बिहार में बाढ़ और राष्ट्रीय शर्म
पिछले दिनों प्रधान मंत्री महोदय ने उड़ीसा की हिंसा को राष्ट्रीय शर्म घोषित किया। इस पर श्रीमान सुरेश चिपलूनकर जी ने काफी विस्तार में एक सुंदर लेख लिखा था। उसी कड़ी में कुछ और पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं, हो सकता है कि इनमें से कुछ चिपलूनकर जी के ब्लॉग में आ चुकी हों।
सबसे पहले तो बिहार की बाढ़ भी एक राष्ट्रीय शर्म है। आजादी के साठ साल बाद तक भी देश की नदियों को जोड़ा नहीं जा सका जिससे कि अनावृष्टि या अतिवृष्टि के समय दुर्भिक्ष या बाढ़ जैसी समस्याओं से निपटा जा सके। यह बड़ी राष्ट्रीय शर्म है कि नेपाल जैसा देश इस समय भी हमारे ऊपर आँखें तरेर रहा है और हम मूकदर्शक बने बैठे हैं। एक कड़ा जबाव देने की स्थिति में भी नहीं है हमारा देश।
सबसे पहले तो बिहार की बाढ़ भी एक राष्ट्रीय शर्म है। आजादी के साठ साल बाद तक भी देश की नदियों को जोड़ा नहीं जा सका जिससे कि अनावृष्टि या अतिवृष्टि के समय दुर्भिक्ष या बाढ़ जैसी समस्याओं से निपटा जा सके। यह बड़ी राष्ट्रीय शर्म है कि नेपाल जैसा देश इस समय भी हमारे ऊपर आँखें तरेर रहा है और हम मूकदर्शक बने बैठे हैं। एक कड़ा जबाव देने की स्थिति में भी नहीं है हमारा देश।
सरकार बचाने के लिए वोट फॉर नोट, वोट फॉर गद्दी। क्या यह राष्ट्रीय शर्म नही है।
१९८४ के दंगे राष्ट्रीय शर्म हैं, उसके बाद दोषियों को जिस तरह बचाया गया वह भी राष्ट्रीय शर्म है, दंगों के चौबीस वर्ष बाद भी दोषियों को सजा न दिला पाना क्या राष्ट्रीय शर्म में नहीं आता।
आज भी सर पर मैला ढोया जा रहा है, यह शर्म से डूब मरने की बात है, यह भी राष्ट्रीय शर्म है या नहीं।
आतंकवादियों को सजा न दिला पाना, उसके लिए कानून न बनाना, लोगों को मरते हुए देखते रहना, फांसी की सजा पाये आतंकवादी को राजनीतिक कारणों से सजा पर रोक लगाना, आतंकियों के प्रति नरम रवैया अपनाना और उनकी खुल्लमखुल्ला पैरवी करना राष्ट्रीय शर्म है या नहीं।
घोटालों के आरोपियों को मंत्री पद देना, उनके मुकदमों को वापस लेना, उनके लिए पैरवी करना और शह देना क्या राष्ट्रीय शर्म नहीं हैं।
जिस देश में करोड़ों टन अनाज पैदा होता हो, उस देश के किसान द्वारा आत्महत्या करना और लोगों का भूख से मरना भी राष्ट्रीय शर्म है।
छोटे-छोटे बच्चों द्वारा पेट पालने के लिए मजदूरी करना, आजादी के साठ साल बाद भी सबको शिक्षा न मिल पाना भी राष्ट्रीय शर्म है। चिकित्सा अभाव में लोगों का तड़प तड़प कर मर जाना क्या इस दायरे में नहीं आता।
लाखों मुक़दमे न्यायिक अधिकारियों तथा अदालतों की कमी के कारण लंबित हैं क्या यह राष्ट्रीय शर्म नहीं है।
हजारों क़ानून हैं इस देश में, लेकिन उनके शतांश कानूनों का पालन पूर्णतया तो छोड़िये आंशिक रूप से भी नहीं हो पाता यह भी राष्ट्रीय शर्म है।
एक बी क्लास शहर में एक छोटे से मकान की कीमत १२ से १५ लाख रुपये है जिसे खरीदना देश के ९० प्रतिशत लोगों के बस की बात नहीं हैं, क्या यह राष्ट्रीय शर्म में नहीं आता।
आजादी के साठ साल बाद भी सभी लोगों को शौचालय की तथा पीने के लिए साफ पानी उपलब्ध नहीं है क्या इसे भी राष्ट्रीय शर्म नहीं मानेंगे।
१९८४ के दंगे राष्ट्रीय शर्म हैं, उसके बाद दोषियों को जिस तरह बचाया गया वह भी राष्ट्रीय शर्म है, दंगों के चौबीस वर्ष बाद भी दोषियों को सजा न दिला पाना क्या राष्ट्रीय शर्म में नहीं आता।
