हाशमी साहब के हवाले से इंकलाब का एक सम्पादकीय

हाशमी साहब "इंकलाब" के हवाले से लिखते हैं कि आरक्षण पर पहला हक मुसलमानों का है. आजादी के बाद हवालातों और जेल में तो मुसलमानों की संख्या तो बढ़ी है लेकिन नौकरियों में नहीं. गृह मंत्रालय के चालीस बड़े अफसरों में से एक भी मुसलमान नहीं. रेलवे में 5%, बैंक में 3.5%. फौज में मात्र 2.5% मुसलमान हैं, लेकिन कारगिल में 8% शहीद हुये. जहां तक मेरा ज्ञान है फौज ने इस प्रकार की कोई गिनती जारी नहीं की. ऊपर से यह लिखकर सिद्ध क्या करना चाहते हैं ये लोग. मुसलमानों को चुन-चुनकर कारगिल में लड़ने के लिये (बल्कि मरने के लिये) भेजा गया. जैसा कि मैंने ऊपर स्थिति का वर्णन किया है, इस तरह की पृष्ठभूमि के चलते जहां एक घर में पच्चीस-तीस लोग रहते हों, जो लोग धार्मिक कट्टरता को ओढ़े और आधुनिक शिक्षा से दूर रहते हुये (चाहे वह मानसिकता के कारण हो अथवा गरीबी के कारण जिसके लिये थोक में बच्चे पैदा करना एक बडी वजह है), क्या वे लोग सरकारी-गैरसरकारी नौकरी पाने के योग्य हैं? और वे मुसलमान जिन्हें नौकरियां मिली हैं क्या इसी तरह की पृष्ठभूमि से आये हुये हैं, कदापि नहीं. लेकिन उनके द्वारा यह सब लिखने का मंतव्य क्या है, आसानी से समझा जा सकता है, यदि कोई समझना चाहे तो.

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