स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विदेश नीति तथा आंतरिक नीति से सम्बंधित कुछ भूलें.

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत के नीति-निर्धारकों ने कुछ ऐसी भूलें कर दीं, जो अभी तक भारत को भारी पड़ रही हैं और अब भी भारतीय नीति निर्धारकों की आंखे नहीं खुल सकी हैं.

१-जम्मू-कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र का दखल - शायद यह वह सबसे बड़ी भूल थी जिसके कारण कश्मीर नासूर बन चुका है.
२-साठ के दशक में परमाणु हथियारों से दूर रहना, यह वह समय था जब भारत एशिया में सैन्य बढ़त ले सकता था तथा परमाणु शक्ति बन सकता था तथा उस समय परीक्षण करने पर न तो किसी भी प्रकार के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता तथा परमाणु शक्ति के रूप में स्वीकृति भी मिलती.
३-शांतिदूत बनने के चक्कर में पडो़स से खतरे को न भांप सकना, जिसके फलस्वरूप चीन ने भारत पर युद्ध थोप कर हजारों वर्गमील भूमि पर कब्जा जमा लिया.
४-निर्गुट/तटस्थ देश बनने की कवायद जिसके चलते पर्याप्त व आधुनिक सैन्य उपकरण न मिल सकना. अन्ततोगत्वा रूस तत्कालीन सोवियत संघ की शरण में जाना पड़ा.
५-अक्षम कूटनीति के चलते चारों तरफ दुश्मन पैदा करना.
६-पाकिस्तान से हुये तमाम युद्धों के बाद कब्जाई जमीन को वार्ता की मेज पर बैठ पर वापस कर देना जिनमें पश्चिमी पाकिस्तान के रणनीतिक रूप से कई महत्वपूर्ण हिस्से शामिल थे.
७-सैन्य साजो-सामान की खरीद में देरी, उनमें कमीशन खोरी, तथा सेना में फैलता भ्रष्टाचार. फौजियों की भर्ती से लेकर दाल-मीट-शराब की सप्लाई तथा सैन्य उपकरणों की खरीद में भ्रष्टाचार के न जाने कितने किस्से सामने आ चुके हैं.
८-असफल कूटनीति के चलते भारत सही समय पर अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश की आन्तरिक राजनीति को नहीं भांप सका तथा आज हालात यह हैं कि अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार तथा श्रीलंका में चीन अपनी जड़ें जमा चुका है.
९-भारत की अदूरदर्शी कूटनीति का ही नतीजा है कि चीन ने श्रीलंका तथा म्यांमार में अपनी नौसैनिक उपस्थिति जमा ली है तथा म्यांमार भी अब परमाणु परीक्षण करने के कगार पर है.
१०-खुफिया सूचनायें इकठ्ठा करने में असफलता. सही समय पर खुफिया सूचनायें मिलने व उनसे सही निष्कर्ष निकालने में असफल रहने का ही परिणाम विभिन्न युद्धों के रूप में सामने आया है.
११-सैन्य तैयारी में शिथिलता, विराट के सेवा से हटने के बाद विमानवाहक पोत अभी तक नहीं मिल सका है. भारत के स्वनिर्मित लड़ाकू टैंक अर्जुन, तेजस तथा कुछ अन्य परियोजनायें समय पर पूरी नहीं हो सकी हैं तथा कुछ मानकों पर खरी नहीं उतरी हैं.
१२-हल्के लडाकू ट्रेनिंग विमान की खरीद में अत्यधिक देरी, अन्य उपस्करों की खरीद में भी देरी.
१३-सेना में अधिकारियों की कमी-जिस देश में एक सौ बीस करोड़ लोग रहते हों वहां की फौज के लिये कुछ हजार युवाओं का न मिलना बड़े ताज्जुब की बात है. कई दफा योग्य नौजवानों को भी मिलिट्री बेस न होने के कारण सेवा में जाने का मौका नहीं मिल पाता. जहां सिपाही की भर्ती के लिये किलोमीटरों लम्बी लाइनें लगती हैं वहां अधिकारियों का अकाल.
१४-देशहित में कठोर निर्णय लेने की इच्छाशक्ति का अभाव, जिसके कारण पड़ोसी देशों से करोड़ों घुसपैठिये देश में आ जाते हैं और देश विरोधी गतिविधियां अंजाम देते हैं. ऊपर से तुर्रा यह कि उन्हें नागरिकता देने की मांग की जाती है.

अभी सिर्फ इतना ही.

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