इस देश की हालत कभी नहीं सुधरेगी

इस देश की हालत कभी नहीं सुधरेगी. कारण नेता ईमानदार नहीं. अठारह साल की उम्र में युवक शादी नहीं कर सकता लेकिन वोट डाल सकता है. मतदान को अनिवार्य हमारे यहां के धूर्त नेता नहीं होने देंगे. नवयुवकों से भी कोई उम्मीद रखना बेमानी है, उन्हें गाड़ी, बंगला और बैंक-बैलेन्स नहीं चाहिये, उन्हें ईजी मनी नहीं चाहिये क्या. जब देश का प्रधानमन्त्री ही यह कहे कि अल्पसंख्यकों का संसाधनों पर पहला हक है तो बाकियों को अपने लिये देश से बाहर सुरक्षित ठिकाना खोजना प्रारम्भ कर देना चाहिये. वोटों के लिये यहां लोग अपने घर की महिलाओं को भी चौराहे पर नचा सकते हैं. मैंने आजतक सुनील दत्त-नर्गिस को हिन्दू और मुसलमान की दृष्टि से नहीं देखा, रफी साहब, नौशाद, तलत साहब, दिलीप कुमार, सुरैया, मधुबाला, हसरत जयपुरी, शकील बदायूंनी, एपीजे अब्दुल कलाम और भी न जाने कितनी ऐसी शख्सियते हैं जिनके बारे में मैं दावे से कह सकता हूं कि लोगों ने कभी भी इन्हें हिन्दू-मुस्लिम के नजरिये से नहीं देखा होगा. लेकिन ताज्जुब है कि संजय दत्त को पुलिस वालों ने इसलिये मारा कि वह मुस्लिम मां की औलाद थे. ७५० खरब रुपये स्विस बैंक में पड़े हैं लेकिन वापस कौन लाये, बहाने और कुतर्क अपने-अपने. जब एक पार्टी ने अपराधियों को टिकट दिया तो मैं भी क्यों न दूं, जब तुमने गलती की तो मैं क्यों न करूं, जब तुमने अच्छे काम नहीं किये तो मैं क्यों करूं. जब फिक्सिंग में लिप्त अजहर को टिकट दिया जा सकता है तो उस दल से अपेक्षा भी क्या की जा सकती है. टिकट भी दिया तो मुरादाबाद से जहां मुसलमान अधिकता में हैं, और यह है धर्म-निरपेक्षता कि आते ही आते गोल टोपी लग गयी. उलेमा-काउंसिल, टीटीके, इत्तिहाद, मुस्लिम लीग धर्म-निरपेक्ष हैं और हिन्दू हित की बात भी करने वाले सांप्रदायिक. राम दिल में हैं इसलिये उन्हें घर की क्या जरूरत, कुछ समय पहले तो मिथक बताया गया था. प्रभु ईसा-मसीह और अल्लाह के बारे में इस तरह की बात की जा सकती है क्या. लक्ष्मणानन्द सरस्वती के हत्यारों की मांग करना साम्प्रदायिकता है. चौरासी में जिन्दा जलाये गये सिखों के हत्यारे आजाद घूम रहे हैं, एक गवाह सामने आया भी तो एजेन्सी कहती है कि विश्वसनीय नहीं है. खुद एजेन्सी कितनी विश्वसनीय है, भगवान जाने. कभी मायावती पर शिकंजा तो कभी मुलायम पर तो कभी मामला वापस लेने की कवायद. बड़ा घोटाला करो, बच जाओ क्योंकि एजेन्सी उत्तर प्रदेश के खाद्यान्न घोटाले की जांच इसलिये नहीं कर सकती कि संसाधन नहीं हैं. इन्डियन जस्टिस पार्टी का उम्मीदवार अपनी हत्या होने की आशंका की शिकायत करता है, डीजीपी कहते हैं कि खुदकुशी की, गले नहीं उतरता. साठ साल हो गये देश को क्या मिला बंटवारे के अलावा. मिला, बंटवारे के अलावा. न पानी, न शिक्षा, न रोटी, न कपड़ा, न मकान, न स्वास्थ्य, मिला तो केवल बंटवारा. सबसे बड़ी चीज धर्म निरपेक्षता चश्मा अलग. बात