वह मृत्यु के बाद दोबारा जीवित हुआ
उन्नीस सौ अस्सी के आस-पास की बात है. उत्तरप्रदेश के पीलीभीत जिले में एक तहसील है बीसलपुर. इस नगर से दक्षिण में करीब सात-आठ किलोमीटर दूरी पर एक गांव है वसारा. जिसके निवासी थे श्री बाबूराम शर्मा जिनकी मृत्यु सन 2008 में हो गयी है. इनके चार पुत्र थे. दूसरे नम्बर पर एक पुत्र था जिसका जन्म रास्ते में ही हो गया था, इसलिये उसके घर का पुकारने का नाम रख दिया गया था जंगली. श्री बाबूराम शर्मा के तीन पुत्रियां भी हैं. सन 1981 की बात है, जब श्री शर्मा की सबसे बड़ी विवाहिता पुत्री पीलीभीत से अपने पिता के घर आई. बीसलपुर में लगने वाला मेला बड़ा प्रसिद्ध है. दूर-दूर से लोग यहां मेला देखने आते हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिये जादूगर, दस्तकार, नौटंकी के कलाकार इत्यादि भी यहां आकर नाम और पैसा दोनों ही चीजें पाते हैं.
इन्हीं दिनों मेला देखने के बाद बीसलपुर से वापस आकर सब लोग जैसे कि गांव में होता है, सोने के लिये बरामदे में लेट गये. नीचे पुआल की तह, ऊपर से बिस्तर बिछाकर गांव के शान्त माहौल में सब लोग सो गये. अर्धरात्रि के बाद काल का साक्षात स्वरुप एक सांप भुसौरी (भूसा रखने की जगह) से निकला और उसने जंगली को डस लिया. जंगली को काटने के बाद वह शर्मा जी के ऊपर से गुजरा. ठंडा तथा लिजलिजा स्पर्श पाकर उन्होंने अपने हाथ को झटका. अब इसे नियति का खेल कह लीजिये, भाग्य का लिखा हुआ या कोई अचम्भित कर देने वाला संयोग. शर्मा जी जहां लेटे थे, वहीं पर एक खम्भा था. हाथ झटकने से उनका हाथ ईंटों के उस चौकोर खम्भे से टकराया और उनके हाथ की खाल छिल गयी जिससे कि उनके हाथ में मामूली खून छ्लक उठा. रात में टार्च की रोशनी में देखा तो पाया कि एक सांप तेजी से रेंगता चला जा रहा था. घर में हाहाकार मच गया.
शर्मा जी के हाथ में खून और सांप को देखकर यह अनुमान लगा लिया गया कि सांप ने उन्हें काट लिया है. उनके हाथ में बंध लगा दिया गया और जो भी जड़ी-बूटी की जा सकती थी, की गयी. रात में बीसलपुर जाना भी मुश्किल था, लिहाजा सुबह का इन्तजार किया जाने लगा. उधर जंगली के ऊपर विष ने असर करना प्रारम्भ कर दिया था. जब उसकी सांस अटकनी प्रारम्भ हुई तो उसने अपने गले में दर्द होने की शिकायत बहन की. विधि का विधान देखिये कि बहन ने यह अनुमान लगाया कि शायद ठंड लगने के कारण गले में दर्द हो रहा है और उसने कोई मलहम गले में मल दिया. सुबह होते होते यह पाया गया कि शर्मा जी तो ठीक थे लेकिन जंगली की तबियत खराब हो गयी थी. अब जंगली को लेकर बीसलपुर गये, वहां भी चिकित्सक को यह संदेह नहीं हुआ कि जंगली को सांप ने काटा हो सकता था. शर्मा जी के बारे में यह निश्चित किया गया कि सांप जहरीला नहीं था इसलिये उनपर कोई असर नहीं हुआ. चिकित्सक ने एक इंजेक्शन जंगली को दिया लेकिन जंगली के ऊपर विष अपना असर दिखा चुका था, लिहाजा कुछ देर बाद जंगली ने दम तोड़ दिया. बाद में जब जंगली के कपड़े उतारे गये तो उसकी बांह पर सांप के काटे के दो-तीन निशान पाये गये. लेकिन अब हो भी क्या सकता था. जैसा कि रिवाज है जंगली को गंगा में प्रवाहित कर दिया गया.
