दिल्ली से गोरखपुर गरीबरथ से..

गोरखपुर जाना था. गोया तलाश की गयी कि कौन सी ट्रेन ठीक रहेगी. चंद ट्रेनों की खोज-खबर ली गयी. अन्तिम रूप से चयन किया गया अमृतसर-सहरसा गरीबरथ का. पूरी ट्रेन एअर-कण्डीशण्ड है. इसमें चेयरकार तथा एसी-थ्री टिअर कोच हैं. थ्री-टिअर में एक सीट रिजर्व कराई गयी. नियत दिन व समय पर यात्रा प्रारम्भ हुई. ट्रेन सही समय पर थी, इसलिये थोड़ी राहत महसूस हुई. अन्दर पहुंचने के बाद अपनी सीट पर विराजमान हुये. बाकी सब ठीक-ठाक ही था, लेकिन जो असल परेशानी थी, वह ट्रेन के अन्दर हुई. ट्रेन में कई परेशानियों से वास्ता पड़ता है. यदि आप सामान्य (अनारक्षित) बोगी में यात्रा कर रहे हैं, तो उसमें चढ़ना ही अपने आप में एवरेस्ट विजय के समान है. यहां तक कि सामान्य स्लीपर कोच में भी भीड़ घुसी रहती है. इस भीड़ में कुछ पुलिसवाले भी आपको मिलेंगे, जो अपनी वर्दी का फुल सदुपयोग कर आपको अपनी आरक्षित सीट पर बैठने का मौका देकर अहसान करते हैं. इन बोगियों में किन्नर भी मिल जायेंगे जो आपकी जेब को हल्का करने का नैतिक दायित्व पूरा करते हैं. रही बात टायलेट की, तो उसे आप खोल ही नहीं सकते. मैं भी कुछ अधिक जल्दी ही कर गया. खोलेंगे तो जब, जब वहां तक पहुंचने का माद्दा रख पायेंगे, जिसके लिये आपको सैकड़ों लोगों के सर पर अपना पैर रखते हुये टायलेट तक पहुंचने का एक और एवरेस्ट फतह करने का कार्य करना पड़ेगा. खैर, खोल आप इसलिये नहीं पायेंगे क्योंकि टायलेट के अन्दर भी आठ-दस लोग बैठे हुये मिलेंगे. इन लोगों की भी अपनी मजबूरियां और दुश्वारियां हैं, वरना कौन व्यक्ति इस तरह से यात्रा करना पसन्द करता है.

बात हो रही थी ट्रेन में होने वाली दुश्वारी की. कहते हैं कि किसी गृहिणी की सुरुचि और उसके घर की साफ-सफाई का अन्दाजा लगाना हो तो घर के बाथरूम से लगाया जा सकता है. अब सोलह-सत्रह घण्टे के इस घर में बाथरूम के प्रयोग की नौबत तो आनी ही थी. लेकिन यहां भी हाल. टोंटिया टूटी हुई. शीशे गायब. दुर्गन्ध से भरपूर. एक बाथरूम में अन्दर वाली टोंटी में पानी ही नहीं आ रहा था. दूसरे में फर्श बहुत गन्दा कर रखा था. दूसरी तरफ के वाश-बेसिन में टोंटी खोलते ही इतने प्रेशर से पानी आया कि छींटे चेहरे पर आ गिरे. इस गन्दगी को बढ़ाने में हमारे भाईलोग भी कोई कम महत्वपूर्ण योगदान नहीं देते. पान-तम्बाकू-गुटका खा कर पच्चीकारी-चित्रकारी तो करते ही हैं, साथ ही में वाश-बेसिन को भी रंगीन बनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते. किसी ने मुझे यह बताया था कि ट्रेनों में साफ-सफाई की जिम्मेदारी निजी हाथों में दे दी गई है. लेकिन स्थिति जस की तस है. न पहले ढ़ंग से साफ-सफाई होती थी, न अब. व्यवस्था चाहे निजी हाथों में, चाहे सरकारी, भारत में कोई भी चीज ठीक ढ़ंग से काम कर ही नहीं सकती. दर-असल यह हमारी संस्कृति बनकर खून में शामिल हो गई है. पहली चीज कि जिम्मेदारी तय होनी चाहिये और उस पर त्वरित कार्रवाई भी. दूसरा यह कि कार्रवाई मुंह देखकर न की जाये. लेकिन इसके लिये क्या व्यवस्था हो जब नियम बनाने वाला ही नियम तोड़े. सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान की मनाही हो चुकी है, जुर्माने का प्रावधान भी है. लखनऊ जंक्शन पर एक अधिकारी (संभवत: क्योंकि उनके साथ एक गनर था और वे एक बत्ती लगी गाड़ी से उतरे थे) पूरी तन्मयता से सिगरेट के कश खींच रहे थे. किसे अपनी कजा बुलानी थी, जो इन महोदय से सिगरेट पीने को मना करता.

एक बात और पता चली कि लखनऊ से चलने वाली कुछ ट्रेनों के डिब्बे बिक जाते हैं. मतलब पता चला कि पुलिस या जीआरपी के लोग इन डिब्बों में पहले ही कुछ लोगों को बिठा देते हैं और प्लेटफार्म पर गाड़ी आने पर उन्हीं लोगों को अन्दर घुसने देते हैं जो पैसे देते हैं. शिकायत करने पर कुछ होता नहीं क्योंकि पुलिस की शिकायत पुलिस से! लब्बो-लुआब यह कि बाथरूम की गन्दगी से लेकर डिब्बे बेचने तक और प्लेटफार्म पर खुल्लमखुल्ला सिगरेट के कश लेने से एक ही बात समझ में आती है कि भैये यहां कुछ नहीं हो सकता, यह सब ऐसे ही चलता रहेगा. आखिर हम एक महान देश के महान नागरिक हैं...

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