सरकारी सस्ती दालों के पीछे छुपा अर्थ

दिल्ली सरकार ने फैसला किया है कि सस्ती दालों की बिक्री हेतु सरकार कुछ केन्द्र खोलेगी. फैसला अच्छा लग सकता है कि जहां अरहर की दाल सौ रुपये किलो बिक रही है वहां सरकार द्वारा खोले गये केन्द्रों पर दाल सत्तर रुपये प्रति किलो बिकेगी. इसी प्रकार हर बड़े शहर में व्यापार मंडल के नेता भी इसी तरह के केन्द्र खोलना प्रारम्भ कर देते हैं. अब इसके पीछे के सत्य को समझिये, सरकार लोगों के दिमाग में यह भर रही है कि जब सरकार सत्तर रुपये प्रति किलो दाल बेच रही है, इसका अर्थ यह है कि दाल के दाम इससे नीचे नहीं जा सकते. मतलब यह हुआ कि नब्बे रुपये और सौ रुपये बेचने वाले व्यापारी के कार्य को लीगेलाइज कर दिया, उसे वैधानिक मान्यता प्रदान कर दी. किसान ने तो दाल बेच दी पच्चीस-तीस रुपये किलो लेकिन वही दाल तीन-चार गुना कीमत पर बेची जा रही है, क्यों? जिन्होंने इसे स्टोर कर दिया, उन्हीं ने इसका अभाव उत्पन्न किया और फिर वही इससे लाभ उठा रहे हैं. क्या यह कालाबाजारी नहीं है. कृषि मन्त्री कह रहे हैं कि चीनी महंगी हो सकती है. करोडों टन चीनी, चीनी मिलों में रखी हुई थी, कहां से एकदम महंगाई एकाएक बढ़ जाती है. जो किसान गन्ना उगाता है, वह उगाना बन्द नहीं कर रहा, चीनी मिलें बन्द नहीं हो रहीं, सरकारी चीनी मिलों को छोड़कर. निजी क्षेत्रों में लगातार नई चीनी मिलें लगाई जा रही हैं, फिर यह एकाएक मंहगाई कैसे बढ़ जाती है??? इसके पीछे छुपे सत्य को समझिये. करोड़ों टन अनाज और चीनी कौन स्टोर कर सकता है, चीनी मिलें कौन लगा सकता है?? शायद इसके जानने के लिये किसी खास अध्ययन की आवश्यकता नहीं है. जरा विचारिये. दूसरी चीज देश में जब इतना अनाज है कि उसके स्टोरेज पर करोड़ों रुपया खर्च किया जा रहा है और एक समय तो यह हाल था कि अनाज को समुद्र में डालने तक पर विचार किया गया, अभी एक खबर पढ़ने को मिली कि कोलकाता में लाखों टन दाल सड़ रही है तो फिर मुझे इस लोकतन्त्र पर संदेह होने लगता है.

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