बड़ी कि धर्म निरपेक्षता की आड़ में प्रो-मुस्लिम. गलती हिन्दुओं की जिनके पास दूरदृष्टि नहीं. शुतुरमुर्गी रवैया. वोट की कीमत नहीं पहचानी. मुसलमानों के साथ साठ सालों से अन्याय हो रहा. ज्ञान-चक्षु खुल गये. जिसने पहचानी वो आनन्द ले रहा. चुनाव आयोग रोज संहिता के उल्लंघन में रिपोर्ट दर्ज करा रहा लेकिन फायदा क्या. डाक्टर अपनी फीस खुद तय करे, वकील अपनी, कारखाने वाला अपनी, मजदूर अपनी, लेकिन किसान की पैदावार के दाम तय करती सरकार. वाह मेरा देश महान. सबसे ऊपर कोर्ट लेकिन फैसला पक्ष में न हो तो संविधान ही बदल डालो. तकलीफ यह कि नेताओं के मुद्दे लम्बे समय तक खिंचते हैं. दिग्विजय कहते हैं कि सीबीआई हमारी. करुणानिधि कहें कि प्रभाकरण मेरा दोस्त. भागलपुर के दंगे याद आ गये. पहले कोई गठबंधन नहीं, सब अलग-अलग, लेकिन बाद में सुविधानुसार हो जायेंगे. सत्ता पाने को कुछ भी हो सकता है. कुतर्क कभी भी गढ़े जा सकते हैं. जीतता नेता, हारता वोटर. नेता अभी कालीन हैं, बाद में ताड़ हो जायेंगे. भ्रष्टाचार हटाओ लेकिन कैसे. कौन सा अफसर नेता सड़क से नहीं गुजरता और किसे पुलिस के सिपाही वसूली करते नहीं दिखाई देते, लेकिन सबकुछ वैसे ही चलता रहता है. कोई भागीदारी करना नहीं चाहता, लेकिन हिस्सा बंटाने को तैयार है. अपना देश इसलिये अपना हिस्सा घर ले जाओ. सत्य क्या है, परिभाषायें अपनी अपनी. लेकिन बात ठीक है. इसलिये अपना अपना देखिये अपना हिस्सा बंटाइये.सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह कि कश्मीर में हिन्दुओं के धार्मिक प्रतीक हटवा दिये जाते हैं. अमरनाथ यात्रा पर जाते समय यात्रियों को बेवजह परेशान करने का मौका नहीं छोड़ा जाता और कहा जाता है कि यहां आते क्यों हो. जामा मस्जिद दिल्ली के पास एक मित्र महोदय अपना स्कूटर खड़ा कर एक सज्जन से मिलने जाते हैं. स्कूटर की स्टेपनी के कवर पर दुर्गा जागरण के प्रचार हेतु दुर्गा की तस्वीर बनी थी. छोटे-छोटे बच्चे आकर देखते हैं और देखते ही देखते कवर फाड़ देते हैं, उन मित्र महोदय से कहते हैं तुम हिन्दू हो? यह हाल है देश के पंथनिरपेक्ष स्वरूप का. लोग आत्म-मुग्ध हैं. देश अपनी राह लोग अपनी राह. देश एक है कानून एक लेकिन अप्लीकेबिलिटी के समय अलग-अलग. आदमी एक लेकिन कश्मीर, उत्तराखण्ड, हिमाचल और भी देश के कई हिस्सों में जमीन नहीं खरीद सकता. हर किसी का अपना एजेण्डा. देश सब के लिये लेकिन देश के लिये कोई नहीं. गलत को गलत और सही को सही कहना नहीं सिखाया, शिक्षित किया नहीं. देश का गौरवमयी इतिहास पढ़ाया नहीं. हमारा कैलेण्डर विदेशी से ५९ साल आगे लेकिन हम पिछड़ गये. गंगा-जमुनी से पीछे देखने की हिम्मत ही नहीं. वैदिक सभ्यता को किनारे लगा दिया. पतन बड़ी तेजी से हो रहा है. गर्त में गिरने को खुद तैयार. भगत भी सोच रहे होंगे कि आखिर इसी दिन के लिये सीस चढ़ाया था क्या?

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