कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन और खोया हुआ गाँव

पिछले कई वर्षों के बाद अपनी ननिहाल गया। गांव का माहौल बिल्कुल अलग लग रहा था. एक बहुत बड़ा सा बाग था जिसमें एक मन्दिर और एक कुंआ हुआ करता था. पता चला कि बाग तो सात-आठ साल पहले ही कटवा दिया गया था. इस बाग में आम, बेल, अमरूद, और जामुन के ढे़र सारे पेड़ हुआ करते थे, बेर-अनार और करौंदे की झाडियां भी थीं. अमर बेल भी थी और गिलोय भी. कुछ एक पेड़ पाकड़ के भी थे. गांव के लोग गर्मियों में इस बाग में दोपहर बिताया करते थे. हम लोग पेड़ पर चढ़ते और उतरते. आम, जामुन, बेर, बेल, अमरूद, अनार, करौंदे, बबूल, जंगल-जलेबी और भी पता नहीं कौन कौन से पेड़-पौधे लगे हुये थे. एक बहुत बड़ा सा नीम का पेड़ भी था जिसे भी कटवा दिया गया है. इस पेड़ की जड़ों से जानवर बांधे जाते थे. केले भी खूब खाने को मिलते, हर घर में ही केले लगे रहते.
मामाजी की घोड़ी भी बाग में बंधी रहती जिस पर एक बार हम छ: ममेरे-मौसेरे भाइयों ने सवारी करने का प्रोग्राम बनाया और छ: के छ: घोड़ी पर। बिना जीन और रकाब की घोड़ी के ऊपर हम लोग और फिर एक-एक कर सब घोड़ी से नीचे. भैंस की सवारी का भी आनन्द लिया करते. इस नीम के पेड़ के नीचे एक हैंडपम्प भी था जिसे सम्भवत: गुडिया बोला जाता था. यहां से मामा का घर सामने दिखाई देता था. बाहर दो बैलगाड़ियां खड़ी रहती, बैल पास ही में बंधे रहते. एक ओर पम्पिंग सैट खड़ा रहता. बैलगाडियों की सवारी भी खूब की और पम्पिंग सैट से नहाने का भी खूब आनन्द लिया. पास ही एक छोटी नदी बहती थी जिसमें अक्सर हम लोग नहाते थे और यहीं सिंचाई के लिये पम्पिंग सैट लगाया जाता तो और मजा आता. पानी की मोटी धार और एक बड़े से गड्ढे में हम लोग छ्प-छप कर खूब नहाते. घर पर दूध मिलता हंडिया का औटा हुआ, बिल्कुल लाल. दिनभर कंडे की आग से दूध गर्म होता रहता. और फिर इसी से तैयार हल्का लाल रंग लिया हुआ दही और मट्ठा. घी भी घर में ही तैयार होता था, दानेदार शुद्ध देसी घी, जिसे खिचड़ी में डाला जाता तो खाते समय एक अवर्णनीय सुख की प्राप्ति होती. आम बाग में बहुतायत में लगते तो आम का अचार भी खूब खाने को मिलता, तरह-तरह का अचार, खट्टा, मीठा, तेल में पड़ा हुआ, बिना तेल का.
सरसों से तेल भी निकलवाया और खल भी. दूर-दूर तक पीली-पीली सरसों. खाने के लिये सब कुछ अपने खेतों से ही मिलता. सुनहरे गेहूं. चावल, दाल, मक्का, ज्वार, बाजरा, सरसों, चना, गन्ना. चना और सरसों का साग खूब खाया जाता. अरबी के बड़े-बड़े पत्ते अपनी ओर खूब खींचते। छप्पर पर लौकी, तुरई और कद्दू की बेलें छाई रहतीं. गन्ने के खेतों में जाकर गन्ने तोड़कर खाने में खूब मजा आता. बाग में कोल्हू भी लगता जिस पर गुड़ और राब तैयार होती बिना किसी एडिटिव और प्रिसरवेटिव के. बाग में मन्दिर में भजन-कीर्तन भी होता और आल्हा भी खूब गाया जाता. इसी समय बारटर सिस्टम को भी देखा था कि अनाज दो और बर्फ ले लो, बर्फ जिसमें नारियल पड़ा रहता. बाइस्कोप भी देखने को मिलता, बाइस्कोप वाला डुगडुगी बजाता और बच्चे हाजिर. बन्दर-भालू के तमाशे वाला मदारी और कभी कभी संपेरे भी आते. चना-परमल गांव में ही भुनाया जाता और सत्तू भी खूब खाने को मिलता, मन्दिर वाले कुंए से ठंडा पानी आता और चीनी-नमक डालकर सत्तू तैयार. कुंआ जो पहले पूरे गांव के लिये पानी देता अब सूख चुका है, उसमें अब गांव वाले कूड़ा डालते हैं.
