर-राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिलब्ध खिलाड़ी भी भाग ले रहे हैं। व्यापारिक हितों के चलते देश के लोगों की रूचि का भी ध्यान रखना चाहिए। इस प्रकार का व्यवहार अपनाकर आई सी एल प्रतियोगिता के बारे में ख़बर न दिखाने से इन चैनलों के प्रति लोगों की धारणा में भी अन्तर आ सकता है। ध्यान रहे कि इन्हीं चैनलों ने आई पी एल प्रतियोगिता की कवरेज़ व्यापक रूप से की थी।

आबादी के अनुपात में टिकटों का दिया जाना

बहन जी ने कहा है कि मुस्लिमों को टिकट उनकी आबादी के अनुपात में दिए जायेंगे, अच्छी बात है, लेकिन बाकियों को (जैसे सिखों, ईसाईयों, बौद्धों ) भी आबादी के अनुपात में दिए जायेंगे या नहीं, यह भी बताया जाना चाहिए। दूसरा यह कि इसके बाद जातियों के, फिर उपजातियों के नेता मांग करेंगे कि उन्हें भी आबादी के हिसाब से टिकट मिलना चाहिए, इस पर भी बात होना चाहिए। इसके बाद यदि फिर आबादी बढ़ाने की होड़ लग गई तो ११० करोड़ लोगों के देश का क्या होगा, जहाँ पहले से ही इतनी दिक्कतें पेश आ रही हों। इस सबके बाद भी नेता कहते हैं कि समाज में समरसता का वातावरण बनाया जायेगा , मुझे आश्चर्य होता है।

मुस्लिमों से कुछ प्रश्न

अधिकतर दंगों की शुरुआत मुस्लिम बस्तिओं से ही क्यों होती है. जहाँ मुस्लिमों की संख्या बढ़ने लगती है, वहां से हिन्दू क्यों अपना घर औने-पौने दामों में बेच कर चले आते हैं. पाँच हजार की हिन्दू आबादी में पचास मुस्लिम अपने आप को असुरक्षित महसूस नहीं करते, लेकिन पाँच सौ की मुस्लिम आबादी में पाँच सौ हिन्दू क्यों असुरक्षित हो जाते हैं. जरा - जरा सी बात पर जो मुस्लिम धर्म-गुरु फतवा जारी कर देते हैं वे आतंकवाद, आतंकवादियों और उनके पैरोकारों के खिलाफ फतवा जारी क्यों नहीं करते. हिन्दू देवी-देवताओं के अश्लील चित्रण के खिलाफ आजतक क्यों कोई फतवा जारी नहीं किया गया. छोटी छोटी बातों पर होने वाले झगडों में मुस्लिम आबादी इकट्ठी होकर क्यों दवाब बनाने पर उतारू हो जाती है. लडाई- झगडों में क्यों क़ानून या पुलिस का सहारा न लेकर अधिकांश मामलों में अपने हाथ में क़ानून ले लिया जाता है. क्यों हिन्दुओं के धार्मिक जुलूसों या अन्य समारोहों पर जानबूझकर आपत्ति उठाई जाने लगी है. क्यों यह बेसुरा राग अलापा जाता है कि मुस्लिमों के साथ भेदभाव किया जाता है, अगर यह सच होता तो क्या मुस्लिमों को इतनी छूट मिली होती। ख़ुद आत्मचि...

