मोदी द्वारा उठाया गया एक अच्छा कदम जिसकी आलोचना होने लगी

पिछले दिनों गुजरात में चुनाव सुधार सम्बन्धी एक अच्छा निर्णय लिया गया। यह निर्णय गुजरात में होने वाले स्थानीय चुनावों के मद्दे-नजर एक बेहतरीन कदम है। इसके अनुसार स्थानीय चुनावों में मतदान को अनिवार्य कर दिया गया है। गुजरात में होने वाले स्थानीय चुनावों में अब प्रत्येक मतदाता को मतदान करना ही पड़ेगा तथा जो व्यक्ति मतदान से अनुपस्थित रहेंगे उनके लिए अपनी अनुपस्थिति का कोई ठोस कारण प्रमाणों के साथी प्रस्तुत करना पड़ेगा अन्यथा जानबूझ कर मतदान से अनुपस्थित रहने वाले मतदाताओं के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई भी की जा सकती है। इसके साथ ही "किसी को भी मत नहीं " का विकल्प भी गुजरात के स्थानीय चुनावों में मतदाताओं को दिया गया है। जैसा कि अपेक्षित था गुजरात कांग्रेस ने इस बिल का विरोध यह कहते हुए किया कि यह मोदी की तानाशाही है और लोकतंत्र में मतदान करना या न करना मतदाता का विशेषाधिकार है और संविधान में वर्णित कर्तव्यों में कहीं भी अनिवार्य मतदान के बारे में कोई प्रावधान नहीं किया गया है, लिहाजा यह संविधान से इतर है।

पता नहीं किस संविधान की बात कर रहे थे गुजरात कांग्रेस के प्रवक्ता, उस संविधान की जिसमें सबसे अधिक संशोधन कांग्रेस के कार्यकाल में ही किये गए हैं और इस हद तक किये गए हैं कि मूल संविधान की भावना में ही आमूल चूल परिवर्तन हो गया है। शायद उन्हें यह पता नहीं होगा कि शाह बानो को गुजारा भत्ता न देने के लिए संविधान की आत्मा को ही संविधान संशोधन के जरिये बदल दिया गया और उस समय उन्हीं की पार्टी की सत्ता थी और उन्हीं का प्रधानमंत्री था। और न जाने कितने ही ऐसे संविधान संशोधन सिर्फ और सिर्फ वोट प्राप्ति के लिए ही किये गए। क्या वह संशोधन अधिक लाभदायक थे और ऐसे संशोधनों ने देश का कितना भला किया, पता नहीं, लेकिन कांग्रेस ने अपने भले के लिए संविधान को औजार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

लेकिन मोदी की सरकार ने जो विधेयक प्रस्तुत किया और पारित कराया वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। यह कोई ढंकी छुपी बात नहीं है कि निम्न-मध्यम वर्ग के अधिकतर लोग मतदान के दिन घर से निकलना ही पसंद नहीं करते और इसे राष्ट्रीय अवकाश मानकर ऐश करते हैं। बिडम्बना है कि वे लोग जो अपने अधिकारों की दुहाई देते नहीं थकते वे अपने नुमाइंदों को चुनने के लिए अपना एक-डेढ़ घंटा भी नहीं दे सकते। और इसी का परिणाम है कि कुल मिलकर पचास-पचपन प्रतिशत से अधिक मतदान नहीं हो पता और इस पचास प्रतिशत का भी चौथाई और कभी कभी तो आठवां हिस्सा पाने वाला चुनाव जीत जाता है। इस विधेयक के पारित होने के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि गुजरात में बिना किसी कारण के मतदान से अनुपस्थित रहने वाने लोगों कि संख्या में कमी आएगी। और किसी भी चुनाव के लिए यह आवश्यक है कि अधिकतम संख्या में मतदाता अपने मत का प्रयोग करें अन्यथा मतदान की प्रक्रिया मात्र औपचारिकता बन कर रह जाती है और सही अर्थो में जनता के प्रतिनिधि का चुनाव नहीं हो पाता। जिस देश में लोग अपने प्रतिनिधि चुनने के प्रति इतने उदासीन हों, वहां मतदान के प्रतिशत को बढाने के लिए इस बाध्यकारी क़ानून के अलावा अन्य कोई रास्ता है भी नहीं।

वैसे यह संभावना तो बिलकुल भी नहीं है कि यूपीए सरकार इसके अच्छे पहलू को देखते हुए इसी प्रकार का कोई प्रस्ताव संसद में लाएगी। बाकी "किसी को मत नहीं", वापस बुलाने का विकल्प, महत्त्व-पूर्ण मुद्दों पर जनमत संग्रह, उम्मीदवारों को निश्चित समय हेतु अयोग्य करने का विकल्प, उम्मीदवारों के लिए कुछ न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तथा ईवीएम में मतों की संख्या का प्रत्याशी-वार विवरण का डिस्प्ले जैसी ईमानदार चीजें तो ख्वाब की बातें हैं। लेकिन फिर भी अच्छे सपने देखने में हर्ज तो नहीं। आखिर सपने दिखाकर ही तो चुनाव जीते जाते हैं और इस देश में हो भी क्या रहा है सपने दिखाने के अलावा।

चलते-चलते - झारखण्ड चुनाव के नतीजे सामने आ गये हैं. यह अपने आप में इस बात का सूचक है कि मोदी द्वारा उठाया गया कदम बिल्कुल ठीक है.

पुनश्च: प्रभात शुंगलू अपनी प्रतिबद्धताओं के चलते इसकी आलोचना कर चुके हैं और यह भी लिखते हैं कि विश्वासघाती नेताओं को सजा मिलनी चाहिए लेकिन इसका तरीका नहीं बता पाए।

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