बरेली में दंगा

न जाने देश में ऐसे कितने दंगे होते होंगे जिनकी खबरों को दबा दिया जाता है. अभी बरेली में एक दंगा हुआ था जिसमें करोड़ों रुपये की हानि हुई लेकिन धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इसकी खबरें दबा दी गयीं. किस्सा यूं है कि जुलूसे-मुहम्मदी का जुलूस निकला जा रहा था. इस शहर में पिछले दस सालों से सबसे उदार माने जाने वाले बरेलवी मसलक ने बड़ी प्रगति की है. दस वर्ष पहले तक आला-हजरत का कोई ऐसा विशेष नाम नहीं था, किन्तु पिछले दस सालों में यहां आने वाले जायरीनों की संख्या लाखों में पहुंचने लगी है. इसी प्रकार यहां एक जगह है शाहदाना, जिसके पास में कुछ वर्ष पूर्व स्वर्गवासी हुये एक मुस्लिम सज्जन की मजार बनाई गयी है और अब वहां भी उर्स होने लगा है. पिछले कई दिनों से यहां जुलूस निकाले जा रहे थे, जिनमें मुस्लिम व्यक्ति सफेद कुर्ता-पाजामा, काले रंग का अरबों द्वारा पहना जाने वाला चोगा, हाथ में तलवारें, चापड़ इत्यादि लेकर तथा हरे रंग के झण्डे जिन पर चांद तारे का निशान बना होता है, लेकर जुलूस निकालते हैं. पता नहीं किस नियम के तहत इस शस्त्र प्रदर्शन को हरी झण्डी दी जाती है, जबकि सिक्खों के अलावा कोई भी व्यक्ति इस प्रकार शस्त्र प्रदर्शित नहीं कर सकता. स्थानीय धर्मनिरपेक्षी नेता भी हरी टोपी पहन कर इन जुलूसों में शामिल हुये. होली से दो दिन पहले तक यह शक्ति परीक्षण का कार्यक्रम मध्यान्ह से प्रारम्भ होकर पूरी रात चलता रहा, जबकि इसी चौराहे पर थाना बारादरी है. इसके बाद होली के अगले दिन जुलूसे मोहम्मदी निकला. परम्पराओं से अलग इसमें खुलेआम शस्त्र प्रदर्शन हो रहा था. फैयाज बिल्डिंग कोहाडापीर के पास जब यह निर्धारित मार्ग छोड़कर नये रास्ते पर बढ़ा तो लोगों ने इसका विरोध किया और फिर क्या था जुलूस में शामिल आततायियों ने बलवा शुरू कर दिया. जब जुलूस में शामिल नेताओं ने उकसाना प्रारम्भ किया तो पुलिस के अधिकारी चुपचाप खड़े रहे और होते भी क्यों न. बंजारा जेल में है एक मासूम आतंकवादी के एनकाउंटर के चलते और कल बीएसएफ के कमांडेंट ए के बिरदी को भी इसलिये गिरफ्तार कर लिया गया कि उनके द्वारा हिंसक भीड़ पर गोली चलाने के आदेश दिये गये थे जिसमें एक अल्पसंख्यक लड़के की मौत हो गयी. इसलिये पुलिस और प्रशासन के अफसर लोगों की जान बचायेंगे या अपनी नौकरी और जेल जाने से बचेंगे. इसके बाद बहुसंख्यकों के मकान और दुकान अग्नि की भेंट चढ़ा दिये गये. मेरे एक मित्र की मौसी का घर है जिसमें उनका कोचिंग सेंटर है, जला दिया गया. उन लोगों ने एक कमरे में बन्द होकर अपनी जान बचाई. आज भी मालूम किया तो पता चला कि वे लोग कहीं और रह रहे हैं. चुन-चुनकर और सुनियोजित ढ़ंग से धावा बोला मासूम अल्पसंख्यकों ने जालिम बहुसंख्यकों के ऊपर. एक मंदिर में तोड़फोड़ की गयी. मकानों के ऊपर ईंट पत्थर मौजूद थे, और परम्परागत बोतल बमों के अलावा छोटे गैसे सिलेन्डर्स का प्रयोग बम के बतौर किया गया. इस जुलूस में लगभग एक लाख मासूम अल्पसंख्यक शामिल थे. एक मन्त्री हैं वक्फ के, उनका घर जो कि थाने के बराबर में है, आश्चर्य है कि  उनके घर ने नीचे उनकी मार्केट में एक किन्हीं वार्ष्णेय जी की कपड़ों की दुकान जला दी. कोहाड़ापीर पुलिस चौकी फूंक दी गयी, डाकखाने पर धावा बोला गया, एक पेट्रोल पम्प फूंकने की कोशिश की गयी. अभी जब मैं दिल्ली गया तो एक नया ट्रेण्ड ही देखने को मिला. चांद सितारे वाला हरा झंडा. मुस्लिम आबादी में इस झण्डे की उपस्थिति! यह लगभग पाकिस्तान के झण्डे की तरह है, सिर्फ एक सफेद पट्टी की कमी है .  इतनी बड़ी घटना और राष्ट्रीय मीडिया तो छोडिये प्रदेश के किसी चैनल पर पहले दिन एक मिनट की बाइट के अतिरिक्त कुछ नहीं. प्रिन्ट मीडिया का दोगलापन भी देखिये. जब जुलूसों में खुलेआम तलवारें निकल रही थीं तो एक भी फोटो नहीं छापा और न ही यह लिखा कि यह गलत है और अब दंगे के बाद अखबार लिख रहे हैं कि पुलिस और प्रशासन को तलवारें लिये हुये लोग दिखाई क्यों नहीं दिये. उस पर अब फिर से लीपापोती और फिर छद्म धर्मनिरपेक्षता की एकतरफा घुट्टी पिलाई जाने लगेगी. फिर बताया जाने लगेगा कि रमजान में राम हैं और दिवाली में अली.  हो सकता है कि इस्लाम शांति का पाठ सिखाता हो लेकिन उसके अनुयायी ???प्रशासन ने इस घटना से सबक लिया और 150 साल पुरानी गंगाघाट-निषाद की शोभायात्रा को रोक दिया. है न धर्मनिरपेक्ष शासन.

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