त्यागी जी के ब्लाग परशुराम२७ में कुछ गड़बड़ है

त्यागी जी के ब्लाग परशुराम२७ में कुछ गड़बड़ है. जब भी टिप्पणी पोस्ट करने जाओ तो कहीं और रीडायरेक्ट हो जाता है. कई बार एक ही लेख चार-चार पांच-पाच जगह अलग-अलग ब्लाग और शीर्षकों से पढ़ने को मिलता है तो कभी-कभी अकुलाहट होने लगती है. हो सकता है कि इससे भी कोई लाभ होता हो, लेकिन एक ही रचना कई ब्लागों पर, मुझे थोड़ा सा अटपटा लगता है. क्षमाप्रार्थना सहित. पाबला जी बता ही चुके हैं कि ब्लागर पर नई सुविधा से कुछ असुविधा होने लगी है. सभी ब्लागर्स एक बार चेक कर लें, मेरे ब्लाग में यदि कोई गड़बड़ी नजर आ रही हो तो कृपया बतायें. आज माडरेशन बस यूं ही लगा कर एक प्रयोग सा कर रहा हूं, कल या परसों इसे हटा दूंगा.


चलते-चलते


नेता जी से पूछा एक सवाल,

जो कड़ा था,

भ्रष्टाचार पर खड़ा था.

आप क्यों करते हैं ऐसा,

क्यों खाते हैं जनता का पैसा,

नेता का दिमाग चकराया,

उसने अपने दिमागी घोड़े को दौड़ाया,

और ऐसा उत्तर सरकाया,

जिसे सुनकर हमारा दिमाग भन्नाया,

बोले, ऐसा कर हम करते हैं

तुम्हारे जैसे लोगों पर उपकार,

और तुम रहे हो हमें धिक्कार,

अरे मूरख, यदि हम ऐसा नहीं करेंगे,

हम भी तुम्हारी तरह सूखी रोटी पर गुजारा करेंगे,

तो यह पैसा औरों के घर जायेगा,

भ्रष्टाचार का है, उन्हें रौरव नरक में ले जायेगा,

ऐसा कर हम उन्हें उस से मुक्ति दिलाते हैं

शिव की तरह स्वयं गरल पी जाते हैं

और तुम्हारे जैसे लोग हमें आंखे दिखाते हैं..

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