पिंक पैन्टी, पब काण्ड पर कुछ और

मैं अपनी एक पोस्ट में "एक बेवकूफी की कुछ लड़कियों ने" की जगह "एक और बेवकूफी की कुछ लड़कियों ने" लिख गया था, जिस पर घुघूती जी ने अपनी टिप्पणी के द्वारा मेरा ध्यान आकृष्ट किया और मैंने तुरन्त क्षमा मांगतेहुये सुधार किया। कविता जी ने मेरी टैग लाइन "बराबरी का पैमाना" के बारे में लिखते हुये यह कहा कि मैं स्वयं तोबराबरी चाहता हूं लेकिन लड़कियों के मामले में मैं एकतरफा व्यवहार कर रहा हूं. मैं केवल लड़कियों बल्किलड़कों के भी नशा करने के सख्त खिलाफ हूं. क्या लड़के मदिरापान करते हैं तो उन्हें नशा नहीं होता? शराब पीने केसम्बन्ध में मुझे एक सज्जन ने एक बड़ी मजेदार बात बताई. उन्होंने कहा कि कुछ लोग मदिरा पान को यहकहकर जायज ठहराते हैं कि वे इसे नशे के लिये नहीं आनन्द के लिये पीते हैं. उन्होंने कहा कि यदि नशे के लियेनहीं पीते हैं तो फिर दूध-मट्ठा क्यों नहीं पीते. दूध-मट्ठे से भी नशा नहीं होता और फिर अगर नशा हो तो शराबपर इतना व्यय किस लिये? आनन्द के लिये तो दूध भी पिया जा सकता है और छाछ भी. मेरा कहना भी यही है किशराब सेवन कर पब और बार से नशे में वापस लौटना लड़के-लड़कियों दोनों के लिये ही गलत है. श्रीमान सुरेशचिपलूनकर की पोस्ट पर तथा शास्त्री जेसी फिलिप महोदय के इसी संबंध पर कई लोगों ने अलग-अलग टिप्पणियांकी. लोकतन्त्र की यही विशेषता है कि यहां असहमति को भी उतनी ही आजादी है जितनी कि सहमति को. कुछटिप्पणियां बहुत रोचक थीं, कुछ का उत्तर मैं भी देना चाहता हूं. (राम सेना के लोगों द्वारा किये गये दुर्व्यवहार कीघोर निन्दा करते हुये तथा इन पर कठोर कार्रवाई के पक्ष में) कुछ लोगों को चड्डी भेजने में कोई खराबी नहीं दिखाईदेती - क्या हम लोग घर पर भी असहमत होने पर चड्डी-कंडोम देते हैं. ऐसा कौन सा बाप है भारत में (एक्सेपशन्सको छोड़ दें) जो (पुत्रियां तो छोड़िये) पुत्रों को भी नशा करने और अनैतिक संबंध बनाने के लिये शाबासी देगा. दुहराचरित्र तो यहां के नब्बे प्रतिशत लोगों की विशेषता है और यह उन कारणों में से एक है जिसके कारण भारत गुलामबना. व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर भी खतरा बताया कुछ बन्धुओं ने. प्रश्न यह है कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की भी कोईसीमा होना चाहिये या नहीं. यदि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता असीमित है तो फिर नियम-कानून सब बेमानी हैं, सबअनावश्यक हैं, क्योंकि हर व्यक्ति की नजर में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की परिभाषा अलग-अलग होगी और इन सबको इकट्ठा कर सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता. मैं फिर लौटकर आजादी पर आता हूं कि इस तरह के पढ़ेलिखे व्यक्ति अगर उस समय होते तो आजादी कदापि नहीं मिलती (यद्यपि अभी भी अधूरी है), क्योंकि एक काफीबड़ा तबका सम्भवत: यह कहते हुये पाया जाता कि अंग्रेजों के शासन में क्या बुराई है. हर पद पर अंग्रेज थोड़े हीकाबिज हैं, वे तो सिर्फ कुछेक पदों तक ही सीमित हैं. फिर उन्होंने हमें कानून-व्यवस्था का पाठ पढ़ाया है. उन्होंने हीअधिकतर आधुनिक आविष्कार किये हैं. उन्होंने ही हमें मुगलों से आजाद किया है, वगैरा-वगैरा. कुछ दिनों बाद वहलोग ही आदर्श और आधुनिक समझे जायेंगे जो अपनी बेटी के मासिक-धर्म की तिथि जानते होंगे और जो उसकेलिये कंडोम खरीदने के लिये अलग से पैसे दिया करेंगे और उससे यह पूछने में समर्थ होंगे कि शादी के बाद हनीमूनमें कैसे क्या किया. बात कडुवी जरूर है लेकिन सत्य है.


