दौलत बढ़ाने का नायाब तरीका इनसे पूछिए

वैसे तो सत्ताधारी नेताओं के रिश्तेदारों तक की सम्पत्ति को कैबिनेट की गोपनीय जानकारी मान लिया गया है जिसके कारण मन्त्रियों तथा उनके रिश्तेदारों की सम्पत्ति को सूचना अधिकार के अन्तर्गत नहीं दिया जा सकता। आखिर इस सम्पत्ति और कैबिनेट में क्या सम्बन्ध हो सकता है? डरिये मत कैबिनेट किससे बनती है, मन्त्रियों से, मन्त्री कहां से आते हैं, सांसदों से, सांसद कहां से आते हैं, सत्ताधारी दल से. और अगर सत्ता में रहते हुये भी निर्धन रह गये तो मुई ऐसी सत्ता का फायदा क्या? हालांकि इस समय सभी प्रत्याशी अपनी सम्पत्ति की घोषणा कर रहे हैं जिसमें उनकी स्वयं की, पत्नी की तथा बच्चों के नाम सम्पत्ति का विवरण होता है, अधिकतर प्रत्याशियों से उनकी पत्नियों की सम्पत्ति अधिक है. मैं यह जानना चाहता हूं कि प्रत्याशियों से अधिक सम्पत्ति उनकी पत्नियों के पास कैसे हो गयी जबकि अधिकतर प्रत्याशियों की पत्नियां कोई व्यवसाय नहीं करतीं. अधिकतर मामलों में हमारे यहां यह होता है कि पति अधिकतर सम्पत्ति विभिन्न करों को बचाने या लाभ लेने की दृष्टि से अपनी पत्नी या बच्चों के नाम से क्रय करता है. एक तो इस बात की भी जांच हो कि इनकी पत्नियों के पास इतनी जायदाद कहां से आ गयी. दूसरा मैंने यह पाया कि पिछले चुनाव में अर्थात पांच साल पहले जो सम्पत्ति दिखाई गयी थी वह दस से बीस गुना तक बढ़ गयी, आखिर वह कौन सा जादुई चिराग है जिससे यह कारनामा होता है या वह कौन सा फार्मूला है जिसे अपनाने से सम्पत्ति में इतने कम समय में इतनी अधिक वृद्धि हो जाती है. यदि यह फार्मूला नेता गण सार्वजनिक कर दें तो देशवासियों का भला हो जाये.

रोज दर्जनों प्रत्याशियों के विरुद्ध आचार संहिता के उल्लंघन के कारण एफ०आई०आर० दर्ज हो रहीं हैं. लेकिन इससे फायदा क्या हो रहा है? क्या मामला दर्ज होने मात्र से ही आचार संहिता का उल्लंघन होना बन्द हो जायेगा? जिनके विरुद्ध मामले दर्ज भी हुये हैं वह और जोर शोर से आचार संहिता की धज्जियां उड़ा रहे हैं. जानते हैं कि सत्ता में आने पर या सांसद चुने जाने के बाद धीरे से मामले बन्द हो जायेंगे. हमारे देश में न्यायिक व्यस्तताओं के चलते तथा कानून में कोई समय-सीमा न बनाये जाने के कारण मामले काफी लम्बा खिंच जाते हैं जिसका पूरा लाभ यह नेता उठाते हैं. और फिर नोट के बदले वोट में बुराई भी क्या है. आप नैतिकता की दृष्टि से इसे गलत कह सकते हैं लेकिन आज की तारीख में नैतिकता बची कहां हैं, वह तो श्रद्धेय स्व० श्री लाल बहादुर शास्त्री जी के साथ ही देश से चली गई. जिस व्यक्ति ने एक दुर्घटना होने पर जिम्मेदारी लेते हुये त्यागपत्र दे दिया हो जिसने अपने बेटे को इसलिये रेल की सेवा में न जाने दिया हो कि वह स्वयं रेल मन्त्री है ऐसी नैतिकता किस के अन्दर थी और किसके अन्दर है? चूंकि दो अक्तूबर को गांधी जी का जन्मदिन होता है और संयोग से शास्त्री जी का भी इसलिये रस्म अदायगी भर कर ली जाती है. बाकी उनके नाम लेने से वोट नहीं मिलते, उनके खानदान की चर्चा से वोट नहीं मिलते इसलिये शास्त्री जी की तस्वीर भी कहीं नजर नहीं आती. मैं बात कर रहा था कि नोट और साड़ी बांटने पर आपत्ति क्यों, इसे तो बढा़वा देना चाहिये कि जो भी अधिक से अधिक धन देगा उसे वोट दिया जायेगा, कम से कम गरीब गुरबा को इसी बहाने कुछ तो हासिल हो. अगर सरकार बचाने के लिये गुप्त समझौते किये जा सकते हैं, समर्थन प्राप्ति के लिये मन्त्री पद और लाल बत्तियां दी जा सकती हैं तो इसमें फिर क्या बुराई है. क्या यह सिर्फ इसलिये गलत है कि नीचे वाला कमजोर है और सत्ता में नहीं है. अगर सरकार बचाने या बनाने को लेकर मन्त्रि-पद और लाल बत्तियां बांटी जायें तो वह उचित है और मतदाता के लिये नोट बांटना गलत है. राजनीतिक दल भी क्या करते हैं उनके एजेण्डा में जो दर्ज होता है क्या वह भी मतदाताओं को फुसलाने जैसा नहीं होता?

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