आज भी सर पर मैला ढोया जा रहा है, यह शर्म से डूब मरने की बात है, यह भी राष्ट्रीय शर्म है या नहीं।
आतंकवादियों को सजा न दिला पाना, उसके लिए कानून न बनाना, लोगों को मरते हुए देखते रहना, फांसी की सजा पाये आतंकवादी को राजनीतिक कारणों से सजा पर रोक लगाना, आतंकियों के प्रति नरम रवैया अपनाना और उनकी खुल्लमखुल्ला पैरवी करना राष्ट्रीय शर्म है या नहीं।
घोटालों के आरोपियों को मंत्री पद देना, उनके मुकदमों को वापस लेना, उनके लिए पैरवी करना और शह देना क्या राष्ट्रीय शर्म नहीं हैं।
जिस देश में करोड़ों टन अनाज पैदा होता हो, उस देश के किसान द्वारा आत्महत्या करना और लोगों का भूख से मरना भी राष्ट्रीय शर्म है।
छोटे-छोटे बच्चों द्वारा पेट पालने के लिए मजदूरी करना, आजादी के साठ साल बाद भी सबको शिक्षा न मिल पाना भी राष्ट्रीय शर्म है। चिकित्सा अभाव में लोगों का तड़प तड़प कर मर जाना क्या इस दायरे में नहीं आता।
लाखों मुक़दमे न्यायिक अधिकारियों तथा अदालतों की कमी के कारण लंबित हैं क्या यह राष्ट्रीय शर्म नहीं है।
हजारों क़ानून हैं इस देश में, लेकिन उनके शतांश कानूनों का पालन पूर्णतया तो छोड़िये आंशिक रूप से भी नहीं हो पाता यह भी राष्ट्रीय शर्म है।
एक बी क्लास शहर में एक छोटे से मकान की कीमत १२ से १५ लाख रुपये है जिसे खरीदना देश के ९० प्रतिशत लोगों के बस की बात नहीं हैं, क्या यह राष्ट्रीय शर्म में नहीं आता।
आजादी के साठ साल बाद भी सभी लोगों को शौचालय की तथा पीने के लिए साफ पानी उपलब्ध नहीं है क्या इसे भी राष्ट्रीय शर्म नहीं मानेंगे।
एक बड़ी शर्म जो छूट गई थी (संजय जी का धन्यवाद) कि लाखों विदेशी घुसपैठियों को सिर्फ़ वोट बटोरने के कारण नागरिकता प्रदान करने का मंत्री जी का आवाहन भी भीषण राष्ट्रीय शर्म है और ऐसे लोगों को मंत्रिमंडल में रखना भी इस दायरे में आता है।
शर्म तो बहुत हैं लेकिन राजनीतिक व्यक्ति शर्म-प्रूफ़ हो चुके हैं, उनकी आंखों के लेंस से यह सब नजर नहीं आता। मैं आवाहन करता हूँ समस्त भारतीयों का कि इनके मोतिआबिंद की सर्जरी कर दें।
एक मंत्री द्वारा विदेशी घूसपेठियों को नागरिकता देने की माँग...राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?
ReplyDeleteसुबह से शाम तक काम करके रात को बीवी बच्चों को खाना ना देकर शराब पीना क्या ये भी राष्ट्रीय शर्म है या नहीं। जो राष्ट्र से जुडा है वो राष्ट्रयी शर्म है। लोग काम नहीं करते निकम्मों की तरह सरकारी दफ्तर, अस्पताल, एक ड़ॉक्टर ने बिहार का रुख नहीं किया क्या ये भी है राष्ट्रीय शर्म है। हर बात राष्ट्रीय शर्म नहीं होती।
ReplyDeleteवाकई श्रीमान अपने बिल्कुल ठीक कहा. हमारे नेता सचमुच शर्मप्रूफ़ हो चुके है. अरे इन्हे तो चौराहे पर खड़ा करके मारना चाहिए, पर क्या करें गलती हमारी ही है. हम ही सब कुछ जानते बुझते हुए भी ऐसे नेताओं का चुनाव कर सत्ता के गलियारे तक पहुचाते है, ताकि वो अपनी मनमानी कर सके. श्रीमान एक आग्रह है कि ट्रांसलिटरेशन को कृपया अपने ब्लॉग पर लगाने की विधि बताने की कृपा करें.
ReplyDeleteये सारे तो राष्ट्रीय बेशर्मी के उदाहरण हैं.
ReplyDeleteश्रीमान मेरा ईमेल आईडी ये है - prashantwaspp2127@gmail.com, mr.pacific07@gmail.com, इस पर मेरा मार्गदर्शन करें.
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