किसानों की आर्थिक हालत सुधारने और मंहगाई कम करने के नाम पर जीएम बीजों को बाजार में उतारना उचित है?
कृषि मंत्रालय ने कहा है कि जेनेटिकेली मोडीफाईड बैंगन अर्थात बीटी बैंगन को स्वीकृति दी जा चुकी है.हालांकि अलग-अलग मंत्रालयों से भी अलग-अलग बयान आ रहे हैं. दुनिया में शायद भारत ही वह सबसे उत्सुक देश है जो अभी इसके सम्पूर्ण परीक्षण के बिना ही इसे बाजार में उतरने की अनुमति दे चुका है. आखिर इतनी व्यग्रता क्यों? यहां तक कि कई प्रदेशों में चोरी-छुपे इस बैंगन की खेती भी शुरू हो गई है. बीटी बैंगन के समर्थक निम्न तर्कों पर जोर डालते हुये कहते हैं कि
१-भारत में आने वाले समय में ऐसी फसलों की आवश्यकता होगी क्योंकि तेजी से बढ़ती हुई आबादी के लिये सामान्य तरह की प्रजातियों में फसल की मात्रा उतनी अधिक नहीं होगी जितनी कि जेनेटिकेली मोडीफाईड प्रजातियों में होगी.
२-इस तरह की प्रजातियों से अधिक उत्पादन होगा जिससे कि मंहगाई पर काबू पाया जा सकेगा और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुये तथा बढ़ती हुई जनसंख्या को खाद्यान्न की आपूर्ति को सुचारू बनाने के लिये इनका अपनाना अपरिहार्य है.
३-इन प्रजातियों में स्वयं ही ऐसी क्षमता होगी जिससे कि किसी बीमारी के पनपने की स्थिति में पौधे के अन्दर खुद-ब-खुद एन्टी प्रोटीन उत्पन्न हो जायेंगे जोकि विषाणुरोधी/कीटनाशक का कार्य करेंगे और किसी भी कीटनाशक की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.
४-किसान कीटनाशकों का बिना सोचे-समझे अन्धाधुंध प्रयोग करते हैं तथा वेटिंग पीरियड पूरा हुये बिना ही उत्पादों को बाजार में उतार देते हैं जिससे कि यह कीटनाशक मनुष्य के शरीर में चुपचाप पहुंच जाते हैं और जिसका परिणाम भयंकर बीमारियों के रूप में सामने आता है.
अब इसके आफ्टर/साइड इफेक्टस देख लीजिये -
१-जेनेटिकेली मोडीफाईड प्रजातियों से किसानों को बीज बनाना संभव नहीं होगा क्योंकि इसकी फसल का उपयोग बीज के रूप में नहीं हो सकेगा. यदि कोई किसान अपनी फसल से बीज लेकर बोयेगा तो उससे पैदावार नहीं होगी. लिहाजा बीज उत्पादकों की मोनोपाली हो जायेगी और उनके द्वारा निर्धारित मनमाने दामों पर ही बीज खरीदना होगा. भारत का छोटा और मझोला किसान पहले से ही मजदूर बनने के कगार पर है रही सही कसर इस तरह से पूरी हो जायेगी.
२-बीटी कपास पैदा करने वाले किसानों का हश्र तो सबको मालूम ही है. किस तरह से अधिक उत्पादन के सुनहरे सपने दिखाकर बीटी कपास उगाने के लिये प्रोत्साहित किया गया और बाद में जब इस पर कीड़ा लगा तो न जाने कितने किसान भुखमरी के कगार पर पहुंच गये और न जाने कितनों ने आत्महत्या कर इस जंजाल से छुटकारा पाया. और असंख्य अभी तक इसके आफ्टर इफेक्ट्स को झेल रहे हैं.
३-बाजार में बढ़ती हुई कीमतों के पीछे किसान और उत्पादकता का हाथ नहीं होता है बल्कि इसके पीछे जमाखोरों, दलालों और वायदा कारोबारियों का हाथ होता है. जो अरहर किसान पहले ही अपेक्षाकृत काफी सस्ती दरों पर बेच चुका था उसी को जमाखोरों ने बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर सौ रुपये तक पहुंचा दिया तो इससे किस किसान का भला हो गया हालांकि जमाखोरों ने जरूर करोड़ों रुपये कमा लिये.
४-दर-असल छोटा और मझोला किसान तो मजबूर होता है अपनी फसल को जल्द से जल्द बेचने के लिये. कारण उसे अपने कर्जों को भी लौटाना होता है. कारण न तो उसके पास इतना पैसा होता है कि वह अपनी फसल को रोक सके, उसे तो अपने जीवन यापने के लिये फसल को तुरन्त बेचना होता है. कारण उसके गांव न तो सड़कों द्वारा शहरों से जुड़े हुये हैं और न ही उसके पास अपनी फसल को प्रोसेस कर स्टोर करने के साधन मुहैया कराये गये हैं जिससे कि वह अपनी सुविधानुसार मनमाफिक जगह पर अपने उत्पाद को बेच सके और न ही यह कि मन मुताबिक वक्त तक रोक कर बाजार में उतार सके. लिहाजा यह तर्क भी आधारहीन है कि उत्पादकता बढ़ने से कीमतों पर नियन्त्रण किया जा सकेगा. शोषित किसान को शोषण से बचाना कोई नहीं चाहता. मंहगाई कितना भी बढ़ जाये लेकिन किसान को उसका लाभ कभी नहीं होता.
