वारेन एंडरसन को कैसे नहीं छोड़ा जाता-अर्जुन सिंह के ट्रस्ट को भी भवन निर्माण के लिये यूनियन कार्बाइड ने डेढ़ लाख दिये.

वारेन एंडरसन को पकड़ा गया, फिर डी०एम०-एस०पी० के पास मुख्य सचिव का निर्देश आता है कि उसे छोड़ दिया जाये. जो पुलिस किसी आम आदमी को शनिवार को गिरफ्तार करती है और थाने से जमानत होने लायक जुर्म में भी जमानत नहीं देती जिससे कि वह आदमी दो दिन हवालात में बिता सके, वही प्रशासन और पुलिस वारेन एंडरसन के लिये जमानती तैयार करते हैं और ठाठ से सरकारी हवाईजहाज में दिल्ली रवाना कर दिया जाता है.

३०४(२) की जगह ३०४(ए) कराने के लिये मामले को चुनौती दी जाती है, और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश इसे स्वीकार कर ३०४(ए) में मामला चलाने की स्वीकृति दे देते हैं.

अभी अभी पता चला है कि अर्जुन सिंह के चुरहट ट्रस्ट को भवन निर्माण हेतु यूनियन कार्बाइड ने डेढ़ लाख रुपया चन्दा दिया था जो निश्चित रूप से चौरासी से पहले दिया होगा और उस समय यह रकम आज के कई करोड़ रुपये के बराबर होगी. वारेन एंडरसन की शाही रवानगी से आश्चर्य नहीं होना चाहिये.

सब के सब दोषी हैं. सरकारें (जिसमें पुलिस और प्रशासनिक अफसर तथा प्रासीक्यूशन करने वाले लोग शामिल हैं), राजनीतिबाज और धीमी न्यायिक प्रक्रिया. अफसर इसलिये कि एक छोटा अफसर सही काम करता है, उसे ऊपर वाला करने नहीं देता, यदि वह सही करता है तो उससे ऊपर वाला नहीं करने देता क्योंकि राजनीतिबाज सही काम नहीं चाहता. यह सही है कि एक पुलिस या प्रशासनिक अफसर के स्थान पर दूसरा भी उसी रैंक का आयेगा लेकिन किस अधिकारी को तनख्वाह के अलावा ऊपरी आमदनी बुरी लगती है, किस को भव्य मकान (एक से अधिक), असीमित धन बुरा लगता है. सही काम करने वाले दस तो गलत करने वाले नब्बे उसका स्थान लेने को तैयार हैं. नेता तो जनता को बेच भी सकते हैं यदि उनके स्वार्थ पूरे होते हों तो. जनता को इसीलिये अशिक्षित रखा गया और इसीलिये अनिवार्य मतदान की व्यवस्था नहीं बनाई गयी, जो एक अच्छे लोकतन्त्र की बुनियादी शर्त थी. व्यवस्था वह अपनाई और बनाई गयी जिसमें छ्ल-कपट, घूसखोरी की पूरी सम्भावना हो. न्यायिक प्रक्रिया में किसी जज को न्यूनतम मुकदमों का फैसला करने का लक्ष्य नहीं दिया गया. अदालतें और जज कम थे तो उन्हें बढ़ाया नहीं गया. मतलब यह कि राजनीतिबाजों ने वही व्यवस्था रखी जिससे उनके लिये लाभ हो. आम आदमी के तो नाम में ही आम जुड़ा है अर्थात वह है ही चूसा जाने के लिये, उसे चूसो और गुठलियां बच जायें तो उनके भी दाम वसूल लो. अब तो जागो मेरे आम...

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