एक ही काम के लिये किसी को सम्मानित किया जाता है तो किसी के विरुद्ध एफआईआर

एक ही काम के लिये किसी को सम्मानित किया जाता है तो किसी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई जाती है. रुखसाना और विनय कटियार कुछ समानता या असमानता का अहसास हुआ या नहीं. मैं आपकी याद ताजा कराता हूं. जम्मू-कश्मीर की रुखसाना को एक आतंकवादी को मारने पर नकद इनाम दिया जा रहा है, सरकारी नौकरी देने की घोषणा भी की गयी है. विभिन्न सरकारी-गैर सरकारी संगठन अपने पास बुलाकर सम्मानित कर रहे हैं और अन्य लोगों से भी इसी प्रकार के वीरता पूर्ण कार्य करने का आवाहन कर रहे हैं, जो कि होना भी चाहिये. अब याद दिलाता हूं कि अब से कुछ वर्ष पहले विनय कटियार ने आतंकवादियों को मारने पर कुछ इनाम देने की घोषणा की थी और उस पर जम्मू-कश्मीर में बवाल हो गया. तत्कालीन मुख्यमन्त्री गुलाम नबी आजाद ने यह कहते हुये कि इससे पूरे जम्मू कश्मीर की कानून व्यवस्था पर खतरनाक प्रभाव पड़ेगा, विनय कटियार के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने के आदेश दे दिये.

क्या फर्क है उस समय और आज में. मात्र इतना कि आज गुलाम नबी आजाद मुख्यमन्त्री नहीं हैं, लेकिन केन्द्र में तो मन्त्री हैं, फिर आज ऐसा कहने वालों के विरुद्ध किसी प्रकार का न तो बयान दे रहे हैं और न ही किसी प्रकार की कार्रवाई करने के लिये कह रहे हैं. आतंकवादियों को मारा नहीं जायेगा तो क्या उन्हें दूध पिलाकर विमान हाईजैक कराने के लिये तैयार किया जायेगा. फर्क चश्मे का है, धर्म की राजनीति करने वाले खुद तो धर्म के आधार पर राजनीति करते हैं और उन्हें उपदेश की घुट्टी पिलाते हैं जो पहले से ही निरपेक्ष हैं. तमाम सनातनी नेता मजारों पर चादरपोशी करते दिखाई देते हैं और शान से फोटो खिंचवाते हैं लेकिन किसी मुसलमान नेता को कहीं मंदिर में जाकर आरती करते देखा है (अपवादों को छोड़ दें)? हर नेता जाति-धर्म-प्रान्त-भाषा की छुद्र राजनीति करता है जिसमें हर पार्टी शामिल है और जो सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करते हैं वे सबसे अधिक साम्प्रदायिक हैं. राजनीति अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच चुकी है, जहां पहली लाइन को बिगाड़कर ही छोटा किया जा सकता है न कि उससे बड़ी लाइन खींचकर.

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