ज न्यूज की समाचार वाचिका और सम्पादक को चित्र और प्रतिमा में अन्तर नहीं पता

जी हां,  पूरी तरह से सत्य है. ज. न्यूज की समाचार वाचिका समाचार पढ़ रही थीं कि सचिन ने स्व०राज सिंह डूंगरपुर की प्रतिमा का अनावरण किया जबकि वास्तव में वह एक चित्र था. कितनी बड़ी भूल. हिन्दी का अनादर हिन्दीभाषी ही कर रहे हैं और उसकी गरिमा को धूल-धूसरित भी कर रहे हैं.

अभी एक दैनिक में भी एक लेख पढ़ा था और एक-दो ब्लाग पर भी यह पढ़ने को मिला कि हिन्दी की लिपि देवनागरी की जगह रोमन हो जाये तो इसमें क्या बुराई है. बहुत सारे लोग रोमन में हिन्दी लिखते हैं-पढ़ते हैं और नये स्क्रिप्ट राइटर भी हिन्दी को रोमन लिपि में ही लिखते हैं. मुझे लगता है कि शायद इसी तरह के लोगों ने ही यह समाचार लिखा और सम्पादित किया होगा. इस तरह के कुतर्क देकर यह लोग क्या सिद्ध करना चाहते हैं और हिन्दी के विरुद्ध किस प्रकार का कुचक्र चलाया जा रहा है. आखिर रोमन में हिन्दी लिखने से भाषा को क्या हासिल हो जायेगा जो देवनागरी में लिखने से नहीं होता. यहां तक कि यदि कभी रोमन में हिन्दी को लिखना पड़ता है तो बड़ा अजीब सा महसूस होता है. इस प्रकार के लोगों की यह तो हिम्मत नहीं पड़ती कि यह लिख सकें कि अंग्रेजी को देवनागरी लिपि में लिखा जाये या फिर अरबी-फारसी को देवनागरी लिपि में लिखा जाये, इसके उलट हिन्दी को जड़ों से काटने की साजिश ही प्रारम्भ कर दी गयी. पहले तो अंग्रेजी दां लोगों के चलते देशवासियों को उच्च शिक्षा या फिर कहिये कि शिक्षा से ही वंचित रखा गया और अब जब आम जनता के बीच से भी गुदड़ी के लाल उत्पन्न होने लगे तो उन्हें उनकी जड़ों से काटने के लिये हिन्दी को रोमन में लिखने की योजना तैयार कर प्रस्तुत की जा रही है. आखिर किसे तकलीफ हो रही है हिन्दी के प्रचार प्रसार से. अब जबकि हिन्दी की शक्ति पूरे विश्व में महसूस की जा रही है तो यह किस प्रकार का षड़यन्त्र तैयार किया जा रहा है हिन्दी के विरुद्ध. हिन्दी में चिट्ठों की संख्या पिछले तीन-चार वर्षों में जिस द्रुतगति से बढ़ी है, उससे ही अन्दाजा लगाया जा सकता है कि हिन्दी की लोकप्रियता किस हद तक बढ़ रही है. क्या ऐसा ही सुझाव अन्य भाषाओं के प्रति भी दिया जा सकता है? नहीं. फिर हिन्दी ही इन लोगों के निशाने पर क्यों. जो लिपि सैकड़ों-हजारों सालों में निखर कर यहां तक पहुंच सकी है, उसे लगभग खत्म करने के लिये इतनी बेकरारी किस लिये.भाषा और लिपि का विकसित होना न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सभ्यता के विकास की कहानी भी इसके द्वारा पता चलती है. इस लिहाज से भाषा के साथ-साथ लिपि का महत्व भी अतुलनीय होता है. मेरी सभी से अपील है कि  हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि के विरुद्ध प्रारम्भ किये जा रहे इस कुचक्र को तोड़ने के लिये अभी से कटिबद्ध हो जायें.

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