थप्पड पर कुछ और

डीएम साहब कर्मचारी से डाक दिखाने को कहते हैं. जबाव में थोड़ी देर-पहला तमाचा. डीएम साहब कहते हैं "जबाव देने में मुंह नहीं खुलता" - दूसरा तमाचा. "मेरे जैसे आदमी को क्रोध दिलाता है" - तीसरा तमाचा. "इसका नाम नोट करो और जेल भिजवाओ".

मुख्य सचिव महोदय के संज्ञान में इस मामले की कोई जानकारी है ही नहीं. पत्रकारों से कह रहे हैं जांच के लिये. एडीजी कहते हैं कि शिकायत होगी तो कार्रवाई के बारे में सोचा जायेगा. टेलीविजन पर स्क्रोलर में आ रहा है कि मंडलायुक्त मामले की जांच करेंगे.

सवाल फिर वही कि थप्पड़ कर्मचारी ने मारा होता तो क्या ऐसी ही प्रतिक्रियायें होतीं? क्या कैबिनेट सेक्रेटरी और एडीजी साहब यही बयान दे रहे होते? क्या डीएम साहब के साथ चल रहा सुरक्षा कर्मी इसी तरह का रवैया अपनाता रहता. क्या किसी को पीटना अपराध की श्रेणी में नहीं आता? यदि शिकायत आने पर ही कार्रवाई की प्रथा हो तो फिर पुलिस की आवश्यकता क्या है? क्यों मुख्यमन्त्री को जादू की झप्पी देने की बात कहने पर दरोगा की तरफ से एफआईआर दर्ज की जाती है?

स्वतन्त्रता तो मिल गयी लेकिन सफेद चमड़ी वाले अंग्रेजों से, काली चमड़ी वालों से छुटकारा कब मिलेगा पता नहीं?

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