कृपालु जी के भंडारे में छुपा कड़ुवा सच

कृपालु जी द्वारा दिये गये भंडारे में मची भगदड़ में बहुत बड़ी संख्या में लोग मारे गये. मीडिया पर लगातार इसके बारे में खबरें आ रही हैं. यद्यपि आश्रम की तरफ से तो मृतकों के परिजनों और घायलों के लिये कुछ तात्कालिक सहायता देने की खबर आई लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने तो हद कर दी यह कहकर कि उनका खजाना खाली है और सरकार इन लोगों के लिये कुछ नहीं कर सकती. अरे साहब, ये सब दलित ही थे. इस के पीछे का कड़ुवे सच को पहचानिये. जो लोग बीस रुपये और एक धोती तथा एक-दो बर्तनों की खातिर इतनी बड़ी संख्या में इकठ्ठे हुये, जाहिर है वह किसी धनकुबेर के खानदानी तो हो नहीं सकते. यही भारत के सांसदों और विधायकों के भाग्य विधाताओं का दुर्भाग्य है कि वोट लेते समय तो हर व्यक्ति कालीन बना दिखाई देता है और वोट लेने के बाद उसे वह भाग्य विधाता कीड़े-मकोड़े लगने लगते हैं. इस घटना के तमाम कारण गिनाये जा रहे हैं-आश्रम प्रबन्धन की लापरवाही, प्रशासनिक अदूरदर्शिता. लेकिन असली कारण है भारत की नब्बे प्रतिशत जनसंख्या की आर्थिक हालत जिसे सब इग्नोर कर रहे हैं. ऊपर से दाग अच्छे हैं, की तर्ज पर समझाया जा रहा है कि मंहगाई अच्छी है. देश के कर्णधार होने का दावा करने वालों, अभी भी समय है आंखे खोलो, अन्यथा कोई कारण नहीं है कि देश में चारों ओर अराजकता फैलने से बच सके . चेतो.

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