५-जनसंख्या जिस गति से बढ़ रही है उसे रोकने का कोई उपाय वोट-बैंक की राजनीति के चलते नहीं किया जा रहा बल्कि इसके विपरीत यह कहा जा रहा है कि अधिक उत्पादन करने वाली बीटी/जीएम प्रजातियां उगाई जायें. यह तो वैसे ही है कि दर्द होने पर बीमारी का इलाज न किया जाये बल्कि दर्द से आराम देने वाली दवाई देने का उपक्रम किया जाये. अरे भाई जमीन तो पहले ही सीमित है, जंगल उजाड़े, खेत बनाये, खेत उजाड़े, बिल्डिंग बनाई, प्रकृति का आपराधिक दोहन कर रहे हैं हम लोग. जब यह जमीन भी खत्म हो जायेगी तो रहने के लिये चांद पर जायेंगे या फिर खेती मंगल पर जाकर करेंगे.
६-अभी तक फसलों में कीड़ा लगने पर नुकसान फसलों का होता आया है. अभी तक हमने मैड काऊ डिसीज, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू इत्यादि बीमारियों के नाम सुने हैं जो मनुष्यों में जानवरों के मांस खाने से हुई हैं. इन जेनेटिकेली मोडीफाईड फसलों के अन्दर पहले से इस तरह के जीन इन्सर्ट किये जाते हैं जो किसी बीमारी के होने पर स्वत: ही उस बीमारी फैलाने वाले वायरस के प्रोटीन के विरुद्ध एन्टीप्रोटीन का निर्माण करेंगे और इस तरह उस बीमारी को पनपने से पहले ही नष्ट कर देंगे. लेकिन इसका दूसरा पहलू देखिये कि हर उत्पाद के अन्दर एक चलता फिरता विषाणुरोधी तैयार मिलेगा जिसके गड़बड़ा जाने पर क्या हश्र होगा, भगवान ही मालिक है.
७-एक प्रमुख तथ्य और भी है जिस पर आप सबने गौर फरमाया होगा. हमारे यहां जो भी देसी फसलें पैदा होती हैं जिनमें दो प्रमुख चीजें जिनका उपयोग लगभग पूरे देश में होता है-खीरा और टमाटर. इन दोनों के देसी संस्करण एक ओर रखिये और दूसरी ओर हाइब्रिड, फिर दोनों की शक्ल सूरत पर गौर कीजिये. हाइब्रिड नस्ल में इनका लम्बाई चौड़ाई तो काफी बढ़ी हुई मिलेगी लेकिन जब इनका स्वाद लेंगे तो पता चलता हि कि देसी प्रजातियों के मुकाबले ये बिल्कुल बेस्वाद हैं. जो जायका देसी प्रजातियों में है वह इन हाइब्रिड प्रजातियों से गायब है लिहाजा अब इन हाइब्रिड प्रजातियों का जायका बढ़ाने के लिये कुछ जीव-जन्तुओं की जीन इनमें प्रविष्ट कर नयी प्रजाति उत्पन्न करने की कोशिश की जा रही है.
अधिकतर विकसित देशों में जेनेटिकेली मोडीफाईड प्रजातियों का प्रयोग प्रारम्भ नहीं किया गया है. जबकि भारत में यह उत्पादन के लिये बाजार में पहुंचाये जाने की कगार पर हैं. उन्नत किस्मों का प्रयोग करने में कोई हानि नहीं है और इस तथ्य में भी दम है कि यहां लोग कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग करते हैं तथा वेटिंग पीरियड के देखते हुये पूरा हुये बिना ही फसलों को बाजार में उतार देते हैं. लेकिन इसके लिये क्या यह श्रेयस्कर नहीं होगा कि कीटनाशकों पर अधिक शोध किया जाये तथा ऐसे कीटनाशक बाजार में उतारे जायें जो मनुष्य के लिये हानिरहित हों. क्या यह शाकाहारियों के साथ धोखा नहीं है कि फल-सब्जियों में जीव जन्तुओं की जीन डालकर उन्हें बाजार में उतारा जा रहा है. क्या यह गरीब किसानों के साथ छल नहीं है कि उन्हें मजबूर किया जाये कि वह हर बार बीज कम्पनी से उसके द्वारा मनमाफिक ढंग से निर्धारित दाम पर बीज खरीदें. और विडम्बना देखिये कि किसान फसल तो उगा सकता है लेकिन दाम सरकार निर्धारित करती है, उसे फसल कहां बेचना है यह भी सरकारें ही निर्धारित करती हैं, क्योंकि कई दफा दूसरे प्रदेशों में फसल बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है. इन हालातों में किसानों की आर्थिक हालत सुधारने और मंहगाई कम करने के नाम पर जीएम बीजों को बाजार में उतारना क्या उचित है?
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