कविता किताबों की जगह स्वर-बद्ध होकर सीडी में!
मेरे एक कवि मित्र हैं, काफी दिनों बाद उनसे मिलना हुआ. बात चलने लगी पत्र पत्रिकाओं की तरफ घटते हुये रुझान की और इंटरनेट तथा टेलिविजन द्वारा खत्म किये जा रहे समय की. जो समय लोग पढ़ने में बिताते थे, पत्र पत्रिकाओं और मां-बाप या बाबा-दादी के साथ बिताते थे वह समय अब टेलिविजन और इंटरनेट ने हड़प लिया है. इसी मुद्दे पर बात होने लगी, फिर मैंने बात उठाई किताबों के मंहगे होने की जिसमें अभी जिन्ना महोदय के ऊपर लिखी गई जसवंत सिंह साहब की किताब भी शामिल थी और मेजर जनरल वी के सिंह की भी किताब शामिल थी जिसके चलते उन्हें जेल तक जाना पड़ा. मेरा कहना था कि किताबों के दाम इतने अधिक रखे जाते हैं कि वह पुस्तक प्रेमी जो इन्हें पढ़ना चाहते हैं, मन मसोस कर रह जाते हैं क्योंकि एक किताब के पांच सौ से लेकर हजार रुपये चुकाना हर एक के बस की बात नहीं. उनका तर्क था कि किताबें के दाम कम रखे जाने से भी किताबों की बिक्री में बहुत अधिक वृद्धि नहीं होगी. अत: अधिक दाम होने से कुछ ही प्रिन्ट बिकने से लागत और लाभ निकल आते हैं.
इसके बाद एक सन्न करने वाली बात उन्होंने मुझे बताई. उन्होंने बताया कि अब कविताओं की किताबें नहीं छापी जाती न ही दिग्गजों को छोड़कर कोई किताब छापना पसन्द करता है न ही खरीदना. सिर्फ बड़े नाम ही बिकते हैं. ऐसे में अब इनकी सीडी प्रकाशित की जाती है. रचनाकार ने लिखा, फिर उसे अपनी या अन्य किसी की आवाज में रिकार्ड किया और सीडी बाजार में. कारण भी उन्होंने बता ही दिये थे, सीडी के बारे में लाभालाभ भी बताये. यह कि सीडी के साथ आपको पेज नहीं पलटने, आपको पढ़ने की जहमत नहीं उठानी, आपको यह भी सोचने की जहमत नहीं उठानी कि किस तरन्नुम में इस कविता या गजल को पढ़ना है उसके लिये कवि स्वयं मौजूद है. अगर आपको कोई रचना अच्छी न लगे तो बटन दबाइये और फारवर्ड कर दीजिये. कीमत पचास रुपये के अन्दर-अन्दर. मुझे नहीं पता कि यह चलन किस हद तक फैल चुका है, लेकिन मेरे विचार से जो किताब पढ़ने में एक लुत्फ है, एक आदर का भाव है, एक आत्मिक आनन्द है, एक सुरूर है, वह यहां नहीं है. एक किताब को धारण करने में जो गर्व है वह एक सीडी में तो कदापि नहीं हो सकता, एक नज्म को सुनकर आप उसका आनन्द तो बेशक उठा सकते हैं लेकिन पढ़कर जज्ब करने का जो मजा है वह इस सीडी में हरगिज नहीं हो सकता. ऐसा मेरा मानना है.
इसके बाद एक सन्न करने वाली बात उन्होंने मुझे बताई. उन्होंने बताया कि अब कविताओं की किताबें नहीं छापी जाती न ही दिग्गजों को छोड़कर कोई किताब छापना पसन्द करता है न ही खरीदना. सिर्फ बड़े नाम ही बिकते हैं. ऐसे में अब इनकी सीडी प्रकाशित की जाती है. रचनाकार ने लिखा, फिर उसे अपनी या अन्य किसी की आवाज में रिकार्ड किया और सीडी बाजार में. कारण भी उन्होंने बता ही दिये थे, सीडी के बारे में लाभालाभ भी बताये. यह कि सीडी के साथ आपको पेज नहीं पलटने, आपको पढ़ने की जहमत नहीं उठानी, आपको यह भी सोचने की जहमत नहीं उठानी कि किस तरन्नुम में इस कविता या गजल को पढ़ना है उसके लिये कवि स्वयं मौजूद है. अगर आपको कोई रचना अच्छी न लगे तो बटन दबाइये और फारवर्ड कर दीजिये. कीमत पचास रुपये के अन्दर-अन्दर. मुझे नहीं पता कि यह चलन किस हद तक फैल चुका है, लेकिन मेरे विचार से जो किताब पढ़ने में एक लुत्फ है, एक आदर का भाव है, एक आत्मिक आनन्द है, एक सुरूर है, वह यहां नहीं है. एक किताब को धारण करने में जो गर्व है वह एक सीडी में तो कदापि नहीं हो सकता, एक नज्म को सुनकर आप उसका आनन्द तो बेशक उठा सकते हैं लेकिन पढ़कर जज्ब करने का जो मजा है वह इस सीडी में हरगिज नहीं हो सकता. ऐसा मेरा मानना है.
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