काश मैं एक बार फिर तुमसे मिल सकूं!
यही कोई दो महीने पहले मेरे घर अंगूर की लताओं में एक बुलबुल ने अपना रैन बसेरा बनाया. पहले एक तिनका लाई जो मालूम भी नहीं चला, और छ:सात दिन की मेहनत ने रंग दिखाया - बुलबुल का घोंसला तैयार हो गया. जाने कहां-कहां से धागे लाई और कहां-कहां से तिनके! खैर प्रारम्भ में ध्यान नहीं दिया, लेकिन थोड़े दिन बाद ही उसके चहचहाने की आवाजें अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने लगीं. लू चल रही हो या कड़ी धूप हो, आंधी हो या बरसात, वह अपने डैने फैलाकर घोंसले में बैठी रहती. जब हल्की हवा चलती तो झूले की तरह घोंसला भी आगे पीछे होता और ऐसा लगता जैसे कि कोई छोटा बच्चा झूले में बैठकर आनन्द उठा रहा हो.
एक दिन पाया कि वह बुलबुल अपनी चोंच में खाने की चीजें लेकर आने लगी है और घोंसले में ले जाती है अर्थात उसके घर में बच्चों का शुभागमन हो गया है. अब वह चीजें लाती और घोंसले में बैठे अपने नवजात शिशुओं के लिये खिलाती. इस समय तक केवल अंदाजा मात्र था क्योंकि घोंसला ऊंचाई पर था और बच्चे छोटे थे, इसलिये यह पता ही नहीं चलता था कि कितने बच्चे हैं. पन्द्रह दिन पहले एक चूजे का सिर दिखाई दिया. बहुत खुशी हुई उस नये सदस्य को देखकर. फिर तीन-चार दिन बाद एक-एक कर गिनती की तो पता चला कि तीन बच्चे हैं उस बुलबुल के.
एक चीज पर और ध्यान गया वह यह कि श्रीमती बुलबुल के साथ अब श्रीमान बुलबुल के भी दर्शन हो रहे थे. दोनों आते और अपने बच्चों को शाकाहारी-मांसाहारी भोजन खिलाते. हम सभी लोगों का रुटीन बन गया था सुबह शाम उस बुलबुल और बच्चों को देखना. पिताजी और माताजी दोनों पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि खबरदार उस घोंसले या बच्चों को हाथ न लगाना वरना हो सकता है कि बुलबुल उन्हें छोड़कर चली जाये. विगत सत्तरह अप्रैल को मेरी धर्मपत्नी (एक मजेदार प्रश्न यह किसी ने पूछा था कि धर्मबहन मतलब किसी को अपनी बहन बना लो, धर्मभाई-कोई लड़की किसी लड़के को अपना भाई बना ले, लेकिन धर्मपत्नी??) ने पाया कि भरी दोपहर में बुलबुल नीचे बैठी हुई है और इस बात को तकरीबन दस मिनट हो गये.
फिर उन्होंने गौर किया तो पाया कि एक चूजा नीचे गिरा हुआ था, दिन के तीन बजे चिलचिलाती धूप में रेत सुलग रहा था. उन्होंने मुझे बुलाया, मैं, पिताजी, उनकी बहन जी और उनकी बहन जी के पतिदेव श्रीमान सौरभ, सब लोग एकत्र हो गये. घोंसला काफी टेढ़ा हो गया था. लिहाजा छोटू मियां नीचे. पहले छोटू मियां को उठाने की कोशिश की तो सौरभ के ऊपर मिस्टर और मिसेज बुलबुल ने हमला कर दिया. लड़ाकू विमानों की तरह गोता मारकर नीचे आये और सर पर चोंच से प्रहार करने की कोशिश की. पिताजी ने कहा कि हाथ से पकड़ने की जगह एक मुड़े हुये गत्ते से हल्के हाथों से दबाकर घोंसले में पलट दो. लेकिन जल्दी को देखते हुये उसे गत्ते पर चढ़ाया गया. फिर एक बड़े से बाक्स में नीचे कपड़ा बिछाकर उसे बिठा दिया गया.
अब श्रीमती और श्रीमान बुलबुल का भरोसा जग गया था. थोड़ी दूर बैठकर इस रेस्क्यू आपरेशन को देख रहे थे. हमारी साली साहिबा ने उसे उंगली से पानी पिलाया. श्रीमती जी आटे की गोली बनाकर लाई जो उस आधुनिक युग के पंछी को पसन्द नहीं आईं. फिर उसे फिफ्टी-फिफ्टी दिया गया. जो उसने खा लिया. अब बारी थी उसे घोंसले में पहुंचाने की, सौरभ कुर्सी पर चढ़े और छोटू मियां को पलट दिया अन्दर. घोंसला अभी भी टेढ़ा था लिहाजा एक डंडी लगाकर सीधा किया गया. डंडी के एक छोर को यूंही फंसा दिया गया और दूसरे को बांध दिया गया. थोड़ी देर बाद छोटू मियां के मम्मी डैडी आये और बच्चे के लिये खूब चीजें लेकर आये. इसके बाद उन में से एक हमेशा बच्चों के ऊपर पंख फुलाकर बैठे हुये पाया गया.
शाम को आंधी की सम्भावना लग रही थी, मन बेचैन हो उठा. तय हुआ कि रात में एक-दो बार उठकर देख लेंगे. रात ठीक गुजर गयी. आज बीस तारीख को सौरभ को भी जाना था, उन्हें स्टेशन पहुंचा दिया. सुबह ही वह बच्चे अपने पंख फुला रहे थे श्रीमती बुलबुल के सुपरविजन में. आवाजें खूब आ रही थीं, सुनकर अच्छा लग रहा था. स्टेशन से वापस आये तो पाया कि बुलबुल घोंसले में आराम फरमा रही थी और बच्चे एक डाल पर बैठे हुये थे. दो बजे मैं काम से गया और छ: बजे वापस आया तो घोंसला खाली. पता चला कि बुलबुल अपने बच्चों को लेकर फुर्र............. आज ही सौरभ, उनकी पत्नी और बच्चे के साथ अपने घर वापस और आज ही बुलबुल! अजब संयोग! बहुत देर तक खाली घोंसला देखता रहा. पिताजी ने कहा "बेटा अब उसने अपने बच्चों को उड़ना सिखा दिया है, अब उसका ठिकाना यहां नहीं रहा, कहीं और नया घर खोज चुकी होगी"..
बहुत बुरा लगा उसका यूं जाना. अभी भी लग रहा है, एक खालीपन का अहसास. गला कई बार रुंध चुका है. पता नहीं कौन सा रिश्ता जुड़ गया था उससे. एक बार तो आ जाओ प्लीज, एक बार तो विद फैमिली दर्शन दे दो ना.. आज एक फोटो लेना चाहता था लेकिन वह मौका भी नहीं मिल सका. समय वाकई मुठ्ठी में बंद रेत की तरह है...
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