कानपुर के रेल बाजार थाना प्रभारी ने व्यवसायी मुकेश सिंह का अपहरण कर हत्या की.

कानपुर के रेल बाजार थाना प्रभारी ने एक व्यवसायी मुकेश सिंह का अपहरण किया और फिर उसके तीन दिन बाद उसकी लाश एक नहर से बरामद हुई. पुलिस निरंकुश हो चुकी है. कारण साफ है नीचे से ऊपर तक फैला हुआ भ्रष्टाचार. किस नेता और अफसर को हर चौराहे पर होती वसूली दिखाई नहीं देती? चौकी इन्चार्ज और थानेदारों का रुतबा और आर्थिक हैसियत देख लीजिये. आय से कई गुना अधिक सम्पत्ति बना चुके होते हैं. अपनी पत्नी और रिश्तेदारों के नाम कृषि भूमि दिखाकर और कृषि भूमि से आय दिखाकर करोड़ों रुपये का कालाधन सफेद बनाकर मौज करते हैं. हर कोई जानता है कि भ्रष्टाचार कहां होता है, किस प्रकार होता है, कौन शामिल है और क्यों होता है. लेकिन कार्रवाई कोई करना नहीं चाहता. जो चाहते हैं उनकी संख्या नगण्य है और ऐसे लोगों के हाथ बांध दिये जाते हैं. पुलिस इसलिये और भी अधिक निरंकुश हो जाती है कि पुलिस के खिलाफ कार्रवाई कौन कर सकता है, जिन पुलिस वालों के खिलाफ जांच होती है, वह किसी पुलिस वाले द्वारा ही की जाती है. अदालत के लिये सबूत और गवाह चाहिये और पुलिस के खिलाफ सबूत और गवाह! थाने में हुई हत्याओं के आरोपी पुलिस वालों को पहले निलम्बित और गिरफ्तार कर दिया जाता है और जांच प्रारम्भ कर दी जाती है. रिकार्ड उठाकर देख लीजिये पता चल जायेगा कि कितनी जांचे मुकम्मल हो सकीं. जो मुकम्मल हुईं भी, उसमें अधिकतर में पुलिस वाले स्काट फ्री छूट गये. थाने में हत्या होने पर कितने लोगों को सेवा से निकाला गया? संख्या नगण्य है. चूंकि अपवाद छोड़कर किसी भी मामले में उदाहरणीय सजा ऐसे अपराधियों को नहीं मिलती है इसलिये ऐसे अपराधी पुलिस वालों का हौसला लगातार बढ़ता जा रहा है. इन घटनाओं से लगता है कि जस्टिस श्री ए०एन० मुल्ला ने सच ही कहा था कि "पुलिस संगठित गुंडों का गिरोह है".

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