सब लोग धीरे-धीरे इस दर्द को भूल गये. जिंदगी अपने ढर्रे पर लौट गयी. वही अपने खेत, गाय, बैल, भैंस में सीमित जीवन. दुनियावी छ्ल-कपटों से दूर. संचार का एकमात्र साधन रेडियो-ट्रांजिस्टर, जिस पर रेडियो सीलोन और आकाशवाणी का रामपुर केन्द्र बजता रहता. चौपाल पर कभी कभी आल्हा सुनाई दे जाता. इसी प्रकार कुछ वर्ष बीत गये. एक बात बताना भूल गया, जंगली अपनी बुआ, यानी श्री बाबूराम जी की बहन श्रीमती कटोरी देवी, जो विधवा थीं और अपने भाई के साथ ही रहती थीं, से बहुत प्रेम करता था. शायद पांच वर्षों के बाद पड़ोस के गांव उगनपुर से एक बच्चा वसारा गांव में अपने संबंधियों के यहां आया. उसकी उम्र लगभग साढ़े तीन-चार वर्ष रही होगी. वहां आने के बाद उस बच्चे का रवैया कुछ बदल गया. वह बेचैन सा हो उठा. वह बार-बार श्री बाबूराम जी के मकान की तरफ दौड़ने लगता. पहले पहल तो उसकी बातों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब उसकी बेचैनी बढ़ती गयी और उसकी हरकतों में भी तेजी आई तो उसकी बातों पर गौर करना प्रारम्भ किया गया. उसने धीरे-धीरे बताना प्रारम्भ किया कि यह उसका अपना घर था और उसके मां-बाप, भाई-बहन तथा बुआ रहती थीं. वह दौड़कर श्री शर्मा जी के घर पहुंच गया और उनसे चिपक गया. गांव के लोग भी अचम्भित और खुद शर्मा जी के परिवारी जन भी. एक अविश्वसनीय घटना थी यह. आखिर किसे विश्वास होता कि कोई व्यक्ति मरने के बाद भी जिन्दा हो सकता था. खैर उस बच्चे से तमाम सवाल-जबाव किये गये जिससे कि उस बच्चे की बताई गयी बातों का सत्यापन हो सकता. शर्मा जी की धर्मपत्नी ने उससे एक सवाल पूछा "यह बताओ कि अगर तुम वास्तव में जंगली हो तो तुम्हें उस जगह का पता होगा जहां पर तुम खेलना बहुत पसन्द करते थे, वह कौन सी जगह थी, उस जगह की पहचान क्या थी और इस समय वह कहां है?" वह बच्चा दौड़ता हुआ बाहर निकला और एक जगह जहां एक खूंटा लगा था, वहां पहुंचा और फिर परेशान हो उठा. फिर कहने लगा कि यहां तो नल लगा था, वह नल कहां है? वास्तव में वह बच्चा जहां जाकर खड़ा हुआ, एक नल लगा हुआ था जिस जगह के इर्द-गिर्द जंगली अपना काफी समय बिताता था. उसने यह भी बताया कि उसके सांप ने दो-तीन बार काटा. जब उससे पूछा गया कि उसने किसी को बताया क्यों नहीं, तो उसने जबाव दिया कि वह डर गया था.
उसके बाद तो यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गयी और दूर-दूर से लोग जंगली के पुनर्जन्म के राज को जानने के लिये आने लगे. जैसे जैसे वह बच्चा बडा होने लगा. उसने धीरे-धीरे इस विषय पर बात करना बन्द कर दिया है. उसे लोगों ने पंडित कहना प्रारम्भ कर दिया है. आश्चर्य की बात यह है कि जहां जंगली को सांप ने काटा था, इस बच्चे के भी उसी हाथ में उसी जगह सर्पदंश के निशान मौजूद हैं. मैं खुद भी पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करता, लेकिन इस घटना ने मुझे काफी हद तक पुनर्जन्म पर विश्वास करने को मजबूर कर दिया है. जंगली का एक भाई अध्यापक है, एक भाई मेरठ के एल०एल०आर०मेडिकल कालेज में एम०बी०बी०एस० के अंतिम वर्ष में है तथा एक छोटा भाई एम०ए० कर रहा है. वैज्ञानिक पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते, लेकिन हो सकता है कि आने वाले समय में पुनर्जन्म की भी कोई वैज्ञानिक संकल्पना आ जाये, लेकिन तब तक शायद हम सभी लोग प्रकृति के इन अकूत रहस्यों के आगे बिल्कुल मजबूर हैं
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