सावधान, खबरदार, जागते रहो.
रोज चेतावनी दी जा रही है देश की जनता को. सब अपना अपना कर्तव्य बखूबी निभा रहे हैं. मन्त्री अपना और प्रधानमन्त्री अपना. अफसर भी इसी दिशा में कदमताल मिलाकर वक्त के साथ चल रहे हैं. उनकी तरफ से भी चेतावनी जारी कर दी जाती है. रुटीन बन गया है चेतावनी जारी करना. बल्कि एक स्थाई चेतावनी जारी कर दी जाये कि " आतंकवादी कभी भी और कहीं भी बम फोड़ सकते हैं, कहीं भी गोलियां बरसा सकते हैं, अपनी जानमाल की रक्षा स्वयं करें." एक बयान भी अनडेटेड जारी कर दें कि प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री तथा यूपीए की अध्यक्ष ने हमलों की कड़ी निन्दा की है, दोषी बख्शे नहीं जायेंगे, तथा मरने वालों को पांच लाख और घायलों को पचास हजार. आतंकियों के मुस्लिम होने की बात होती है तो सिकुलर मीडिया और पार्टी तथा घोर कट्टरपंथी मुस्लिम नेता बयानबाजी करने लगते हैं कि इस्लाम में दहशतगर्दी की इजाजत नहीं है, जुल्म करना गुनाह है, वगैरा-वगैरा. और फिर यदि गलती से कभी दो-चार आतंकी मारे जाते हैं तो ये सभी लोग उस पर उंगली उठाने लगते हैं, ऊपर से रही बसी कसर नेता खुद पूरी कर देते हैं. जब आतंकी गिरफ्तार हो जाते हैं तो मुस्लिमों की ओर से आरोप लग जाता है कि बेकसूर पकड़े जा रहे हैं, नेता भी जाते हैं और कह आते हैं कि तीन महीने में पकड़े गये मासूम बाहर आ जायेंगे.
जिसे फांसी हो गयी उच्चतम न्यायालय से, उसका मामला बजाय प्रायरिटी के निपटाने की जगह यह बहाना गढ़ा जाता है कि इससे पहले के भी इतने मामले पेंडिंग हैं. गौर करें तो पायेंगे कि अल्पसंख्यक मुस्लिमों की बाडी लैंग्वेज ही पूरी तरह से बदल गयी है और वे एक शासक या होने वाले शासक की तरह व्यवहार करने लगे हैं और बहुसंख्यक हिन्दू (सिर्फ कहने को) अब पूरी तरह से इसे स्वीकार कर चुका है कि आने वाले समय में उसे घोषित या अघोषित प्रो इस्लामिक शासन व्यवस्था को स्वीकार करना ही पड़ेगा. यदि इसकी परीक्षा करना हो तो दो-चार दिन किसी मुस्लिम बहुत इलाके में बिताकर देखें. इसके अतिरिक्त सड़कों पर बने हुये धार्मिक स्थलों की भी तुलना करें. अन्तर स्वयं स्पष्ट हो जायेगा. बाकी कसर मीडिया और पुलिस-प्रशासन का व्यवहार पूरा कर देता है. मुस्लिमों द्वारा मोहम्मद साहब के कार्टून बनाये जाने को लेकर किये गये उपद्रव पर शासन-प्रशासन का रवैया देख लें. तस्लीमा नसरीन का मामला हो या फिर मकबूल फिदा हुसैन का या इमाम बुखारी और मदनी के मामलों में. हर जगह धर्म के आधार पर किया जा रहा भेदभाव आईने की तरह साफ है.
पाकिस्तान की ओर से आये एक बयान पर काफी हो हल्ला मचा जिसमें यह इंगित किया गया था कि मुम्बई हमले में भारतीय भी शामिल थे. तुरन्त हंगामा हो गया कि पाकिस्तान मामले को गलत रुख दे रहा है, बात काफी हद तक ठीक भी है, लेकिन इस बात में पूरा दम है कि बिना भारत के लोगों की सहायता के इतने बड़े किसी भी कांड को अंजाम दे पाना संभव नहीं है. लोकेलाइट्स के सहयोग के बिना इतने बड़े पैमाने पर कोई भी आतंकी कार्रवाई नहीं की जा सकती. और जहां भ्रष्टाचार ने पांव पसार रखे होंगे वहां किसी से उम्मीद भी क्या हो सकती है. अधिकतर चौराहे पर पुलिस वाला मुस्तैद होता है लेकिन वसूली के लिये, जिसके बारे में हर अफसर और नेता को पता होता है, लेकिन कुछ नहीं होता. ऐसे में मौत का सामान उस पार से इस पार और फिर पूरे देश में पहुंच जाता है तो कैसा आश्चर्य. अपना घर ठीक नहीं कर पा रहे, उम्मीद पड़ोसी और पड़ोसी के चचा से कर रहे हैं. वाह! बहुत खूब!
तो भैया तैयार रहो और घर वालों को अपनी जीवन-बीमा पालिसियों के बारे में अपडेट करते रहो और जिन्दगी को बोनस मानकर जियो, क्योंकि नेता है तो जनता है, सांसद हैं तो संसद है. इसलिये नेता की सुरक्षा को अपनी सुरक्षा मानो बिल्कुल उसी तरह जैसे कि नेता की जीत में आपकी जीत होती है. इसलिये नेता की जिंदगी बची, आपकी बची. नेता अरबपति हुआ, आप हुये. नेता बाप बना आप बने,,, सारी ...... आप नहीं. नेता सुरक्षित रहेगा तभी आप सुरक्षित रहोगे. इसलिये टैक्स खूब चुकाओ, जिससे कि ये सभी चीजें चलती रहें तभी तो विस्फोट में मरने पर पांच लाख का चेक मिल पायेगा.
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