जिंदगी यूँ भी बसर होती है


ये भी भारत का नागरिक (वोटर है) जो डलाव से प्लास्टिक और लोहा बीनकर जीवन यापन करने की कोशिश कर रहा है. क्या इस नागरिक तक भारत के संविधान में दी हुई तमाम गारंटियां और पार्टियों द्वारा दिखाये गये सपने पहुंच पायेंगे? या फिर हर हाथ को काम की यही मूर्त अभिधारणा है??

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