सुनहरे गेहूं, नीलगाय और काला धुंआ....
खेतों में लहलहाते गेहूं की फसल सुबह-सुबह ऐसे लग रही थी जैसे कि खेतों में सोना उग आया हो.. ऐसे ही थोड़े न धरती को रत्नगर्भा कहा गया है... हमारी शस्यश्यामला भूमि.. इस सोने जैसी फसल को काटता हुआ हमारा अन्नदाता. इसकी हालत सुधारने के वादे और दावे तो खूब किये जाते हैं लेकिन नतीजा वही रहता है ढ़ाक के तीन पात. गल्ले की सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार खत्म करने की खूब कसमें खाई जाती हैं लेकिन यह रवायत कसम खाने और बयान देने तक ही सीमित रहती है.
इसके बाद दूसरी तरफ देखा तो नीलगायों का एक झुंड दिखाई दिया. दूर से हिरन की तरह दिखाई देता है यह जानवर खाता कम है लेकिन नुकसान अधिक करता है.. लेकिन किया भी क्या जाये लाखों एकड़ जंगल मटियामेट कर दिये गये अब यह बेचारे जानवर जायें भी तो कहां जायें...
कल कुछ और फोटो आपकी खिदमत में पेश किये जायेंगे...काले धुंये के फोटो कल ...
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