एक वो भी दिवाली थी एक ये भी दिवाली है.
मैं बात कर रहा हूँ अस्सी-इक्यासी के आस पास की दीपावली की , जब मेरी उम्र लगभग सात साल हुआ करती थी, उस समय की जो धुंधली सी यादें मुझे अभी भी स्मृत हैं, उनमें मुझे याद है कि जहाँ मैं रहता था उस गाँव के तीन-चार घरों में ही बिजली हुआ करती थी, दो-तीन मंदिरों में भी बिजली का कनेक्शन हुआ करता था। दीपावली के दो - तीन दिन पहले प्राथमिक स्कूल बंद हो जाता था। गाँव में तीन-चार परचूनी की दुकानें थीं, जिनमें रोजमर्रा का सामान मिल जाया करता था, इन्हीं दुकानों में पटाखे, फुलझडी इत्यादि मिल जाया करती थीं। सबसे प्रिय चीज थी टीन का बना तमंचा, जिसमें एक लम्बी रील लगायी जाती थी जिस रील के अन्दर कागज़ की दो परतों के बीच में थोड़े से बारूद की एक टिकली होती थी जो ट्रिगर दबाने पर धमाके के साथ फूट जाया करती थी। मुर्गा छाप पटाखे, फुलझडी और कभी कभी कभार रॉकेट भी मिल जाया करते थे। घर पर खूब रौशनी होती लेकिन आज की तरह बिजली के बल्बों की नहीं बल्कि तेल के दीयों की, मोमबत्तियां भी जलाई जाती थीं, लेकिन थोडी सी। पटाखे जलाने के लिए पिताजी एक लम्बी सी लकड़ी के एक सिरे को थोड़ा सा चीर देते थे जिसमें पटाखों को दबाकर जलाया करते थे, थोड़ा बड़ा होने पर हाथ से जलाकर फेंकने लगे। थोड़ा और बड़े हुए तो पटाखे और ज्यादा बड़े हो गए और फिर अब तो पटाखों से दूरी ही अच्छी लगती हैं। कुछ फिरकियाँ भी आती थीं, जिन्हें घर के आँगन में चलाया जाता और जब फिरकी तेजी से नाचती हुई आती तो सब लोग पीछे की ओर खिसकने लगते थे। एक और बड़ा मशहूर आइटम था रेल का, रेल चलाने के लिए पूरा इंतजाम करना पड़ता, एक लम्बी डोरी ली जाती, रेल के बीच से निकाली जाती और उस डोरी को एक ओर घर के खंभे से बाँधा जाता और दूसरी ओर किसी अन्य चीज से, फिर इसमें आग लगायी जाती और फिर बड़ा मजा आता जब यह रेल आवाज करती हुई एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाती और वापस आती।
दीपावली के कई दिन पहले कंदील बनाने की कार्रवाई शुरू हो जाती, बांस की खपच्चियाँ, रंग बिरंगा कागज़ और पन्नी मोल आती। आटे की लेई घर पर बनाई जाती, कंदील का ढांचा खपच्चियों से तैयार किया जाता और फिर कागज़ और पन्नी काट कर इस ढाँचे पर चिपकाई जाती। फिर यह कंदील मकान के सड़क वाले हिस्से की ओर एक ऊँची सी जगह या लकड़ी पर टांगा जाता। लोग अलग अलग डिजाइनों के कंदील बनाते, मुझे हवाई जहाज की आकृति वाले कंदील विशेष आकर्षित करते थे। कई दिन पहले से कंदील टांग दिए जाते, रात में इन कंदीलों की छटा अलग ही दिखाई देती थी, जिन लोगों के यहाँ बिजली का कनेक्शन था उनके यहाँ बिजली के लाल-पीले बल्ब लटका दिए जाते थे, जो पूरे मकान को रोशन कर देते थे। मंदिरों में तो यह छटा और भी निराली होती थी। जहाँ मैं रहता था उसके पास एक मन्दिर था, जिसके प्रांगन में मैं खेलने जाया करता था और मेरे कुछ दोस्त भी होते थे (उनमें कुछ मुस्लिम भी थे, क्योंकि अभी तीन चार साल और बचे थे यह मालूम होने में कि कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान और हममें और इनमें क्या अन्तर है), इस मन्दिर की खूबसूरती भी देखते ही बनती थी।
मिठाई के नाम पर गुलाब-जामुन, जलेबी, मलाई के लड्डू और बेसन के लड्डू ही मिला करते थे, जो कि जब कभी इच्छा होती थी तो इतने भर ही आते थे कि घर पर सभी लोगों को एक-दो मिल जाया करते। बाकी विशेष तौर पर नहीं आया करते थे, दीपावली पर जो चीजें विशेष तौर पर आतीं वह थीं खीलें, बताशे और चीनी के बने हुए खिलौने तथा परमल। पूजा करने के बाद खूब सारी खीलें और चीनी के बने हुए खिलौने खाए जाते। उस समय (कहा जा सकता है कि गाँव में रहने के कारण) उपहार देने और लेने का प्रचलन नहीं था न ही उस समय संचार के माध्यम इतने अधिक थे कि फोन और मोबाइल के जरिये संदेश भेजे जाते। हालाँकि मुझे अभी भी यह सब अटपटा लगता है, मोबाइल के द्वारा संदेश भेजना और एक दूसरे को उपहार प्रदान करना तथा क्लबों में या अन्य जगहों पर जाकर पार्टियों में हिस्सा लेना। यद्यपि मैं पार्टियों में नहीं जाता और उपहार लेने देने के मामले में भी थोड़ा उदासीन रहता हूँ, लेकिन संदेश आने पर न चाहते हुए भी संदेश भेजना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि मैं कंजूस हूँ या फिर मैं अपने प्रियजनों के लिए शुभाकांक्षी नहीं हूँ, लेकिन मोबाइल पर संदेश लिखना फिर उसे रिले करना एक अजीब सा काम लगता है मुझे। अब पता नहीं यह बाजार का प्रभाव है या वास्तव में लोग अधिक हितचिन्तक हो गए हैं।
