ढ़ेर सारी बातें..--- संस्कृत की किताब, तिवारी जी का डीएनए,टेस्ट, मोइली साहब का बयान, एम पी बेचारे, नया न्यूजपेपर और ज्ञानदत्त जी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक स्कूल में पढ़ाई जा रही संस्कृत की किसी पुस्तक में जातिसूचक शब्द मिल गया. बवाल हो गया. जैसा कि होता है स्कूल, पुस्तक विक्रेता पर छापे मारे गये. लेखक, प्रकाशक, स्कूल प्रबंधन और शिक्षक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ. हम जाति प्रमाण पत्र बनवाने जाते हैं, कालम भरते हैं. अभी जाति गणना होगी, जाति बतायेंगे. आरक्षण और दूसरी सुविधायें उठाने हेतु विभिन्न प्रपत्रों में जाति का कालम भरेंगे. लेकिन किसी किताब में किसी संदर्भ में हमें यह मंजूर नहीं. 

एक और किस्सा या़द आ रहा है "आजा नच ले" फिल्म का, जिस के गाने से कोई शब्द हटाया गया कि वह भी जातिसूचक है. पता नहीं हम जाति को तोड़ने के लिये आगे बढ़ रहे हैं या इस खाई को और मजबूत करने के लिये कुदाल लेकर आगे बढ़ रहे हैं.

इससे पहले भी मुरादाबाद के किसी कस्बे में हजरत साहब के बारे में कोई शब्द अंग्रेजी की किसी किताब में लिखा था जो मुस्लिमों को नागवार गुजरा. एक बार फिर वही हुआ जो ऊपर लिखा हुआ है. अन्तर इतना था कि मुस्लिमों ने जाम लगाया, हंगामा किया और पुतला फूंका.

तिवारी जी अपना डीएनए टेस्ट कराने को तैयार नहीं हैं. दाढ़ी में तिनके वाली बात किसी ने कह दी. मुझे भी समझ नहीं आया. डीएनए टेस्ट से तो रोहित शेखर का झूठ बिल्कुल सामने आ जायेगा, अन्यथा ...... तिवारी जी को यह परीक्षण कराना चाहिये, नैतिकता तो यही कहती है.

जज साधारण सरकारी कर्मी नहीं, उन्हें हटाने के लिये महाभियोग ही सही, जजों की नियुक्ति प्रणाली ठीक नहीं. गाजियाबाद पीएफ घोटाले में कोई जज शामिल नहीं, मुख्य न्यायाधीश कार्यालय को सूचना अधिकार अधिनियम से बाहर रखना ठीक - यह कहना है उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्रीमान के०जी०बालाकृष्णन का.

देश का हर एक सरकारी या स्वायत्त निकाय का कर्मचारी/अधिकारी भारत के लोगों के करों पर ही निर्भर है. ऐसे में उसे और अधिक अकाउंटेबिल बनाया जाना चाहिये और सूचना अधिकार अधिनियम को मोथरा करने के स्थान पर और अधिक धारदार बनाया जाना श्रेयस्कर होगा.

मोइली साहब कह रहे हैं कि ’कसाब यदि फैसले को चुनौती देता है तो इसे तेजी से निपटाया जायेगा. उसने क्रूर कृत्य अंजाम दिया है और साल भर के भीतर फांसी पर लटका दिया जायेगा’. अच्छी बात है. लेकिन एक सांसद विदेशी सिद्ध हो चुका है. दो विधायकों के बारे में पकड़े गये आतंकवादियों ने बताया कि उन लोगों ने लाखों रुपये देकर मदद की. इन देशद्रोहियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गयी. दूसरा यह कि फांसी क्रूर कृत्य वह भी दुर्लभ से भी दुर्लभतम मामले में दी जाती है. तो बाकी जो लाइन में हैं उनके बारे में निर्णय क्यों नहीं लिया जा रहा है. वे अपराधी जिनके गुनहगार हैं क्या उनके सीने में दिल नहीं है.

राजीव शुक्ला जी बड़े व्यथित हैं कि चुनने वाले दिन से ही पेंशन के हकदार होने वाले सांसद, काम करें या न करें, चाहें तो सदन में सो जायें, कम वेतन भत्ते पा रहे हैं. लालू जी भी बेहद चिंतित हैं. तकरीबन चार साल पहले के आंकड़ों पर गौर करें तो एक सांसद के वेतन भत्तों का कुल योग लगभग तीन लाख रुपये प्रतिमाह या पैंतीस लाख रुपये प्रतिवर्ष हो रहा था. अब कई भत्ते बढ़ चुके हैं तो आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं. चलिये तैयार रहिये एक दो नये टैक्स झेलने के लिये.

