सूचना अधिकार को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार न्यायालय में. .

मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष के बारे में जानकारी को लेकर दायर सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को उक्त जानकारी उपलब्ध कराने के आदेश दिए, जिसके विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार उच्चतम न्यायालय में गई है प्रदेश सरकार ने दलील दी है कि इस सूचना को उपलब्ध कराने से निजता का हनन होगा यह बात समझ में आने वाली नहीं है कि इन सूचनाओं को प्रदान करने से कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा उच्च पदों पर बैठे तमाम शीर्ष नेता एवं अधिकारी वैसे ही इस अधिनियम से प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं तथा लगातार यह कोशिश की जा रही है कि किस प्रकार से अधिनियम को मोथरा किया जा सके सूचना का अधिकार अधिनियम लाकर यू० पी ए० सरकार ने एक अच्छा कदम उठाया था, लेकिन इस अधिनियम की धार को मोथरा करना इस अधिनियम का गला घोंटने जैसा होगा मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि इस अधिनियम के अंतर्गत सूचना देने के तमाम प्रयास क्यों किए जाते हैं इस बात को बेशक बताया जाए कि देश के किस सैनिक अड्डे पर कितने सैनिक पोस्ट हैं या कौन कौन से आयुध रखे हैं लेकिन इस बात को बताने में क्या हर्ज है कि किस रैंक के वेतन भत्तों पर कितना व्यय हो रहा है, कितनी राशि के आयुध ख़रीदे गए इस बात को बेशक मत बताइए कि किसी चिकित्सक के खाते में कितना धन है, लेकिन यह बताने में क्या हर्ज है कि उसने कितनी राशि पर आय-कर दिया क्या हमें यह जानने का अधिकार नहीं है कि जो रूपया हमने किसी सेवा या वस्तु को क्रय करने में व्यय किया, उस रुपये पर सम्बंधित कर सरकार को दिए गए या नहीं यह बताने में क्या तकलीफ हो सकती है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी ने कितना कार्य किया जिस कार्य के लिए उसे रखा गया है मेरा यह विनम्र निवेदन है कि सूचना के अधिकार अधिनियम की तरह ही सरकारी अधिकारियों के लिए निश्चित कार्य अधिनियम लाया जाए जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी प्रत्येक माह वह निश्चित कार्य कर सके जिसके लिए उसे वेतन दिया जा रहा है

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