बाबा रामदेव से मीडिया काफी खफा हो गया लगता है, बाबा ने अपने सम्बोधन में यह कह क्या दिया कि कंडोम काप्रयोग संतान निरोध के लिये ठीक है, लेकिन कंडोम का मतलब यह नहीं कि समाज में व्यभिचार को बढ़ावा मिले. इसी प्रकार उन्होंने संत वैलेन्टाइन के बारे में भी कहा कि संत ने प्रेमी युगलों को वैवाहिक बंधन में बांधा और हरदिन ही प्रेम का दिन होना चाहिये. जैसा वह हमेशा कहते आये हैं, उन्होंने भारतीयों को मर्यादित आचरण करने, मां-बाप और राष्ट्रप्रेम का, विश्व बंधुत्व का पाठ पढ़ाया. लेकिन मीडिया को यह कतई सहन नहीं हुआ, आखिर उनकेरहते बाबा कैसे ठेका ले सकते हैं नैतिकता का. एक चैनल पर तेरह साल के लड़के और पन्द्रह साल की लड़की द्वारामां-बाप बनने की खबर खूब जोर-शोर से दिखाई जा रही थी, इसे दिखाकर समाज को आईना दिखाने का दावा करनेवाले पत्रकार इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को इतना एम्प्लीफाई क्यों कर रहे थे?, मेरी समझ में नहीं आया. यहां पर कुछलोग यह कह सकते हैं कि मैं वैलेन्टाइन डे का विरोध कर रहा हूं या फिर उसके विरोध करने वालों का समर्थन. साथमें जाने वाले लड़के-लड़कियों को पीटना बिल्कुल गलत है, नाजायज है, अपराध है. लेकिन यह "डे" संस्कृति मेरीसमझ में आज तक नहीं आई. "डे" से मेरा तात्पर्य है मदर्स डे, फादर्स डे, टीचर्स डे, वैलेन्टाईन डे, वगैरा. क्या पन्द्रहबीस साल पहले एक भी प्रकार का "डे" मनाया जाता था, कितने लोगों को इन डे के बारे में पता था. माफकीजियेगा, यह संस्कृति किसी शरीर में घुसाये गये फारेन आब्जेक्ट की तरह है, जिसे एक स्वस्थ शरीर को तुरन्तही अस्वीकार कर देना चाहिये था. यह केवल उपभोक्ता संस्कृति है, बाजारवाद है, मां-बाप की अवज्ञा करने वालीऔलादें भी मदर्स-फादर्स डे मनाती हैं! एक दिन गुरुओं को आदर देने वाले छात्रों में से ही कुछ गुरुओं को हीथप्पडयाते हैं. तो हम अपनी ही संस्कृति अपना पाये और ही पूरी तरह से पश्चिमी. जहां अपना लाभ दिखाई देगया, वही अपना लिया और उसके समर्थन में ही वैसे ही तर्क-कुतर्क गढ़ लिये. गोयबल्स यह मानता था कि यदिएक झूठ को सौ बार बोला जाये तो वह सत्य का रूप धारण कर लेता है और यह सत्य भी है.

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