न्यायिक परिषद का गठन एक उचित कदम

केन्द्रीय सरकार ने न्यायिक परिषद बनाने की घोषणा कर निश्चित रूप से एक अच्छा कदम उठाया है, इस कदम की काफी दिनों से आवश्यकता महसूस की जा रही थी. भारत के एक पूर्व न्यायाधीश पर महाभियोग लाया गया था हालाँकि वह संसद में पारित नहीं हो सका. पश्चिम बंगाल के एक अन्य न्यायाधीश पर महाभियोग के बारे में प्रस्ताव लाया जा सकता है. निचले स्तर न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार के आरोप लगना प्रारम्भ हो चुके हैं. कई जगह से फर्जी वारंट की भी बात सामने आई है. अभी गाजियाबाद में भविष्यनिधि घोटाले में लिप्त कर्मचारी ने भी कई लोगों का नाम लिया है, इसी प्रकार पंजाब तथा चंडीगढ़ उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के यहाँ रुपये पहुँचने के मामले में एक वकील को गिरफ्तार किया गया. आर०के०आनन्द तथा आई०यू०खान पर भी गवाह को बरगलाने के आरोप लगे भी हैं तथा साबित भी हुए हैं. भारत जैसे देश में यदि न्यायपालिका की साख यदि भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते गिरती है तो यह अत्यन्त घातक स्थिति होगी, अत: इस स्थिति में न्यायिक परिषद का गठन एक उचित कदम है। हमारे देश में न्याय पाना महंगा तथा एक जटिल एवं दुर्गम प्रक्रिया में बदल चुका है, जिसमें कभी कभ...

सांसद की पिटाई

मध्य प्रदेश में भाजपा के एक सांसद श्री वीरेन्द्र कुमार की पिटाई पुलिस के जवानों ने की , जिसे टेलीविजन पर प्रसारित किया गया , हालाँकि इसके साथ पुलिस के अधिकारी के साथ हुई उनकी गरमा - गर्मी को भी दिखाया गया , इस झड़प के बाद सांसद महोदय पर जिस तरह से पुलिस वालों ने लाठियां भांजीं, उसे देखकर ऐसा लगा जैसे कि किसी जानवर को मारा जा रहा हो । यदि सांसद महोदय के बात करने का ढंग पुलिस को इतना नागवार गुजरा तो देश के तमाम पुलिस वालों के साथ ( अपवाद छोड़कर ) ऐसा ही किया जाना चाहिए । आम जनता के साथ गाली - गलौज करना तो पुलिस वालों को घुट्टी में पिलाया जाता है । यदि एक सांसद ने खरी - खोटी सुना दी तो इतना बुरा लग गया कि उनकी जान लेने पर उतारू हो गए , कल्पना करके देखिये कि अगर एक सांसद को इस तरह पीटा जा सकता है तो आम आदमी के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता होगा । इन पुलिस वालों के मुखिया को, जिसने वहां पीटने का आदेश दिया होगा , को अविलम्ब सेवा...

इस पोस्ट को क्या नाम दूँ- आप लोग ख़ुद ही फैसला कीजिए.

जिन लोगों ने मेरे कुछ आलेख पढ़े होंगे वे संभवत: मुझे एक कट्टर हिन्दू के रूप में स्थापित कर चुके होंगे। कुछ लोगों ने मेरे कुछ आलेख पढ़कर मुझे अगड़ों का समर्थक बताया लेकिन ऐसा नहीं है, बिल्कुल भी नहीं। मैं बिल्कुल कट्टर नहीं हूँ और न ही जातिवादी प्रक्रिया का समर्थक। मेरा अपना मानना यह है कि किसी भी बच्चे के पास यह अधिकार नहीं होता कि वह यह फैसला कर सके कि उसे किस व्यक्ति के यहाँ पैदा होना है। जन्म लेना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो भी बच्चा पैदा हो रहा है, वह जिस किसी भी धर्म या जाति से सम्बंधित व्यक्ति के यहाँ पैदा होता है, उस बच्चे को वही धर्म या जाति स्वत: ही मिल जाती है। अब इसके बाद उस बच्चे के मस्तिष्क में क्या भरा जाता है, यह एक अलग विषय है। सभी धर्मों के विद्वान व्यक्ति यही कहते हैं कि कोई भी धर्म निर्दोषों की जान लेना नहीं सिखाता, हो सकता है यह सत्य हो, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि धर्म के कारण ही कुछ बड़े रक्तपात भी हुए हैं। मेरा अपना मानना है कि एक साथ पैदा हुए दो-चार-आठ (कोई भी संख्या ले लीजिये) बच्चों को देखकर या कोई भी वैज्ञानिक प्रयोग कर उसकी जाति या धर्म को निश्चित ...

