मंगल ग्रह वासियों की निगाह में चुनाव

मंगल ग्रह के प्राणियों ने एक बार गलती से अपनी दूरबीन का मुंह पृथ्वी की तरफ मोड़ दिया, उस पर कोढ़ पर खाज यह कि उस दूरबीन के दायरे में भारत आ गया. ऊपर से उन दिनों आम चुनाव होने वाले थे. भारत झंडों, बैनरों, पोस्टरों से पट गया था. टैम्पो हाई हो रहा था, गली-गली में शोर हो रहा था. किसी-किसी स्थान पर लोगों की भीड़ इकठ्ठी हो रही थी और कहीं-कहीं लोगों का एक रेला सा जाता दिखाई दे रहा था. मंगल ग्रह के प्राणी ने जल्दी से अपने इर्द-गिर्द के प्राणियों को आवाज दी और उन्हें भी यह दुर्लभ नजारा दिखाया. जब उन प्राणियों की समझ में कुछ नहीं आया तो फिर वह उसी पृथ्वी रिटर्न मंगली के पास गये और उसे सम्पूर्ण किस्सा बताकर इसके विवेचन की प्रार्थना की.

पृथ्वी रिटर्न मंगली ने अपने साथियों पर एक उड़ती नजर डाली और बिल्कुल ऐसी नजरों से देखा जैसे कि अमेरिका से कोई प्रवासी भारतीय वापस भारत आकर अपने साथियों को देखता है. उसने बताना प्रारम्भ कर दिया-"अभी-अभी आप लोगों ने पृथ्वी के जिस हिस्से को देखा वह भारत है, जैसा कि मैं बता चुका हूं कि प्रवास के दौरान मेरा ठिकाना भारत ही था. इस देश भारत में पंचायती व्यवस्था लागू है, अर्थात यहां का शासक जनता के द्वारा चुनाव के माध्यम से चुना जाता है. चुनाव एक अर्धकुम्भ मेले की तरह है जो हर पांच साल में तो आता ही आता है. कभी कभी यह पांच साल से पहले भी आ जाता है. एक बार तो यह मात्र तेरह ही दिनों में आ गया था. इस चुनाव में कोई भी भाग ले सकता है, शरीफ-बदमाश, पढ़ा-लिखा-अनपढ़, स्त्री-पुरुष, काला-गोरा, पतला-मोटा. यह अलग बात है कि भारत में चपरासी की नौकरी के लिये कम से कम आठवां पास होना जरूरी होता है लेकिन बड़े-बड़े अफसरों का मालिक बनने के लिये कुछ भी पास होना जरूरी नहीं होता. यदि कोई व्यक्ति किसी अभियोग में लिप्त पाया जाता है तो वह नौकरी नहीं पा सकता लेकिन चुनाव के लिये इसका उलटा है. चुनाव में हिस्सा लेने के लिये यह विशेष योग्यता रखने जैसा है, जिस पर जितने अधिक अभियोग पंजीकृत होते हैं, उसे उतनी ही अधिक वेटेज मिलती है. हत्या-लूट-आगजनी के जितने अधिक मुकदमे जिस पर दर्ज होते हैं वह उतना ही अधिक मजबूत माना जाता है."

बीच में एक अन्य प्राणी ने टोका-"लेकिन हमारे यहां तो ऐसे लोगों को एन्ड्रोमीडा के ब्लैक होल में फेंक दिया जाता है". उसने अब फिर से बोलना प्रारम्भ किया-"दर-अस्ल यह भारतीय लोकतन्त्र की विशेषता है कि यहां के चुनाव की वैतरणी जो भी अपराधी पार कर जाता है उस पर लगे हुये सारे इलजाम ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे मई-जून की गर्मी में उत्तर प्रदेश से बिजली. उसके विरुद्ध कोई गवाह सामने नहीं आता, आता भी है तो या तो पलट जाता है या फिर पलट ही जाता है. फिर इन्वेस्टीगेशन अफसर मामले को इस तरह प्रस्तुत करता है कि ऐसा लगता है कि माननीय़ पर जिसने भी आरोप लगाये हैं वह खुद ही अपराधी है. चुनाव की इस वैतरणी में खूब पैसा बरसता है. जिसे जो चाहिये सो मिलता है. आम जनता को वादे ही वादे मिलते हैं, झूठे वादे, सच्चे वादे, अच्छे वादे, नकद वादे, उधार वादे. इस की एक खूबी यह भी है चुनाव आते ही बेरोजगारों को रोजगार मिल जाता है. झंडे-बैनर-बिल्ले-पोस्टर बनाने वालों की चांदी हो जाती है, जो दीवालें बरसों से पुती नहीं होती हैं उनपर मुफ्त में पुताई हो जाती है और पुती हुई दीवालों पर विभिन्न प्रकार की चित्रकारी हो जाती है चुनाव की कृपा से. चुनाव के समय कुछ जवान लड़कों को बाहुबल के दम पर वोट डलवाने का काम मिल जाता है. गरीब वोटरों को उनके वोट के बदले साड़ी-कम्बल-दारू-रुपये मिल जाते हैं. जाति और धर्म भी मिल जाता है.

