हरियाणा में एसटीएफ भंग

पिछली कई पोस्ट में मैंने पुलिस कर्मियों के भ्रष्टाचार के ऊपर और अपराधीकरण के बारे में लिखा था. भारतीय पुलिस के लिये जस्टिस श्रीमन ए०एन०मुल्ला ’संगठित अपराधियों के गिरोह’ के रूप में संबोधित किया था. लगभग हर रोज कहीं न कहीं से पुलिस कर्मियों द्वारा किये जा रहे अपराधों के बारे में खबर सुनने को मिल ही जाती है. यह तो वे वारदातें हैं जो हाईलाईट हो जाती हैं, इनसे हजारों गुना ऐसी वारदातें होती हैं जो सामने आती ही नहीं. एक चैनल पर एंकर एक आईपीएस अफसर से हरियाणा में एसटीएफ की कारगुजारियों के बारे में बात कर रही थी. हरियाणा में एसटीएफ को एक ज्वैलर से वसूली के सिलसिले में भंग कर दिया. यह वसूली की कार्रवाई सीसीटीवी में रिकार्ड हो गयी. ज्वैलर अपनी जान की सलामती की गुहार लगाता दिखाई दिया. आईपीएस अफसर लगातार यह सिद्ध करने में लगी थीं कि जनता को पुलिस में भरोसा दिखाना चाहिये और सब एक जैसे नहीं होते. पता नहीं वह कौन सा पैमाना होता है जिससे आम जनता यह जान सकती है कि कौन सा पुलिसवाला सही पुलिसवाला है और कौन सा गलत. वह यह भी कह रही थीं कि ऊपर भी अफसर बैठे हुये हैं लोगों को उनसे राब्ता कायम करना चाहिये. मैं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि किस अधिकारी को हर चौराहे पर चौथ वसूली का पता नहीं होता और किस अफसर के कार्यकाल में यह नहीं होता. बस प्रतिशतता कम या बढ़ जाती है. ऐसा भी नहीं है कि मात्र वेतन पर गुजारा करने वाले अधिकारी-कर्मचारी नहीं हैं, लेकिन नगण्य और फिर ऐसों को ऐसी जगह तैनात किया जाता है जहां चौथ वसूली का स्कोप न हो. इसका कारण यह नहीं है कि यह लोग चौथ वसूली नहीं करते इसलिये इन्हें वहां पोस्ट किया जाता है बल्कि इसका कारण यह है कि यदि इन्हें वसूली की जगह पोस्ट कर दिया जायेगा तो वसूली करने वालों का क्या होगा और ऊपर तक हिस्सा-बांट की राशि में कमी नहीं हो जायेगी. और जब वसूली होगी तो जाहिर है कि पैसे देने वाला नियम-कानून तो तोड़ेगा ही. जब नियम पर चलकर भी चौथ देनी है तो नियम पर चला ही क्यों जाये? अब जब नियम तोड़ना ही है तो उसकी कोई सीमा नहीं है. चोरी पांच पैसे की भी चोरी ही है और करोड़ रुपये की भी. अब भारत में कोई भी शरीफ आदमी पुलिस के पास जाना चाहता है? कभी नहीं, वह जब ही जाता है जब अपरिहार्य हो. कई बार यह तर्क भी दिया जाता है कि पुलिस कर्मी कम हैं और अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं. यह तर्क ठीक हो सकता है, लेकिन इसकी आड़ में गलत को सही ठहराने वाले अपना उल्लू सीधा करते हैं, उनका इस तर्क से कोई लेना-देना नहीं होता. फिर अगर संख्या कम है तो इसके लिये आम जन तो जिम्मेदार कतई नहीं है और इसकी ओट में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का बचाव करना तो निहायत ही दंडनीय़ कर्म है. कुछ लोग यह भी कहते हैं कि एक सिपाही का वेतन तो बहुत कम होता है और उसके काम के घंटे भी सुनिश्चित नहीं, लिहाजा यदि वह सौ-पचास ले लेता है तो गुनाह तो नहीं करता. लेकिन यह तर्क देते समय उसे वह थानेदार याद नहीं आता जो करोड़पति बन चुका है, जिसके न जाने कितने अनाम भूमि-भवन हैं और कितना धन इकठ्ठा कर रखा है. कल एनिमल प्लैनेट पर सांपों से सम्बन्धित एक एपिसोड में दिखाया जा रहा था कि एक व्यक्ति को सांप ने डस लिया और उस व्यक्ति ने ९११ यानी कि पुलिस को फोन किया और फिर पुलिस आनन-फानन में मेडिको एक्सपर्ट को लेकर वहां पहुंची, जिसने उसे प्रारम्भिक चिकित्सा दी और बाद में उपचार से उस की जान बच गयी. और दूसरी तरफ भारत में कई बार यह पाया गया कि दुर्घटना के शिकार लोगों ने यह शिकायत की कि उनकी नकदी और जेवर साफ कर दिये गये. लेकिन इस व्यवस्था को कोई नहीं सुधारना चाहता. सबके (अफसरों और नेताओं के) अपने अपने उद्देश्य हैं और वह तभी पूरा हो सकते हैं जब पुलिस पर पूरा नियन्त्रण हो जिससे कि काले को सफेद और सफेद को काला किया जा सके. इसलिये ............

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