वह कैन उठाने वाला

आज होली थी. सबके लिये. बड़े प्रसन्न थे लोग. मिठाई, गुझिया, पापड़, ठंडाई और न जाने क्या क्या. बच्चे और जवान मस्त थे. चौराहों पर रखी हुई होली, बजते हुये साउंड बाक्स, नाचते हुये लड़के. लाल-नीले-पीले चेहरे लिये हुये. हर कोई अपनी मस्ती में मशगूल. सब एक दूसरे को बधाई देते, गले मिलते.

रंगों के डिब्बे खाली हो जाने पर उन्हें सड़क पर उछाल देते. थोड़ी देर बाद एक लड़का बारह-तेरह साल का उधर से गुजरता है. उसका भी चेहरा लाल-नीला पुता हुआ है. उसके बदन पर भी एक फटी हुई शर्ट है. लेकिन थोड़ा फर्क है. उसकी पीठ पर एक झोला है. लोग सड़क पर डिब्बे, कैन फेंक रहे हैं, वह उन कैन, डिब्बों को उठा कर अपनी पीठ पर टंगे झोले में इकठ्ठा कर रहा है. उसकी पैंट की पिछली जेब में एक प्लास्टिक का डिब्बा है जिसमें रंग भरा है, जिसका प्रयोग वह भी कर लेता है. मैं उसे रोक कर पूछता हूं. "क्या नाम है?" "वसीम". उत्तर मिला. "पढ़ते क्यों नहीं हो, तुम्हारी उमर तो पढ़ने की है." कहीं कुछ चुभता सा महसूस हुआ "बाप मजदूरी करता है, इतनी कमाई नहीं होती. पांच भाई बहन हैं. कुछ करेंगे नहीं तो खायेंगे क्या?"

एक फोटो लेने की इच्छा हो रही थी. फिर मुझे अपराधबोध सा लगने लगा और मेरा मन नहीं हुआ कि उसकी फोटो लेता. यह उसके साथ उसकी स्थिति का फायदा उठाना सा होता. उसने पूछा कुछ और डिब्बे, कैन वगैरा तो नहीं हैं. एक कोने में दो कैन पड़े हुये थे. उठाकर दे दिये, उसके चेहरे की चमक थोड़ा सा बढ़ गयी. वह उसी मस्ती में आगे बढ़ गया. मुझे सारे रंगीन चेहरे अब रंगहीन लग रहे थे. यह बच्चा भी तो भारत का भविष्य है. और भारत के अधिकांश भविष्य की नियति में शायद पीठ पर कैन ढ़ोना ही बदा है. शायद हमारे देश में दो ही प्रकार के लोग हैं, एक लाइन के इस पार-कैन फेंकने वाले और दूसरे लाइन के उस पार-कैन इकठ्ठा करने वाले.

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