बाबा रामदेव द्वारा भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की स्थापना और उन पर लगाये गए आरोप
पिछले दिनों बाबा रामदेव द्वारा भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की स्थापना की गई जिसका मुख्य उद्देश्य भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिये कार्य करना है। एक वेब-पत्रिका पर बाबा रामदेव के इस कदम के बारे में काफी विस्तृत जानकारी दी गयी थी. जाहिर है कि इस लेख पर लोगों ने टिप्पणियां भी की थीं. कुछ टिप्पणियों में यह कहा गया था कि बाबा लूट रहे हैं, बाबा ने इतने करोड़ रुपया कमा लिया है, उनकी फार्मेसी का टर्न-ओवर इतना है. बाबा हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं,बाबा ने चार-छ: कलाबाजी सीख ली हैं, बाबा प्रोपेगैण्डा कर रहे हैं और बाबा अब राजनीति में आकर सत्ता कब्जाना चाहते हैं. मैं ऐसे व्यक्तियों से कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूं :-
ऐसे कितने लोग हैं जो स्वयं या अपने बच्चों को बाबा की भांति बनाना चाहेंगे.
ऐसे कितने लोग हैं जो अपने शारीरिक, भौतिक और सामाजिक सुखों को त्यागना चाहेंगे.
क्या फार्मेसी चलाना कोई गुनाह है.
क्या ये लोग बतायेंगे कि बाबा ने किसके लिये इतने रुपये इकठ्ठा किये.
क्या इन लोगों को नहीं पता है कि हरिद्वार में कितना बड़ा चिकित्सालय-विश्वविद्यालय बाबा ने बनाकर खड़ा किया है
क्या बाबा जबरदस्ती लोगों के हाथ में दवाईयां पकड़ा देते हैं और उनसे रुपये छीन लेते हैं.
क्या बाबा की तरह ये लोग भी चार-छ: कलाबाजी सीखेंगे और इसी तरह धन पैदा करना प्रारम्भ करेंगे.
क्या योग और आयुर्वेद से किसी को भी लाभ नहीं हुआ है.
क्या इन लोगों को यह दिखाई नहीं देता कि बाबा के शिविरों में आधुनिक मेडीकल शिक्षा से सम्बन्धित लोगों को बुलाकर वैज्ञानिक परीक्षण कराये गये जिसमें लोगों को योग से हुआ लाभ स्पष्ट होता दिखाई दिया.
यदि आज बाबा गुमनामी में रह रहे होते तो क्या विश्व भर के लोगों को योग व आयुर्वेद का लाभ मिला होता.
क्या ओम का निशान लगाना धर्म-परिवर्तन और प्रचार-प्रसार करना है.
क्या ये व्यक्ति बतायेंगे कि कितने लोगों को धर्म-परिवर्तन बाबा ने कराया है.
क्या इन लोगों को यह भी दिखाई नहीं देता कि कुछ यूरोपीय देशों में पाकिस्तानी मूल के कुछ मुस्लिम व्यक्तियों ने भी योग से लाभ प्राप्त किया है.
क्या राजनीति गुण्डे-बदमाशों की शरणस्थली मात्र है.
क्या संत-सम पुरुषों को राजनीति में आने का कोई हक नहीं है.
क्या राजनीति में शुचिता का होना आवश्यक नहीं है.
क्या भ्रष्टाचार के विरुद्ध बाबा ने बिगुल बजाकर कोई गलत काम किया है.
भारत की गुलामी के पीछे भी ऐसे ही कुविचारी व्यक्तियों का होना ही था, जो अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिये किसी भी हद तक गिर सकते थे. मैं चुनौती देना चाहता हूं कि ऐसे व्यक्ति मात्र पन्द्रह दिन तक ही बाबा की वेश-भूषा और दिनचर्या अपनाकर दिखायें. दर-असल बाबा ने प्राचीन भारतीय विधाओं को दुनिया में जिस ऊंचाई तक पहुंचा दिया है और जो लोकप्रियता हासिल की है उससे कुछ लोग बौखला गये हैं और इसीलिये अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं. उन्हें यह भी लगता है कि बाबा यदि राजनीति में आ गये तो राजनीति के बड़े-बड़े गढ़ ढह जायेंगे, और यदि कहीं बाबा जैसी मानसिकता वाले लोग राजनीति में आ गये तो सांप्रदायिकता, जातिवाद और भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त हो जायेगा, लिहाजा ये लोग विभिन्न माध्यमों से बाबा के विरुद्ध ओछी राजनीतिक चालें चल रहे हैं और उनकी छवि को दाग लगाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सूर्य को कुहरा निगल नहीं सकता.
