क्या देश के मुसलमान सिखों से सबक नहीं ले सकते?
दो दिन पहले मैंने एक पोस्ट में लिखा था कि क्या सारे मुसलमान आतंकवादी हैं. इसी परिप्रेक्ष्य में मैं एक सवाल उठाता हूं "क्या देश के मुसलमान सिखों से सबक नहीं ले सकते?". आप लोग पंजाब में पनपे आतंकवाद से परिचित होंगे. अस्सी के दशक में पंजाब में आतंकवादियों ने निर्दोषों की हत्याओं, बम विस्फोटों से पूरे भारत को दहलाकर रख दिया था. कुछ को छोड़ दिया जाये तो सिखों का बहुमत इन आतंकवादियों के विरोध में था. सिखों के बहुमत ने कभी भी इन आतंकवादियों को अपने धर्म का होने के बावजूद न तो स्वीकार किया और न ही समर्थन दिया. अपनी जान गंवाकर इनके सामने डटे रहे. और शायद इसी कारण राजनीतिबाज भी सिख-धर्म और आतंकवादियों को जोड़कर दिखाने में कामयाब नहीं हो पाये. सिखों के धार्मिक नेता भी इस आतंकवाद के विरोध में मजबूती से आ खड़े हुये. नतीजा यह कि पंजाब में उत्पन्न हुआ आतंकवाद खत्म हो गया. मुस्लिमों के साथ स्थिति ऐसी नहीं है. मैं अधिक न लिखकर केवल यह पूछना चाहता हूं कि क्या देश के मुसलमान सिखों से सबक नहीं ले सकते और यदि नहीं तो क्यों?
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