एक अखबार पढ़ा. पढ़कर अजीब सा लगा. हिन्दी के अखबार में आधे शब्द अंग्रेजी के. कमाल है, ऐसी अजीब सी भाषा. मुझे उबकाई सी आ गयी. यह माना जा सकता है कि अंग्रेजी, अरबी, फारसी के कुछ शब्दों का समावेश और प्रयोग अटपटा नहीं लगता, और कुछ शब्द तो मानो हिन्दी के ही लिये बने हों. लेकिन हिन्दी के हर दो शब्दों के बाद एक अंग्रेजी शब्द. ऊपर से "आज के य़ूथ का न्यूजपेपर". "आज हमें अपने लोकल रिपोर्टर से पता चला कि सिटी के बिजी एरिया सिविल लाइंस में एक बाइकर ने एक स्कूल गोइंग स्टूडेन्ट को रैश ड्राइविंग से हिट कर दिया जिसके कारण स्टूडेन्ट के हेड इन्जरी हो गयी है". इस भाषा को पढ़कर लगा कि वास्तव में हिन्दी का भविष्य खतरे में है.

ज्ञानदत्त जी ने एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने प्रश्न उठाया कि श्रीमान समीर लाल जी और अनूप शुक्ला जी में से बेहतर ब्लागर कौन. इसके अलावा अपने नजरिये से गुण-दोष भी लिखे. दो दिन पहले तक न ही समीर जी और न ही शुक्ल जी ने इस मुद्दे पर अपनी तरफ से कोई पोस्ट लिखी. सुकुल जी अब लिख चुके हैं और समीर जी ने भी एक पोस्ट लिखकर अपनी भावनायें व्यक्त कर दी हैं. इससे पहले समीर जी जहां भी टिप्पणी कर रहे थे वहां वे अवश्य लिख रहे हैं कि ब्लागर्स विवादों से दूर रहें. अब ज्ञानदत्त जी ने ऐसा क्यों लिखा, उनकी मंशा क्या थी, मुझे नहीं पता. लेकिन मुझे सबसे अधिक जो बात व्यथित कर रही है वह यह है कि इन दोनों महानुभावों के प्रशंसक अलग-अलग नाम और आईडी बनाकर तथा छद्म नामों से एक दूसरे की न सिर्फ टांग खिंचाई कर रहे हैं बल्कि अभद्र तथा अशालीन भाषा के प्रयोग पर भी उतर आये हैं. अपने अपने इष्टों का समर्थन करना समझ में आता है लेकिन इस कदर अशालीन भाषा और गाली-गलौच. इससे पहले भी रैंकिंग और टिप्पणियों को लेकर तथा गुटबाजी को लेकर भारी हंगामा हो चुका है. लेकिन क्या इससे कोई फर्क पड़ता है सिवाय इसके कि हिन्दी ब्लागर्स की गरिमा ही धूल-धूसरित ही होगी. कुछ ब्लाग्स और ब्लागर्स ने हिन्दुओं को गरियाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, अर्थ का अनर्थ कर नीचा दिखाने का मौका नहीं छोड़ा. पता नहीं कैसी कैसी मानसिकता आ गयी है लोगों के अन्दर. कई दफा मुझे भी लगा कि लिखना और पढ़ना दोनों ही बन्द कर दूं लेकिन फिर मैंने सोचा कि मैं ऐसा क्यों करूं. जिसे मेरा लिखा हुआ अच्छा न लगे उसे हक है कि वह मेरे लिखे हुये के बारे में अपनी राय प्रकट करे और जिसे अच्छा लगे तो और भी अच्छा. और पढ़ना बन्द करने में भी हानि थी कि मैं बहुत सारी जानकारियों से, लेखों से, कविताओं से और भी बहुत सारी चीजों से महरूम रह जाता, लिहाजा दोनों चीजें ही जारी रखीं. अन्तत: मैं सभी लोगों से यही अपील करूंगा कि आलोचना करें, तर्क-वितर्क भी करें और वाद-विवाद से भी रिश्ता न तोड़ें लेकिन शालीन रहें.

अभी दो चित्र मेरे सामने से गुजरे. एक में मनिन्दर जीत सिंह बिट्टा एक स्त्री को सम्मानित कर रहे थे, जिसके पति नक्सली हमले में शहीद हुये. स्त्री मुस्लिम थी. चित्र देखिये.
दूसरी तस्वीर थी पटना में महिला स्वाबलंबन यात्रा की. जिसमें ऊपर से नीचे तक बुरके में बन्द महिलायें अपनी उंगलियों से वी बना रही थीं. यह कैसा स्वावलम्बन है जो महिलाओं को ऊपर से नीचे तक एक खोल में बन्द रखता है और उससे निकलने ही नहीं देता. अधिक कुछ कहना ठीक नहीं, तस्वीर खुद बयां कर रही है.



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