मेरे कुछ मित्र इसी तरह की बातें कुछ महापुरुषों तथा वर्तमान के कुछ हिन्दू धर्माचार्यों के बारे में कहते थे, मैंने उनसे पूछा कि क्या ये धर्माचार्य हमें यह सिखाते हैं कि लड़ो-मरो या पतित बनाने के उपदेश देते हैं अथवा धनोपार्जन के लिये नाजायज तरीके अपनाने की शिक्षा देते हैं, उनके मना करने पर मैंने उनसे कहा कि यदि ये अच्छी बातें कहते हैं तो फिर क्या परेशानी है. उन्होंने फिर कहा कि इनका लाइफ-स्टाइल, ये स्वयं महंगी गाड़ियों में चलते हैं, एसी में रहते हैं, मैंने फिर पूछा कि पन्द्रह-बीस वर्ष पहले इनका क्या हाल था, उन्होंने फिर बताया कि ऐसे रहते थे, वैसे रहते थे. मैंने फिर उनसे पूछा कि आप की उम्र अभी इतनी ही है जितनी कि उनकी पन्द्रह-बीस वर्ष पहले थी, क्या आप उनका पन्द्रह-बीस वर्ष पहले का लाइफ-स्टाइल अपनाकर उनकी तरह शुरुआत करना चाहोगे जिससे कि आप भी पन्द्रह वर्ष बाद एसी और गाडियों का मजा उठा सको, जाहिर है कि उनका उत्तर नकारात्मक था. इस पर मैंने उनसे कहा कि यदि ये व्यक्ति कोई अवैध काम करें, कोई गैर-कानूनी-देशविरोधी काम करें तो न केवल उनकी आलोचना की जाये बल्कि उन्हें कानून के हवाले भी किया जाये लेकिन केवल इसलिये कि जीवन की संध्या में उनका रहन-सहन उच्च दर्जे का हो गया इसलिये वे आलोचना के हकदार नहीं बनते. फिर नीर-क्षीर-विवेक को क्यों न अपनाया जाये.
आजादी के आस-पास तक लोग यह आकांक्षा रखते थे कि उनके यहां भी भगत सिंह जैसा सपूत हो, बाद के वर्षों में यह होने लगा कि भगत सिंह पैदा तो हो लेकिन पड़ोसी के यहां और अब यह हालत है कि पड़ोस में कोई अच्छे काम भी करने लगे तो पेट में दर्द होने लगता है कि भला कोई अच्छा काम आखिर कर क्यों रहा है.
ऐसे कितने लोग हैं जो स्वयं या अपने बच्चों को बाबा की भांति बनाना चाहेंगे.
ऐसे कितने लोग हैं जो अपने शारीरिक, भौतिक और सामाजिक सुखों को त्यागना चाहेंगे.
क्या फार्मेसी चलाना कोई गुनाह है.
क्या ये लोग बतायेंगे कि बाबा ने किसके लिये इतने रुपये इकठ्ठा किये.
क्या इन लोगों को नहीं पता है कि हरिद्वार में कितना बड़ा चिकित्सालय-विश्वविद्यालय बाबा ने बनाकर खड़ा किया है
क्या बाबा जबरदस्ती लोगों के हाथ में दवाईयां पकड़ा देते हैं और उनसे रुपये छीन लेते हैं.
क्या बाबा की तरह ये लोग भी चार-छ: कलाबाजी सीखेंगे और इसी तरह धन पैदा करना प्रारम्भ करेंगे.
क्या योग और आयुर्वेद से किसी को भी लाभ नहीं हुआ है.
क्या इन लोगों को यह दिखाई नहीं देता कि बाबा के शिविरों में आधुनिक मेडीकल शिक्षा से सम्बन्धित लोगों को बुलाकर वैज्ञानिक परीक्षण कराये गये जिसमें लोगों को योग से हुआ लाभ स्पष्ट होता दिखाई दिया.
यदि आज बाबा गुमनामी में रह रहे होते तो क्या विश्व भर के लोगों को योग व आयुर्वेद का लाभ मिला होता.
क्या ओम का निशान लगाना धर्म-परिवर्तन और प्रचार-प्रसार करना है.