इस समय राजनीतिक दल रैली-महारैली-रैला-महारैला करते हैं जिसमें नेता अपना टैम्पो हाई दिखाने के लिये दिहाड़ी पर मजदूरों को लाते हैं जिससे मजदूरों को भी कुछ दिनों के लिये रोजगार मिल जाता है. रिक्शे वालों को, टैन्ट वालों, साउंड सिस्टम वालों को भी काम मिल जाता है, एड कम्पनियों का भी भला हो जाता है. गुंडे-मवाली-दादाओं की भी पौ-बारह हो जाती है. चुनाव के समय हर लड़ाकू (उम्मीदवार) कालीन बन जाता है और सेवक होने का दावा तथा सेवा करने का वादा करता है वह भी हर घर जाकर. यह अलग बात है कि जीतने के बाद सेवक शासक में बदल जाता है फिर उससे मिलने में रियाया के सभी घोड़े खुल जाते हैं. उम्मीदवारों के पास कोई धन-दौलत नहीं होती, लेकिन जीतने के बाद उनके ऊपर लक्ष्मी की कृपा बरसने लगती है. इस समय काला धन बहुत काम आता है, बल्कि यह समझिये कि अगर चुनाव न होते तो काला धन रखा-रखा खराब हो जाता. बड़ी कम्पनियां इस समय सभी पार्टियों को धन देकर ओब्लाइज होती हैं इस समय बागी उम्मीदवारों की भी बन आती है, उन्हें चुनाव से हटाने/बिठाने के लिये ओब्लाइज किया जाता है, कभी-कभी वोट-कटवा उम्मीदवार भी खड़ा किया जाता है जो सामने वाले का वोट काटता है. इस समय सरकारी कर्मचारियों की तबियत खराब होने लगती है, एक तो घर से तीन दिन दूर रहने का डर, ऊपर से इस बात का कोई भरोसा नहीं कि गड़्ढ़ायुक्त सड़क पर जबरदस्ती लगाये गये ट्रक को ड्राइवर कहां पलट दे और अगर इस से बच भी जाये तो न जाने कौन उम्मीदवार या उनके प्रतिनिधि कान के नीचे दो-चार लगा दे.

इस समय नेताओं के दल भी खूब बदलते हैं दिल बदलने की ओट लेकर. एक दूसरे को गरियाते हुये नेता, एक दूसरे की मां-बहन से नजदीकी रिश्ते बनाते नेता एक दूसरे के करीब आ जाते हैं, गलबहियां करने लगते हैं. तो इस समय बरसों से भाई-बहन का रिश्ता निभाने वाले भी कभी-कभी दूर हट जाते हैं, जूतम-पैजार तक की नौबत आ जाती है. कौन सा दल किस का मित्र है, किस प्रदेश में मित्र है, किस में घोर शत्रु, किस से अभी गठबंधन है और किस से चुनाव बाद होगा, बड़े से बड़े ज्ञानी की समझ में भी नहीं आ सकता. कई दफा तो ऐसा भी हो जाता है कि चुनाव से पहले का दोस्त चुनाव के बाद का दुश्मन बन जाता है. और यह चुनाव हर जगह पाया जाता है, संसद के लिये, विधान सभा के लिये, राष्ट्रपति के लिये, प्रधानमंत्री के लिये, मुख्यमन्त्री के लिये, मेयर के लिये, सभासद के लिये जिला पंचायत के लिये, नगर पंचायत के लिये, ग्राम पंचायत के लिये, व्यापार मंडल के लिये, सरकारी कर्मचारी की यूनियनों के लिये, श्रमिक संगठनों के लिये, छात्र संघों के लिये, विश्वविद्यालयी शिक्षकों के लिये, डाक्टरों के लिये, मास्टरों के लिये, ड्राइवरों के लिये और भी पता नहीं किस-किस के लिये (भारत के इमरान हाशमी वाले किस के लिये नहीं). इस समय हर पार्टी अधिक से अधिक वादे लहराकर मतदाता की बुद्धि फेरने की कोशिश करती है. जब चुनाव पूरे हो जाते हैं तो लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पूरा विश्वास रखते हुये सांसद-विधायक नेता चुनने की जगह (जो भारत के संविधान में निर्दिष्ट है) पार्टी के अध्यक्ष को यह अधिकार दे देते हैं और फिर अध्यक्ष स्वयं को या अपने पुत्र-पुत्री-भाई-भतीजे को राजगद्दी सौंप देता है. इस प्रकार एक दिन के लिये प्रजा राजा बन जाती है और एक दिन के बाद औकात में आ जाती है, फिर पांच साल के लिये फुर्सत पा जाती है. और फिर इस तरह से लोकतान्त्रिक व्यवस्था का पूरा निर्वहन हो जाता है."

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