रुचिका के मामले में चौटाला की बेशर्म सफाई

कुछ देर पहले बेशर्म सफाई देते हुये चौटाला को देखा जो रुचिका कांड के अपराधी और हरियाणा पुलिस के पूर्व महानिदेशक राठौर के विरुद्ध क्या क्या कदम उठाये, बता रहे थे। जब एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि आपने इसके विरुद्ध क्या कार्रवाई की तो चौटाला का जबाव था कि चार्जशीट होने पर निलम्बित कर दिया गया तथा चूंकि मामला अदालत में था और अदालत से उसे बेल मिल गयी थी लिहाजा उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई करना अदालत की अवमानना होती। चौटाला कह रहे थे कि विभागीय इन्क्वायरी के आदेश दिये और उसके बाद उसे निलम्बित कर दिया गया। उन्हें क्या यह नहीं पता कि निलम्बन कोई सजा नहीं होती और फिर उन्होंने यह भी नहीं बताया कि क्या विभागीय कार्रवाई की गयी. पुलिस पदक देने के लिये अनुशंसा के सवाल को यह कहकर टाल गये कि यह आईएएस आईपीएस अफसरों के प्रमोशन का मामला अलग से चलता है. पता नहीं किसे बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे थे चौटाला. किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिये आपराधिक कृत्य हेतु जो न्यायिक कार्रवाई होती है वह तो होती ही है, लेकिन इसके अतिरिक्त दोषी कर्मचारी को दंडित करने हेतु सरकार के पास विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के विकल्प खुले होते हैं जिसका अदालती कार्रवाई से कोई लेना देना नहीं होता. तथा जिसके अन्तर्गत प्रमोशन रोकने से लेकर बर्खास्तगी तक की कार्रवाई शामिल होती है और बाद में पेंशन तथा गेच्युटी इत्यादि भी बन्द की जा सकती थी. इसमें न केवल राजनीतिबाज बल्कि वरिष्ठ अधिकारी भी दोषी हैं जिन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया कुल मिलाकर इस मामले में चौटाला ने एक शातिर राजनीतिबाज की तरह पल्ला झाड़ लिया. बेहतर होता कि और नेताओं की तरह ही चौटाला भी चुपचाप ही रहते. उनके बोलने से राजनीतिबाजों और नेताओं का कुचक्र उजागर ही हुआ है छुपने की बजाये. राजनीतिबाज कोई भी हो, सब की कार्यप्रणाली एक ही जैसी है और सभी सम्वेंदन-शून्य हैं।

p.s.-अब मोमबत्तियां जलाने से काम नहीं चलेगा समय आ गया है मशाल जलाने का.

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