रियलिटी शो में खाने को दी जाने वाली चीजों पर आपत्ति

सच का सामना और इस जंगल से मुझे बचाओ दोनों ही सीरियल इस समय विवादों के घेरे में हैं. कारण है सच.... में ऐसे प्रश्नों का पूछा जाना जो बहुत ही आपत्तिजनक हैं और इस ..... में बिकिनी पहन कर नहाती हुई बालाएं. लेकिन इस सबसे बढ़कर मुझे जो आपत्तिजनक चीज महसूस हुई वह इस ..... में प्रतिभागियों के लिये दिया गया खाद्य पदार्थ है. एक दिन शराब में जीवित मछली परोसी जाती है तो दूसरे दिन आइसक्रीम में जमे हुये कीडे़, जन्तुओं के भंग किये हुये अंग. जीवित कीड़े, शायद घोर आपत्तिजनक और नितान्त अमानवीय. किसी व्यक्ति को कीड़े-मकोड़े निगलने को दिये जाना, जीवित जन्तुओं को खाने को दिये जाना कितना नारकीय हो सकता है, देखकर सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है. यूं तो आपद काल में हर चीज ग्राह्य है, हर कृत्य उचित है, लेकिन महज धन प्राप्ति के लिये, महज एक शो को जीतने के लिये मनुष्य का इस तरह का व्यवहार समझ से परे है. मनुष्य की शारीरिक बनावट यथा दांतों तथा पाचन तन्त्र मांसाहारी जानवरों से पूरी तरह से अलग है. फिर भी मांसाहारी व्यक्ति अपने मांसाहार को उचित ठहराने हेतु विभिन्न तर्क देते रहते हैं जो एक अलग चर्चा का विषय हो सकता है. एक सभ्य समाज का मांसाहारी व्यक्ति भी शायद काकरोच, मछली की आंते, जीवित मछली, कीड़े-मकोड़ों को सम्भवत: इस तरह से निगलना न पसन्द करे जैसे कि इस रीयलिटी शो में किया जा रहा है. इस तरह का भोजन उस समय तो ग्राह्य माना जा सकता है जब प्राणों पर आन पड़ी हो तथा जीवित रहने के लिये अन्य कोई विकल्प न हो. हालांकि इसके भी अपवाद हैं, स्वर्गीय बिनोवा भावे के बारे में कहा जाता है कि किसी रोग से पीड़ित होने पर उन्हें यह सुझाया गया कि उनका रोग नाग के चर्म की राख के प्रयोग से दूर हो सकता है, लेकिन स्वर्गीय संत ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया. लेकिन मानव की उस मनोदशा का क्या इलाज है जो हांगकांग में मानव भ्रूण को भी खाने से गुरेज नहीं करता और भारत भी इस मनोदशा से अछूता नहीं है, हमारे देश भारत में भी छोटे जानवरों के भ्रूण खाये जाते हैं.

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