माया की माला पर ही हमला क्यों? बाकियों को क्यों बख्शा जा रहा है??

मायावती को लखनऊ में नोटों की माला पहनाई गयी, जिस पर जांच बैठ चुकी है. क्या सिर्फ इसलिये कि यह सबके सामने पहनाई गयी थी? इससे पहले मुलायम सिंह सैफई में करोड़ों रुपये की लागत से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की बोइंग उतरने लायक हवाई पट्टी बनवा चुके हैं. जिस पर उनका हवाईजहाज उतरता भी रहता है. पिछले टेन्यूर में लालू तीन सौ उनहत्तर बार रेलवे के विशेष सैलून में यात्रा करते हैं और बाद में एक विशेष पास भी जारी होता है जिसमें कि वह सपरिवार एसी-प्रथम में यात्रा करने के हकदार होते हैं. कांग्रेस ने नेहरू-इंदिरा-राजीव की याद में न जाने कितने स्मारक बनवाये और पैसा खर्च किया. अन्य सत्ताधारी दलों के हिस्से में भी ऐसी चीजें अवश्य होंगी. सत्ताधारियों के अकस्मात ही अरबपति बनने के किस्से अब आश्चर्य से नहीं देखे जाते. जनता के पैसे पर अफसर और नेता मौज करते हैं. प्रश्न यह नहीं है कि मायावती ने क्या किया या मुलायम ने क्या किया. प्रश्न यह है गरीब जनता की भलाई पर जो पैसा खर्च होना चाहिये वह नेता और अफसर अपने ऊपर कैसे खर्च कर लेते हैं? उनसे जबावतलबी क्यों नहीं होती, उनके विरुद्ध जांच बिठाकर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती. एक जस्टिस के विरुद्ध अमानत में खयानत के आरोप के बारे में सरकार चुप्पी साध चुकी है. यदि वह जस्टिस सही थे तो उनके विरुद्ध आरोप क्यों लगाये गये और यदि आरोप ठीक थे तो फिर अब चुप्पी क्यों. महालेखापरीक्षक की रिपोर्टें धूल खाती रहती हैं. सत्ता जिसके पास होती है उसके सब काम जायज होते हैं. भारत की जनता का नसीब बन चुका है नेताओं द्वारा छला जाना. सत्ता का चरित्र नहीं बदलता बस चेहरा बदल जाता है. लेकिन इस प्रकरण की ओट में मायावती पर किसी प्रकार का दबाव तो नहीं बनाया जा रहा है?

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