उन्नीस सालों में भी पूरा इन्साफ नहीं मिल सका रुचिका को

रुचिका गिरोत्रा ने सन 1993 में एस पी एस राठौड़, तत्कालीन आई जी, हरियाणा के द्वारा प्रताड़ित होने के बाद आत्महत्या कर ली. इससे पहले 12 अगस्त, 1990 में रुचिका के शोषण का प्रयास एस पी एस राठौड़ द्वारा किया गया जिसके विरोध पर रुचिका के पूरे परिवार को प्रताड़ित किया गया, भाई के साथ मार-पीट की गयी, झूठे मामले बनाये गये. जानते हैं उस समय रुचिका की उम्र क्या थी? मात्र चौदह वर्ष. रुचिका एक टेनिस खिलाड़ी थी और आई जी साहब लान टेनिस असोसियेशन के अध्यक्ष. आई जी के रसूखों के चलते रुचिका के पिता को नौकरी से निकाल दिया गया. उसकी शिक्षा दीक्षा बन्द हो गयी. लब्बो-लुआब यह कि पूरे परिवार को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया इस पुलिस अफसर ने. जब पूरे परिवार को हर जगह, हर स्तर पर, हर मुमकिन नामुमकिन तरीके से प्रताडित किया जाने लगा तो अपने परिवार को इस प्रताड़ना से बचाने के लिये रुचिका ने आत्महत्या कर ली. सन 1997 में उच्च न्यायालय के दखल के बाद राठौड़ की नामजदगी हो सकी और फिर 1998 में मामला सीबीआई के हवाले कर दिया गया और फिर उसके बाद राठौड़ ने अपने रसूख का प्रयोग करते हुये मामले से बच निकलने की पुरजोर कोशिश की. और वह इसमें कामयाब भी रहा तथा हरियाणा के डीजीपी के पद तक जा पहुंचा. लेकिन भला हो रुचिका की मित्र आराधना गुप्ता का जिसने अपनी मृत सहेली को न्याय दिलाने के लिये दॄढ़ इच्छाशक्ति दिखाई और मामले को अंजाम तक पहुंचाया. इस महिला आराधना को भी प्रताड़ित करने और मामले से हटाने की भरपूर कोशिश की गयी, लेकिन आराधना टस से मस नहीं हुई. आराधना बाद में सिडनी, आस्ट्रेलिया में बस गयी, आराधना को इस मामले की पैरवी करने के लिये आस्ट्रेलिया से भारत के अनगिनत चक्कर लगाने पड़े. निचले स्तर पर ही फैसला होने में लग गये पूरे उन्नीस साल. और सजा भी कितनी मात्र छ: महीने और एक हजार रुपये जुर्माना. जो व्यक्ति अपराधी था जिसका सीधा सा अर्थ था कि यदि उस समय ही साल-दो साल में फैसला आ गया होता तो डीजीपी बनने के स्थान पर राठौड़ को जेल की सलाखें मिलतीं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. फैसला अब आया है जिसके विरुद्ध उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय जाने के रास्ते खुले हुये हैं और वहां भी इस मामले के अन्तिम निपटारा होने में कुछ वर्ष तो लग ही जायेंगे, ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या वास्तव में रुचिका के साथ न्याय हुआ है? इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि मामले को हल्का बनाने में भी राठौड़ ने अपने पद का भरपूर दुरुपयोग किया होगा जिससे कि उसके विरुद्ध रुचिका को आत्महत्या के लिये उकसाने के आरोप सिद्ध नहीं हो सके अन्यथा यह नहीं हो सकता कि खुदकुशी के लिये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उकसाने के आरोप सिद्ध होने पर मात्र छ: माह की कैद की सजा हो. मामले का उन्नीस साल खिंचना ही अपने आप में भारत की न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगाता है. अगर यही मामला कहीं विकसित देशों में रहा होता तो 1993 से अब तक सलाखों के ही पीछे होते राठौड़. आखिर क्यों हमारे देश में मामले इतने लम्बे खिंचते हैं या खींचे जाते हैं? क्या यह सोर्सफुल तथा रिसोर्सफुल व्यक्तियों द्वारा गरीबों मजलूमों को न्याय न मिलने देने की साजिश नहीं है?? क्या हम इसी व्यवस्था के दम पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र होने का दावा करते हैं??? क्या अब समय नहीं आ गया है कि न्यायिक प्रक्रिया और व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन किये जायें? क्या न्यायिक अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं होना चाहिये, न्याय पाने हेतु एक स्तर पर अधिकतम समय-सीमा क्योंकर तय न होना चाहिये तथा एक मुकदमे को निपटाने के लिये समय सीमा तथा एक न्यायिक अधिकारी के लिये साल में कुछ निम्नतम संख्या में निपटान करना अनिवार्य क्यों न होना चाहिये? यदि न्यायिक अधिकारियों की कमी है तो इसके लिये जनता जिम्मेदार नहीं है, इसके लिये सरकारें जिम्मेदार हैं जो सांसद-विधायक और शीर्ष अफसरों की सुविधाओं में कोई कमी नहीं छोड़ती जो घूम-फिर कर जनता के ही सिर पर पड़ता है लेकिन जनता के हितों के संरक्षण के लिये उनके पास तमाम बहाने मिल जाते हैं. बहरहाल जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनायेड से बचने के लिये सरकार को ही ईमानदारी से प्रयास करने होंगे. एक उदाहरण सामने है, वही अदालतें, वही अधिकारी, वही मामले और पिछले चार सालों में लगभग 38000 मामले बिहार में निपटा दिये गये. अन्तर सिर्फ ईमानदारी और इच्छा शक्ति का है. राठौड़ को कड़ी और उदाहरणीय सजा मिलनी चाहिये, क्योंकि आत्महत्या के पीछे राठौड़ द्वारा की गयी प्रताड़ना का ही हाथ था. न्यायपालिका को निर्णय हेतु धन्यवाद.

Comments