क्या अब कांग्रेस पर भी प्रतिबन्ध लगना चाहिए या नहीं.

मोहम्मद सुरती, कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री को बम विस्फोट के आरोप में २० साल की सजा हुई है, कांग्रेस के कुछ नेताओं पर सिखों के नरसंहार के आरोप भी लगे थे, ऐसे में कां ग ्रेस और अन्य दलों के नेता जो विहिप पर प्रतिबन्ध लगाने की पैरवी कर रहे थे, अब क्या कांग्रेस को प्रतिबंधित करने की मांग करेंगे? यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो देश की आम जनता को उन्हें प्रतिबंधित करने की मांग करना चाहिए। क्या कहना चाहेंगे आप इस पर।

इस देश से हिन्दुओं को मिटा दो

इस देश से हिन्दुओं को मिटा दो - मीडिया और धर्म-निरपेक्ष नेताओं का हाल कुछ ऐसा ही है. १९४७ में लाखों हिन्दुओं को काट दिया गया, कोई नामलेवा नहीं. १९८४ में सिखों का कत्ले-आम किसने कराया, सबको पता है, लेकिन कोई मीडिया व्यक्तित्व, कोई समाज सेवी, कोई नेता नहीं बोलता, कश्मीर से लाखों हिन्दू भगा दिए गए, उनकी महिलाओं से बलात्कार हुआ, उनके मन्दिर तोड़े गए, उनके घरों पर कब्जा कर लिया गया, किसने यह सब किया, वहां तो बजरंग दल के लोग नहीं थे, नागालैंड, असम में क्या हो रहा है, केरल में क्या हुआ, किसी को दिखाई नहीं देता, गोधरा में हिन्दू तीर्थ यात्रियों से भरे डिब्बे पेट्रोल छिड़क कर जला दिए गए, तो इन लोगों ने कहानी बनाई कि ख़ुद ही आग लगा ली, फिजी से भारतीय मूल के लोग भगा दिए गए, किसी की आँख से आंसू नहीं गिरा, मलेशिया में हिन्दुओं पर अत्याचार होते रहे तो मलेशिया का आतंरिक मामला बताया गया, पाकिस्तान में क्या हो रहा है, बांग्लादेश में हिन्दुओं के साथ क्या हुआ, हिन्दू कोई संस्था बनाता है तो उसमें सबको प्रवेश मिलता है, अल्पसंख्यक बनाता है तो सिर्फ़ उसी के लिए होती है. स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की हत्या...

सड़क पर चलते समय मुझे बड़ी कोफ्त होती है,

सड़क पर चलते समय मुझे बड़ी कोफ्त होती है, अधिकतर लोग इस काबिल होते ही नहीं कि उन्हें सड़क पर चलने देना चाहिए। ऐसे लोग चाहे वह पैदल हों या सवारी पर, हमेशा दूसरों के लिए परेशानी का सबब बनते हैं। शायद यही कारण है कि हर वर्ष हजारों लोग सड़क दुर्घटनाओं में मर जाते हैं। दुपहिये पर दो की जगह तीन सवारी, ऑटो में चार की जगह आठ, सड़कों पर चलने वाली जीपों में आठ की जगह अठारह सवारियां आम देखी जा सकती हैं। इन वाहनों की हालत देखकर ही यह कहा जा सकता है कि यह वाहन सड़क पर दौड़ने लायक नहीं हैं, लेकिन लाइसेंस देने वाले अधिकारियों को यह दिखाई नहीं देता। जहरीला काला धुआं उगलते यह वाहन दूर से ही अलग दिखाई देते हैं, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण वालों को भी यह नहीं दीखते। अधिकांश वाहनों के चालक इस काबिल होते ही नहीं कि उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस दिया जाए, लेकिन यहाँ की व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि अंधे का भी लाइसेंस बन सकता है और इसीलिए जब भारत का कोई व्यक्ति विदेश जाकर ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना चाहता है तो उसे बड़ी परेशानी महसूस होती है। हमारे यहाँ ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया बड़ी सरल है, परिवहन कार्यालय जायें, बाहर ...