मुसलमानों को शोषण से बचाने और उन्नति-प्रगति-विकास के पथ पर ले जाने के लिये एक आसान सुझाव

सैकड़ों वर्षों से मुसलमानों का शोषण होता रहा है भारत में. जिसके कारण वे दबे-कुचले रह गये हैं और उन्हें संसाधनों पर भी पूरा अख्तियार नहीं मिल सका. हिन्दुओं  की अधिकता के कारण मुसलमानों को पूरा न्याय नहीं मिल सका और वे षड़यन्त्र के चलते तालीम भी हासिल नहीं कर सके. गरीबी-गुरबत ही उनकी किस्मत बनकर रह गयी. इस बात को समझने में साठ साल लग गये और फिर मनजी ने कहा कि संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है. अल्पसंख्यक मतलब मुसलमान और अब उनमें ईसाई भी जुड़ गये हैं.

सभी धर्मनिरपेक्ष दल और भाजपा भी अल्पसंख्यक कल्याण को लेकर बड़े चिन्तित रहते हैं. मेरे मन में उनकी इस चिन्ता को हरने के लिये एक विचार आया है (जिसे कुविचार कतई न समझें). मुझे लगता है कि भाजपा-शिवसेना इसे समर्थन नहीं देंगी लेकिन कांग्रेस, सपा, बसपा, माकपा, भाकपा, राजद, लोकपा, नेशनल कांफ्रेंस, राकांपा, द्रमुक, अन्नाद्रमुक इत्यादि धर्मनिरपेक्ष दल इसे जरूर मानेंगे और अपनायेंगे भी, यदि ये सब सही अर्थों में अल्पसंख्यकों का कल्याण चाहते हैं.

अब वह रास्ता क्या है, मैं बताता हूं. वह रास्ता है कि सभी विधानसभाओं, विधानपरिषदों तथा लोकसभा और राज्यसभा के टिकिट इन पार्टियों द्वारा केवल मुसलमान और ईसाईयों को दिये जायें. इससे हासिल यह होगा कि कम से कम सत्तर प्रतिशत सांसद और विधायक मुसलमान और ईसाई ही होंगे. अब सत्ता उनके हाथ में आ जायेगी और वे कम से कम पांच साल खुलकर अपने हितों के लिये काम कर सकेंगे. इस तरह से धर्मनिरपेक्षता को भी एक नई ऊंचाई मिलेगी, एक नया आयाम मिलेगा और जब पांच साल तक मुसलमान और ईसाई सत्ता में रहेंगे तो अपनी गरीबी-गुरबत दूर करने के लिये कार्यक्रम बना सकेंगे तथा अब तक जो अन्याय होता आया है उसे दूर कर सकेंगे. क्या इस छोटे से आसान रास्ते को अपनाना पसंद करेंगे तमाम भारतीय धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल या महज मुसलमानों को वोट बैंक ही बनाते रहेंगे? 

इसे तंज के रूप में न लें, यह एक गंभीर सुझाव है.

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