उस समय आर्थिक रूप से काफी तंगी होते हुए भी जो मजा आता था, वह आज तंगी न होने पर भी नहीं आता। उस समय लोग कम होते थे, सब एक दूसरे को जानते थे, एक दूसरे के दुःख-दर्द में भागीदार होते थे (कम से कम इकठ्ठा तो हो जाते थे), आज चारों तरफ लोग ही लोग हैं, कोई किसी को नहीं जानता, कोई किसी को जानना भी नहीं चाहता, एक न ख़त्म होने वाली दौड़ जारी है. शान्ति और संतोष का अभाव सा हो गया है। जो उल्लास उस समय आता था वह न जाने कहाँ खो गया है। पता नहीं वह आनंद कभी मिलेगा भी या नहीं, लेकिन जब कभी भी मन उदास होता है उन यादों में डूब जाता हूँ और फिर उन सुगन्धित यादों से अगाध आनंद मिलने लगता है।
सब देश वासियों को एक बार पुन: दीपावली पर शुभकामनाएं।
दीपावली के कई दिन पहले कंदील बनाने की कार्रवाई शुरू हो जाती, बांस की खपच्चियाँ, रंग बिरंगा कागज़ और पन्नी मोल आती। आटे की लेई घर पर बनाई जाती, कंदील का ढांचा खपच्चियों से तैयार किया जाता और फिर कागज़ और पन्नी काट कर इस ढाँचे पर चिपकाई जाती। फिर यह कंदील मकान के सड़क वाले हिस्से की ओर एक ऊँची सी जगह या लकड़ी पर टांगा जाता। लोग अलग अलग डिजाइनों के कंदील बनाते, मुझे हवाई जहाज की आकृति वाले कंदील विशेष आकर्षित करते थे। कई दिन पहले से कंदील टांग दिए जाते, रात में इन कंदीलों की छटा अलग ही दिखाई देती थी, जिन लोगों के यहाँ बिजली का कनेक्शन था उनके यहाँ बिजली के लाल-पीले बल्ब लटका दिए जाते थे, जो पूरे मकान को रोशन कर देते थे। मंदिरों में तो यह छटा और भी निराली होती थी। जहाँ मैं रहता था उसके पास एक मन्दिर था, जिसके प्रांगन में मैं खेलने जाया करता था और मेरे कुछ दोस्त भी होते थे (उनमें कुछ मुस्लिम भी थे, क्योंकि अभी तीन चार साल और बचे थे यह मालूम होने में कि कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान और हममें और इनमें क्या अन्तर है), इस मन्दिर की खूबसूरती भी देखते ही बनती थी।
मिठाई के नाम पर गुलाब-जामुन, जलेबी, मलाई के लड्डू और बेसन के लड्डू ही मिला करते थे, जो कि जब कभी इच्छा होती थी तो इतने भर ही आते थे कि घर पर सभी लोगों को एक-दो मिल जाया करते। बाकी विशेष तौर पर नहीं आया करते थे, दीपावली पर जो चीजें विशेष तौर पर आतीं वह थीं खीलें, बताशे और चीनी के बने हुए खिलौने तथा परमल। पूजा करने के बाद खूब सारी खीलें और चीनी के बने हुए खिलौने खाए जाते। उस समय (कहा जा सकता है कि गाँव में रहने के कारण) उपहार देने और लेने का प्रचलन नहीं था न ही उस समय संचार के माध्यम इतने अधिक थे कि फोन और मोबाइल के जरिये संदेश भेजे जाते। हालाँकि मुझे अभी भी यह सब अटपटा लगता है, मोबाइल के द्वारा संदेश भेजना और एक दूसरे को उपहार प्रदान करना तथा क्लबों में या अन्य जगहों पर जाकर पार्टियों में हिस्सा लेना। यद्यपि मैं पार्टियों में नहीं जाता और उपहार लेने देने के मामले में भी थोड़ा उदासीन रहता हूँ, लेकिन संदेश आने पर न चाहते हुए भी संदेश भेजना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि मैं कंजूस हूँ या फिर मैं अपने प्रियजनों के लिए शुभाकांक्षी नहीं हूँ, लेकिन मोबाइल पर संदेश लिखना फिर उसे रिले करना एक अजीब सा काम लगता है मुझे। अब पता नहीं यह बाजार का प्रभाव है या वास्तव में लोग अधिक हितचिन्तक हो गए हैं।
उस समय आर्थिक रूप से काफी तंगी होते हुए भी जो मजा आता था, वह आज तंगी न होने पर भी नहीं आता। उस समय लोग कम होते थे, सब एक दूसरे को जानते थे, एक दूसरे के दुःख-दर्द में भागीदार होते थे (कम से कम इकठ्ठा तो हो जाते थे), आज चारों तरफ लोग ही लोग हैं, कोई किसी को नहीं जानता, कोई किसी को जानना भी नहीं चाहता, एक न ख़त्म होने वाली दौड़ जारी है. शान्ति और संतोष का अभाव सा हो गया है। जो उल्लास उस समय आता था वह न जाने कहाँ खो गया है। पता नहीं वह आनंद कभी मिलेगा भी या नहीं, लेकिन जब कभी भी मन उदास होता है उन यादों में डूब जाता हूँ और फिर उन सुगन्धित यादों से अगाध आनंद मिलने लगता है।
सब देश वासियों को एक बार पुन: दीपावली पर शुभकामनाएं।
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