वकीलों की हड़ताल
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हड़ताली डाक्टरों का एक माह का वेतन काटने के निर्देश दिये हैं, जो काफी हद तक ठीक भी हैं, लेकिन वकीलों के बारे में क्या किया जाये? वकीलों को सर्विस टैक्स के दायरे में क्या लाया गया, वकील हड़ताल पर चले गये. सर्विस टैक्स वे कौन सा अपनी जेब से भरेंगे?? इस टैक्स का बोझ भी अन्तिम उपभोक्ता अर्थात मुवक्किल पर पड़ेगा. फिर आखिर क्यों वकील हड़ताल करने पर उतारू हो गये और इस हड़ताल से किसका नुकसान है, कम से कम वकीलों का तो नहीं और अगर होगा भी तो उस मात्रा में नहीं जिस मात्रा में सरकारी कर्मचारियों का हो जाता है.
उनकी सर्विस में ब्रेक नहीं होता, उनके विरुद्ध कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं होती. छोटी से छोटी बात पर हड़ताल पर जाने वकील यह क्यों नहीं सोचते कि उनके हड़ताल पर जाने से उनके मुवक्किलों का कितना नुकसान होता होगा. लेकिन इस देश में किसी को किसी की परवाह नहीं, हर किसी को अपनी परवाह है. हर कोई चाहता है कि भगत सिंह, सुभाष फिर जन्म लें, लेकिन मेरे घर में नहीं, पड़ोसी के यहां. इस मानसिकता को बढ़ाने का काम यहां के नौकरशाहों और राजनीतिबाजों ने बखूबी निभाया है और उसी का नतीजा है कि एक सौ बीस करोड़ लोगों के देश को जहां होना चाहिये उससे पचास वर्ष पीछे है.
उनकी सर्विस में ब्रेक नहीं होता, उनके विरुद्ध कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं होती. छोटी से छोटी बात पर हड़ताल पर जाने वकील यह क्यों नहीं सोचते कि उनके हड़ताल पर जाने से उनके मुवक्किलों का कितना नुकसान होता होगा. लेकिन इस देश में किसी को किसी की परवाह नहीं, हर किसी को अपनी परवाह है. हर कोई चाहता है कि भगत सिंह, सुभाष फिर जन्म लें, लेकिन मेरे घर में नहीं, पड़ोसी के यहां. इस मानसिकता को बढ़ाने का काम यहां के नौकरशाहों और राजनीतिबाजों ने बखूबी निभाया है और उसी का नतीजा है कि एक सौ बीस करोड़ लोगों के देश को जहां होना चाहिये उससे पचास वर्ष पीछे है.
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