क्या ये व्यक्ति बतायेंगे कि कितने लोगों को धर्म-परिवर्तन बाबा ने कराया है.
क्या इन लोगों को यह भी दिखाई नहीं देता कि कुछ यूरोपीय देशों में पाकिस्तानी मूल के कुछ मुस्लिम व्यक्तियों ने भी योग से लाभ प्राप्त किया है.
क्या राजनीति गुण्डे-बदमाशों की शरणस्थली मात्र है.
क्या संत-सम पुरुषों को राजनीति में आने का कोई हक नहीं है.
क्या राजनीति में शुचिता का होना आवश्यक नहीं है.
क्या भ्रष्टाचार के विरुद्ध बाबा ने बिगुल बजाकर कोई गलत काम किया है.
भारत की गुलामी के पीछे भी ऐसे ही कुविचारी व्यक्तियों का होना ही था, जो अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिये किसी भी हद तक गिर सकते थे. मैं चुनौती देना चाहता हूं कि ऐसे व्यक्ति मात्र पन्द्रह दिन तक ही बाबा की वेश-भूषा और दिनचर्या अपनाकर दिखायें. दर-असल बाबा ने प्राचीन भारतीय विधाओं को दुनिया में जिस ऊंचाई तक पहुंचा दिया है और जो लोकप्रियता हासिल की है उससे कुछ लोग बौखला गये हैं और इसीलिये अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं. उन्हें यह भी लगता है कि बाबा यदि राजनीति में आ गये तो राजनीति के बड़े-बड़े गढ़ ढह जायेंगे, और यदि कहीं बाबा जैसी मानसिकता वाले लोग राजनीति में आ गये तो सांप्रदायिकता, जातिवाद और भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त हो जायेगा, लिहाजा ये लोग विभिन्न माध्यमों से बाबा के विरुद्ध ओछी राजनीतिक चालें चल रहे हैं और उनकी छवि को दाग लगाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सूर्य को कुहरा निगल नहीं सकता.
मेरे कुछ मित्र इसी तरह की बातें कुछ महापुरुषों तथा वर्तमान के कुछ हिन्दू धर्माचार्यों के बारे में कहते थे, मैंने उनसे पूछा कि क्या ये धर्माचार्य हमें यह सिखाते हैं कि लड़ो-मरो या पतित बनाने के उपदेश देते हैं अथवा धनोपार्जन के लिये नाजायज तरीके अपनाने की शिक्षा देते हैं, उनके मना करने पर मैंने उनसे कहा कि यदि ये अच्छी बातें कहते हैं तो फिर क्या परेशानी है. उन्होंने फिर कहा कि इनका लाइफ-स्टाइल, ये स्वयं महंगी गाड़ियों में चलते हैं, एसी में रहते हैं, मैंने फिर पूछा कि पन्द्रह-बीस वर्ष पहले इनका क्या हाल था, उन्होंने फिर बताया कि ऐसे रहते थे, वैसे रहते थे. मैंने फिर उनसे पूछा कि आप की उम्र अभी इतनी ही है जितनी कि उनकी पन्द्रह-बीस वर्ष पहले थी, क्या आप उनका पन्द्रह-बीस वर्ष पहले का लाइफ-स्टाइल अपनाकर उनकी तरह शुरुआत करना चाहोगे जिससे कि आप भी पन्द्रह वर्ष बाद एसी और गाडियों का मजा उठा सको, जाहिर है कि उनका उत्तर नकारात्मक था. इस पर मैंने उनसे कहा कि यदि ये व्यक्ति कोई अवैध काम करें, कोई गैर-कानूनी-देशविरोधी काम करें तो न केवल उनकी आलोचना की जाये बल्कि उन्हें कानून के हवाले भी किया जाये लेकिन केवल इसलिये कि जीवन की संध्या में उनका रहन-सहन उच्च दर्जे का हो गया इसलिये वे आलोचना के हकदार नहीं बनते. फिर नीर-क्षीर-विवेक को क्यों न अपनाया जाये.
आजादी के आस-पास तक लोग यह आकांक्षा रखते थे कि उनके यहां भी भगत सिंह जैसा सपूत हो, बाद के वर्षों में यह होने लगा कि भगत सिंह पैदा तो हो लेकिन पड़ोसी के यहां और अब यह हालत है कि पड़ोस में कोई अच्छे काम भी करने लगे तो पेट में दर्द होने लगता है कि भला कोई अच्छा काम आखिर कर क्यों रहा है.
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