सीबीआई की विश्वसनीयता पर फिर प्रश्नचिन्ह

सीबीआई की विश्वसनीयता पर फिर प्रश्नचिन्ह। मुलायम का मामला हो या माया का या फिर अन्य दलों के राजनीतिक दलों के नेताओं के मामले हों, उच्चतम न्यायालय की लताड़ बताती है कि सीबीआई को राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम करना पड़ता है.निठारी कांड में फैसला हुआ, सीधे शामिल दोषियों को फांसी हुई, सीबीआई के खाते में सफलता जुड़ी़, अच्छा लगा. एक अहम सवाल इससे जुड़ा हुआ यह है कि जिन सरकारी अधिकारियों और पुलिस के जिन अफसरों ने इन्हें बचाने की कोशिश की, उन्हें अभियुक्त क्यों नहीं बनाया गया? पंधेर को लेकर इतनी उदार क्यों है सीबीआई? लेकिन बोफोर्स के अभियुक्तों को निकलने का मौका किसने दिया और क्यों दिया? सिखों का नरसंहार का मामला ही देखिये, गवाह कहता है मैं गवाही देने के लिये तैयार हूं, लेकिन सीबीआई को गवाह का ही पता नहीं चलता. चारा कांड में असली गुनहगार अभी तक क्यों बचे हैं. लखूभाई पाठक का मामला हो या पनडुब्बी, सेंट कीट्स हो स्टैम्प घोटाला, नेता क्यों बच रहे हैं. तेलगी के नार्को-एनालिसिस में उसने जिन नेताओं के नाम लिये उन्हें अभियुक्त क्यों नहीं बनाया गया? ए०पी०सिंह पूर्व आई०ए०एस अधिकारी के मामले की जांच कर रहा सीबीआई के इन्स्पेक्टर की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी? आरुषि हत्याकांड क्यों नहीं खुल सका? जिस अस्पताल से आरुषि की पोस्टमार्टम रिपोर्ट गायब हुई, जिन सरकारी लोगों ने जाने-अनजाने सबूतों से छेड़छाड़ की उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई की गयी? और यह तो हर किसी को पता है कि निठारी कांड में मारे गये बच्चों में जाने कितनों की तो प्रथम सूचना रिपोर्ट ही दर्ज नहीं की गयी?

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