यहीं पर दो इमली के पेड़ भी थे, जिसमें उल्लू आकर बैठते थे, हालांकि उस समय उल्लू को कोई मारता नहीं था। इमली लगतीं और फिर नीचे से लम्बे से डंडे में एक छोटी सी खपच्ची बांध कर उन्हें तोड़ा जाता. आज दोनों पेड़ सूख कर खत्म हो गये हैं. उन दिनों एक शगल और होता, मिट्टी से खिलौने बनाने का.गीली मिट्टी लाते और तरह-तरह की चीजें बनाते. बेल के खाली छिल्के से लट्टू बनाया जाता और उसमें छेद किया जाता जिससे घूमते समय तेज आवाज निकलती. साइकिल का टायर चलाना या फिर लोहे का छोटा पहिया दौड़ाना ऐसे ही कुछ खेल होते हम सब भाइयों के. बरसात में और मजा आता, हम लोग खूब नहाते, तालाबों में पानी भर जाता और फिर इस समय ही जहां गांव भर का कूड़ा पड़ता वह अच्छी खाद में तब्दील हो जाता.
मेंढक खूब टरटराने लगते, गड्ढों में पानी भर जाता। जब पानी बरसना बन्द हो जाता तो हम लोग फिर कागज की नावें चलाते. नीचे जमीन से सीपी और शंख निकलते, जिन्हें हम इकट्ठा करते. बरसात में धुलकर पेड़-पौधे चमकने लगते. मिट्टी से उठती सोंधी-सोंधी खुशबू और बाग में नीचे पड़े लाल हरे पत्ते और फल-फूलों से उठती महक एक अलग सा ही वातावरण पैदा करती थी. यद्यपि रात में बिजली नहीं होती लेकिन बिल्कुल डर नहीं लगता, एक दिया जलता रहता रात भर. शाम को लालटैन और पेट्रोमैक्स जलाई जाती. आकस्मिक व्यवस्था के नाम पर चार सेल वाली पीतल की टार्च होती. संचार के नाम पर डाकिया ही एक मात्र साधन था, जिसका बेसब्री से इन्तजार रहता. रेडियो मनोरंजन का उत्तम साधन था.
गांव से तीन किलोमीटर दूर दक्षिण में एक छोटा सा जंगल था लगभग सात-आठ किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ, जो अधिक घना तो नहीं था लेकिन छोटे जानवरों के लिये अभ्यारण्य की तरह था. इस जंगल में नीलगाय, हिरन, खरगोश, लोमड़ी, बन्दर, गोह तथा कबूतर, तोते, कौये, अबाबील और कुछ प्रजातियों के सांप भी पाये जाते. इस बार जब गया तो पता चला कि एक नेता-कम-फार्मर ने उस जंगल को धीरे-धीरे साफ कर दिया और शिकारियों ने उस जंगल के जानवरों का शिकार कर लिया. उस जंगल के साफ होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हुआ कि जंगल से बन्दरों को छोड़ कर सारे जानवर मार दिये गये. बन्दर इसलिये बच गये कि नेता-कम-फार्मर बजरंग बली के भक्त हैं. लेकिन इससे हुआ यह कि बन्दर जो पहले जंगल में ही सीमित रहते थे अब आसपास के गांवों में जाते हैं. लोगों के कपड़े-बर्तन उठाते हैं, खाने-पीने की चीजें उठा ले जाते हैं और कभी-कभी लोगों को काट भी लेते हैं. जब मनुष्य स्वयं ही उनके निवास पर कब्जा कर रहा है तो फिर आखिर ये बेजुबान जायें तो जायें कहां. खायें तो खायें क्या. दुखद पहलू यह है कि लोग (बल्कि आदमी के वेश में हैवान)बढ़ते जा रहे हैं और जानवर खत्म होते जा रहे हैं. पर्यावरणीय असन्तुलन लगातार बढ़ रहा है, मानव लगातार स्वार्थपूर्ति में लिप्त है. पहले न मोबाइल था, न कम्प्यूटर, न टीवी और न इन्टरनेट लेकिन जिन्दगी आसान थी. अब तमाम दुनियावी चीजें आसानी से हासिल हैं लेकिन जिन्दगी कठिनतर होती जा रही है और इस सबके बीच मानवता खोती जा रही है. ननिहाल का वह गांव भी इस आधुनिकीकरण के दौर में कहीं खो गया है.

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